फिर एक कहानी और श्रीमुख "घर वापसी"

फिर एक कहानी और श्रीमुख  घर वापसी

पंडित बटेसर मिसीर उस कोटि के ब्राह्मण थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि "दिन भर मांगे तो सवा सेर, और घण्टे भर मांगे तो सवा सेर"। विशुद्ध सुदामावादी पंडित जी दिन भर यजमानों के घर-घर घूमते तब भी इतना नहीं मिलता कि अगले दिन के लिए कुछ बचे, पर पंडीजी उतने में ही संतुष्ट रहते थे। वो दरिद्रता के दिन थे, जब देश मे सुख जैसी स्थिति किसी की नहीं थी, सो यजमानों से पंडीजी को धन तो नहीं मिल पाता था, पर पंडीजी अपने अच्छे व्यवहार के कारण बड़ा सम्मान पाते थे।

पंडीजी के एक ही सुपुत्र थे, लीलाधर मिसीर उर्फ टिंकू जी। संयोग से लीलाधर मिसीर उर्फ टिंकू जी पढ़ने लिखने मे तेज निकले और गांव के ही सरकारी स्कूल से फर्स्ट डिवीजन से मैट्रिक पास कर गए। अब मैट्रिक के आगे टिंकू जी को पढ़ाने की सामर्थ्य पंडीजी की थी नहीं, सो पढ़ाई पर खतरा आ गया।

पंडीजी के गांव में एक साहूजी थे, जाति के तेली। उस जमाने में दूसरी जातियों के लोग कहने के लिए भले राजा बने फिरते हों, पर पैसा होता सिर्फ तेलियों के पास था। इसी कारण तेली लोग साहूजी कहलाते थे। असल मे ये लोग तनिक मित्तव्ययी होते थे, सो इनके यहां लक्ष्मी स्थाई निवास बना लेती थीं।

साहूजी पंडीजी के यजमान थे, और अत्यंत ही धर्मभीरु तथा दानी व्यक्ति थे। साहूजी ने जब देखा कि रुपयों की कमी के कारण एक होनहार पीछे छूट रहा है, तो उन्होंने टिंकू जी की पढ़ाई का व्यय अपने माथे पर ले लिया। टिंकू जी की शिक्षा पर छाए मेघ उड़ गए और वे बनारस के हिन्दू विश्वविद्यालय में नामांकन पा गए। टिंकू जी तेज तो थे ही, अवसर मिला तो ऊँची उड़ान भरने लगे और पांच साल बाद गोरखपुर जिले में "नायब तहसीलदार" हो गए। शीघ्र ही एक सम्पन्न ब्राह्मण परिवार की कन्या से उनका विवाह हो गया, और समय के साथ वे दो पुत्र-पुत्री के पिता हो गए।

बूढ़े पंडीजी के अच्छे दिन आ गए थे, अब उनकी धोती आकाश में सूखने लगी थी। पर पंडीजी के भाग्य में सुख के दिन थे नहीं, वे शीघ्र ही गोलोकवासी हो गए। टिंकू जी के मन मे पिता के लिए बड़ी श्रद्धा थी, पर एक पेंच था। टिंकू जी ने अपने पंडित पिता की घोर दरिद्रता देखी थी, सो उन्हें पंडिताई से घृणा हो गयी थी। वे हमेशा सनातन संस्कारों का उपहास करते, और आधुनिकता के नाम पर ईसाइयों की बड़ाई करते न अघाते। उन्होंने गोरखपुर में घर बनवा लिया था, और वहीं परिवार के साथ सेटल हो गए थे। टिंकू जी के घर में किसी देवी-देवता की कोई तस्वीर नहीं थी, यहां तक कि वे घर में धार्मिक चर्चा के भी विरुद्ध थे। बूढ़े पंडितजी की मृत्यु के बाद घर में कभी सत्यनारायण भगवान की कथा भी नहीं हुई थी। आस पास के लोगों के कारण उनकी पत्नी अपने त्योहारों पर पूजा पाठ तो कर लेती थी, पर घर मे त्योहारों वाला वह उत्साह नहीं होता था।

त्योहार के नाम पर टिंकू जी क्रिसमस मनाते थे, और बच्चों के लिए बड़े उत्साह से उपहार बेसहि के लाते थे।

समय के साथ साथ टिंकू जी का ईसाई प्रेम बढ़ता जा रहा था, और अब वे क्रिसमस के दिन चर्च भी चले जाते थे।


