'पिचत्तिस' से याद आया... ज्यों बालक कह तोतरि बाता

पिचत्तिस से याद आया... ज्यों बालक कह तोतरि बाता


'पिचत्तिस' से याद आया कि जब मैं छोटा बच्चा था तो पहली-पहली बार स्कूल गया।

अब जब स्कूल गया तो यह तो मुझे याद नहीं कि मुझे 'कखगघ' किसने सीखाया पर गिनती तो वहीं सीखाया गया।

मंसी जी (मास्टर साहब) पहले आगे-आगे बोल रहे थे और पीछे-पीछे बच्चों को उसे दुहरा रहे थे।

बहुत हेंडसम, म्युजिकल एंड रिदमिक थी वह गिनती, सेक्सी तो वो फिल्म तेजाब की माधुरी दीक्षित के गाने से भी थी, वो क्या था... "एक दो तीन चार पांच छः सात आठ नौ दस ग्यारह बारह तेरह.....", सही में इससे तो बहुत अधिक मस्त थी वह गिनती।

बच्चे झूम-झूम के, एक दूसरे के झोला-पटरी चूम-चूम के खूब मन से गा रहे थे।

उस पहले दिन तो चूंकि मैं पहली बार ही स्कूल गया था, मेरे मुहल्ले की कई माता-बहिनी के आंखों में आसूं थे मेरे उस करुण-क्रंदन के कारण, इसलिए मैं तो गुमसुम ही रहा था, दिनभर।

पर जब स्कूल के अंत में गिनती की रटाई शुरू हुई तो मजा आ गया।

मंसीजी ने बड़े सुर में कढ़ाया और बच्चों ने बड़े मन से उसे उतने ही जोर से दुहराया मैं तो एकदम पुलक उठा- एकेकाई, दूएकाई, तीनेकाई, चारेकाई, पांचेकाई, छौवेकाई, सातेकाई, आठेकाई, नवेकाई, एक दहाई सूनेकाई एक सुना दस‌। कई बार दोहराया, तेहराया, चौराहा गया तब मंसीजी ने, पुनश्च गिनती को आगे बढ़ाया- एक दहाई एकेकाई एकेक एगाव। बच्चे मुसुकाए, लटपटाए, लोटिया उठे तो मंसीजी खुद ही एक बार फिर दुहराए- एक दहाई एकेकाई एकेक एगाव।

बच्चों ने भी सुर मिलाया- एक दहाई एकेकाई एकेक एगाव।

मंसीजी ने संशोधन किया- एगाव ना रे लइके.... ए...गा...व...ह।

बच्चे तो बच्चे- एगाव ना वे लइके.... ए...गा...व...ह।

मंसीजी ने उपेक्षा कर गिनती को आगे बढ़ाया- एक दहाई दूएकाई एक-दू बाव।

बच्चे मन के सच्चे, बोल पड़े- एक दहाई दूएकाई एक-दू बाव।

मंसीजी झनके- बाव ना वे ससुआ... बा... व... ह.... बाव।

बच्चों ने पूरे मनोयोग से पुनरावृत्ति किया- बाव ना वे ससुआ... बा... व... ह.... बाआआव।

मंंसीजी ने जैसे तैसे खुद को ही ढ़ाढ़स दिलाया- एक दहाई तीनेकाई एक-तीन तेव।

और बहुत अधीर होकर बेचारगी से बच्चों की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया और हर चीज से कुछ ज्यादा ही बेखबर रहने वाले हमारे दौर के बच्चे पूरी शिद्दत से हुंकार उठे- एक दहाई तीनेकाई एक-तीन तेव।

तभी अचानक पूरी कक्षा में एक जोर की चीत्कार उठी- तेवी माव की... धांय... धांय... गम.... गम.... चट... चट... चटाक.... तड़का।

और जिस बच्चे पर ये हमला हुआ था मंसीजी की ओर से वह जैसे तैसे खुद को उनके चुंगल छुड़ाया और उतनी ही जोर से मंसी जी को गरियाते हुए घंटी टनटनाते हुए निकल भागा।

सारे बच्चे बांध के टूटे पानी से दौड़ पड़े, मंसी जी अकबक और मैं तो पहले से ही नोटा में था।

पर अब मैं चिंतित इस बात को लेकर हूं कि अगर पिचत्तिस का हाल यह है तो छत्तीसगढ़ का क्या होगा?

नमस्कार!

आलोक पाण्डेय

बलिया उत्तरप्रदेश

Share it
Share it
Share it
Top