फिर एक कहानी और श्रीमुख "कसम"

फिर एक कहानी और श्रीमुख  कसम

अपनी दाढ़ी के नीचे जब उसने सेल्फ लोडेड राइफल की नली सटाई तो जाने क्यों उसके होठ मुस्कुरा उठे। उसने एक बार भय से थर थर कांपती लड़की की तरफ निगाह उठाई और पल भर में ही जैसे उसकी आँखों के आगे एक उम्र गुजर गयी।

उसकी आँखे पुरानी यादों में डूबने लगीं...

-क्यों जी, तुम्हारा नाम क्या है?

-क्यों? नाम जान कर क्या करोगे पगड़ी वाले साहब?

वह मुस्कुराई, उसके मुस्कुराने से जैसे पूरी काश्मीर घाटी मुस्कुरा उठी।

- अबके जब घर जाऊंगा तो माँ को बताऊंगा कि एक लड़की है, जिसके मुस्कुराने से फूल खिल उठते हैं। अब अगर माँ ने नाम पूछा तो आखिर क्या बताऊंगा तुम्ही बोलो।

वह खिलखिला उठी। जैसे हर चार कदम पर बहने वाली कश्मीरी नदियां खिलखिलाती रहती हैं।

वह देर तक उसकी हँसी निहारता रहा। फिर उदास हो कर बोला- तो मैं जाऊँ? नाम नही बताओगी?

- उसने उसकी आँखों में आँख डाल कर कहा- सुनो, मेरा नाम फातिमा है। अपनी माँ के अलावे किसी और को बताया तो चबा जाउंगी, समझे न! और एक बार फिर मुस्कुरा उठी।

उसने ध्यान से देखा, इस कश्मीरी लड़की की आँखों में पुरे हिमालय की शोभा उतरी हुई थी।

वह मुस्कुराता हुआ छावनी की ओर लौट चला।

ट्रेनिग के दौरान बेस्ट स्टूडेंट घोषित किये गए रणजीत सिंह, अपनी सत्तर सदस्यों वाली राष्ट्रिय राइफल्स की टुकड़ी के सबसे सुन्दर जवान थे।

छह फिट से अंगुल भर ऊँचे इस नौजवान को देख कर लगता जैसे कोई शापित देवदूत धरती पर उतर आया हो। आतंकवाद नियंत्रण के लिए गठित इस सैन्य टुकड़ी में रणजीत सिंह को आम कश्मीरियों से घुल मिल कर जानकारी इकट्ठा करने की जिम्मेवारी मिली थी। पिछले दो महीने में ही वे इस कार्य में निपुण हो चुके थे और उन्हें अच्छी सफलता मिल रही थी। मेडिकल टीम के साथ गांवों में घूम घूम कर ग्रामीणों से काफी घुल मिल गए थे रणजीत सिंह, और उन्होंने जानकारी इकठ्ठा करने के लिए अपने कई सोर्स बना लिये थे। इन्ही में से एक था इरफ़ान बट, जिसकी बहन थी फातिमा।

अपने काम के चक्कर में बार बार इरफ़ान के घर जाते थे रणजीत सिंह, जहां हर बार उनकी फातिमा से मुलाकात हो जाती। दोनों इतने खूबसूरत थे कि एक दूसरे के जादू से दोनों के लिए बच पाना असंभव था। हर चौथे पांचवे दिन होने वाली मुलाकातों के बीच जाने कब वे एक दूसरे पर अपना हृदय न्योछावर कर बैठे थे, यह वे स्वयं समझ नही पाये थे।

मनुष्य के अंदर सबसे ज्यादा साहस प्रेम भरता है। यह प्रेम की ही शक्ति थी कि रोजाना लगातार पंद्रह सोलह घंटे काम करने वाले रणजीत सिंह अब फातिमा के लिए कैसे भी एक आध घंटा निकाल लेते थे। कॉलेज की छूटी होने पर घर के लिए निकलती फातिमा के साथ किसी पहाड़ी नाले में पैर डाल कर बैठे रणजीत जब हीर-राँझा के पारंपरिक पंजाबी गीत गुनगुनाते तो नाले का पानी रुक कर उनकी आवाज सुनने लगता। आधे घंटे तक निरंतर की गयी बेकार की बातों के बाद जब दोनों चलने के लिए उठते तो फातिमा कहती- ओय पगड़ी वाले साहब, बहता पानी छु कर कसम खाओ कि परसों जरूर आओगे।

मुस्कुराते रणजीत पानी में हाथ डालते और एकाएक नाले का पानी उसके ऊपर उलीच देते।

यह हर बार का किस्सा था। वह हर बार इनसे पानी छु कर कसम खाने को कहती, यह हर बार उसपर पानी उलीच देते। दोनों को इसी में आनंद मिलता था।

जब वे वापस होते तो वह कहती- तुम तराई वाले होते ही बेवफा हो, कब छोड़ कर भाग जाओ कुछ तय नही।

वह मुस्कुरा कर कहता- अगर भाग भी जाऊँ तो भी तुम मुझे ही प्यार करोगी। मैंने तुम्हे फाँस लिया है।

वह खिलखिला उठती....