गोरखपुर में सेंट जेवियर्स के नाम पर एक ईसाइयों का सम्मेलन होने वाला था, जिसमें सम्मिलित होने के लिए टिंकू जी को भी न्योता आया था। टिंकू जी यह तो जानते थे कि आज सेंट कह कर पूजा जाने वाला फ्रांसिस जेवियर्स भारत में सनातन के नाश का स्वप्न ले कर ही गोवा में उतरा था, और उसकी अगुआई में हिंदुओं के अंग भंग से ले कर स्त्रियों के बलात्कार और मशीनों से स्तनों को खींचने जैसे क्रूर और अमानवीय असभ्य कार्य असंख्य बार हुए थे, पर आधुनिकता की हवा में उन्हें यह बातें अनावश्यक लगती थीं। उन्होंने सम्मेलन में आने के लिए सहर्ष सहमति दे दी।

सम्मेलन के दिन नया कोट-पैंट पहन कर टिंकू जी समय से सम्मेलन स्थल पर पहुँच गए, और प्रथम पंक्ति में ही स्थान पा कर बैठ गए।

कुछ ही समय बाद पादरी महोदय का सम्बोधन प्रारम्भ हुआ। लोग पूरी तन्मयता के साथ पादरी-प्रवचन सुनने लगे। बोलते बोलते कुछ पल बाद पादरी महोदय हिन्दू धर्म पर आ गए, और जहर उगलना प्रारम्भ कर दिया। टिंकू जी भी बड़ी प्रसन्नता से सुन रहे थे। कुछ पल बाद पादरी ने कहा- "हमारा परम कर्तव्य है कि मूर्तिपूजा के चक्कर मे पड़े मूर्खों को यीशु की राह पर लाएं"। लोगों के साथ टिंकू जी ने भी तालियां बजाई। पादरी ने आगे कहा- भाइयों, लम्बी लम्बी शिखा वाले धूर्त ब्राह्मणों ने भारत को अपना गुलाम बना कर रखा है, हमें लोगों को इस गुलामी से मुक्ति दिलानी होगी।

जाने क्यों टिंकू जी इस पर ताली नहीं बजा पाये। उनकी आंखों के सामने उनके स्वर्गीय पिता का चेहरा तैर गया, वे भी मोटी शिखा रखते थे। टिंकू जी को "धूर्त" शब्द जैसे चुभ गया। पर टिंकू जी समय को भांप कर चुप रह गए।

तालियों से गदगद हुआ पादरी और मुखर हुआ, उसने आगे कहा- भाइयों! तनिक बताइये तो, भला पत्थर में भी कहीं भगवान होते हैं? क्या पत्थर किसी की रक्षा कर सकता है? पर भारत के मूर्ख पंडितों ने पत्थर को ही भगवान बता कर जो झूठ बोला, उस झूठ से लोगों को बाहर निकालना ही धर्म है।

टिंकू जी को फिर चोट लगी। उन्हें लगा जैसे पादरी उनके सज्जन पिता को ही मूर्ख कह रहा हो। वे क्रोध से जल उठे, पर शांत रहे।

पादरी बोलता जा रहा था- भाइयों, यीशु की राह ही सच्ची राह है। यीशु के बताए राह पर चल कर ही हम स्वर्ग प्राप्त कर सकते हैं, चोर पंडितों के बताए राह पर चल कर मूर्तिपूजा का ढोंग करने वाले मूर्ख हिन्दू नरक की यातना....

टिंकू जी से अब सहन नहीं हुआ। चोर और ढोंग शब्द उन्हें जैसे चीर गए थे। वे छरक कर मंच पर चढ़े और पादरी को दो घूंसा लगा कर पटक दिया, और उसकी छाती पर चढ़ बैठे। टिंकू जी क्रोध की अधिकता से कांप रहे थे और चिल्ला रहे थे- बुला अपने यीशु को साले, देखूं तो तुमको कैसे बचाता है। साले मरी हुई लाश को टांग कर पूजने वाले, तू मेरे पिता को ढोंगी कहेगा? अबे तेरा यीशु कैसा भगवान है बे, जो खुद को नहीं बचा सका वो दूसरों को कैसे बचाएगा रे हरामखोर?

टिंकू जी ने पादरी को दस बारह घूंसा लगाया, तबतक लोगों ने उन्हें पकड़ लिया। कहना न होगा कि उन्हें इस कुकृत्य की कैसी सजा मिली, लोगों ने उन्हें उठा कर पंडाल के बाहर फेंक दिया।

लुटे पिटे टिंकू जी घर आये और बिना कुछ बोले गुमसुम से पड़े पड़े सो गए।

शाम को टिंकू जी ने अपने चार साल के बेटे न्यूटन को हाँक लगाई- बेटा! आओ तुमको श्रवण कुमार की कहानी सुनाता हूँ।

गोद मे ले कर बेटे को देर तक कथा सुनाने के बाद टिंकू जी अर्थात लीलाधर मिसीर ने कहा- बेटा! आज से अपना नाम 'पार्थ' बताना।

लीलाधर मिसीर ने देखा तो उन्हें लगा जैसे दीवाल पर टँगी उनके पिता की तस्वीर मुस्कुरा उठी हो।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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