दोनों कश्मीर के पहाड़ों की तरह पवित्र थे, दोनों एक दूसरे को देखने आते थे।

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दो साल बीतने पर जब रणजीत की पोस्टिंग कश्मीर से बाहर होने लगी तो वह जैसे नींद से जगा। वह जैसे उसके आँचल से बंध गया था, उसे अब उससे दूर होने की बात से ही भय होता था। उसने अपना टेन्योर छः महीने बढ़वा लिया था, पर छः महीने बाद फिर दूर होने का भय उसे खाये जा रहा था। प्रेम के आकाश में निर्विघ्न उड़ते दोनों पंछियों को अब आसमान ख़त्म होने का आभाष होने लगा था।

छः महीने बीतते कितने दिन लगते हैं, आखिर उसकी पोस्टिंग दूसरी जगह हो ही गयी। अब उसे समझ में नही आ रहा था कि वह करे तो क्या करे। इन दिनों जब भी वह फातिमा से फोन पर बात करता तो कसम खाता कि मैं वापस जरूर आऊंगा। पहले फिर आने के लिए फातिमा उससे जबरदस्ती कसम खिलाती थी, अब वह बिना कहे फिर आने की कसम दुहराता रहता था। प्रेम मनुष्य में जितना साहस भरता है उतना भी डरपोक भी बना देता है।

आज उसका कश्मीर में आखिरी दिन था, अगले दिन उसे वहां से निकल जाना था।आज फातिमा का कॉलेज भी बन्द था, सो जाने के पहले उससे आखिरी बार मिलने के लिए वह उसके घर ही चला गया। यह उसके साहस की पराकाष्ठा थी कि वह उसके घर के अंदर चला गया।

उसने देखा, उसकी आँखे सूज गयी थीं। उसने कहा- चिंता न करो, मैं जल्द ही वापस आऊंगा, और तब तुमको यहां से ले के ही जाऊंगा।

वह चुपचाप देखती रही। उसने फिर कहा- मेरे लिए किसी भी नदी से ज्यादा पवित्र हो तुम, तुम्हारा हाथ छु कर कहता हूँ जल्द ही आऊंगा।

वह चुपचाप सुनती रही।

उसने फिर कहा- मैं जा रहा हूँ, सिर्फ तुम्हारी मुस्कुराहट देखने आया था। क्या खाली ही चला जाऊँ?

फातिमा ने उसकी तरफ देखा और जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश करते करते लिपट गयी उससे। फिर बोली- धोखा नही न दोगे?

वह मुस्कुराया- नही रे पगली, जब तक जिऊंगा तुम्हारा हो कर ही जिऊंगा।

जल्द ही वापस आने के वादे के साथ जब वह घर से बाहर निकला तो उसकी आँखें फ़टी रह गयीं। सामने सैकड़ों लोगों का हुजूम खड़ा उसे गालियाँ दे रहा था। अचानक किसी का फेका हुआ एक पत्थर आ कर लगा उसे, फेकने वाला चिल्ला रहा था- मारो इसे, यह बलात्कारी है।

वह घबरा उठा। उसने कंधे से अपनी राइफल उतारी और गरजा- दूर हटो, मैंने कोई अपराध नही किया।

पर पांच पांच सौ रूपये के पाकिस्तानी उत्कोच से भ्रमित पत्थरबाज भीड़ मानने वाली नही थी। लोग उसकी तरफ बढ़ने लगे। वह फिर गरजा- हट जाओ नही तो गोली चला दूंगा।

भीड़ पर कोई फर्क नही पड़ा, वे आगे बढ़ते ही जा रहे थे। अचानक एक पत्थर उसके बगल में खड़ी फातिमा के सर पर लगा। अब वह बर्दाश्त नही कर सका, उसने राइफल की ट्रिगर दबाई और एक पत्थरबाज जमीन पर लोट गया।

पर भीड़ पीछे जाने का नाम नही ले रही थी। परिवर्त्तित और नवदीक्षित धार्मिकों में अंधी कट्टरता बहुत ज्यादा होती है। उसने एक पल को कुछ सोचा और राइफल की नली अपनी दाढ़ी से सटा लिया। उसकी ऊँगली ट्रिगर पर ही थी।

उसे याद आया, सुदूर अफ्रीका के जंगलों में कार्य कर चुकी भारतीय शांति सेना के ऊपर भी कभी बलात्कार का आरोप नही लगा। वह जैसे कांप उठा। उसे पता था कि देश में बैठे बौद्धिक गद्दार इस बात को कैसे प्रचारित करेंगे। राइफल पर उसकी पकड़ मजबूत होती गयी।

उसने फातिमा की ओर देखा, वह सफ़ेद पड़ गयी थी। वह मुस्कुरा कर बोला- मैंने कहा था न, जब तक जिऊंगा तुम्हारा हो कर ही जिऊंगा।

भीड़ उन दोनों को पकड़ने ही वाली थी अब। वह गरजा- चंद सिक्को में अपना ईमान बेच देने वाले गद्दारों, मैंने इससे प्यार किया है कोई अपराध नही किया। मैं चाहूँ तो दो मिनट में ही तुम सब को ख़त्म कर सकता हूँ, पर मैं तुम जैसा गद्दार नही हूँ। मैं अपनी जान दे कर तुम गद्दारों की जान बचा रहा हूँ।

उसने आखिरी बार देखा उसकी ओर, और ट्रिगर दबा दिया।

अगले ही पल वह जमीन पर पड़ा तड़प रहा था।

उसने अपनी कसम पूरी कर दी थी। वह भारत का सैनिक था।

गद्दारों ने उस अमर प्रेमी को बलात्कारी बताने का हर संभव प्रयास किया पर भारतीय सेना अपने इस प्रेमी सैनिक को बहुत प्यार करती है।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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