बाँस...

बाँस...

बाँस के गुणों और इसकी उपयोगिता से परिचित तो था ही लेकिन जब, बाँस की विकिपीडिया पढ़ा... पता चला जितना मैं जानता था बाँस उससे कहीँ बहुत ज्यादा गुणवान और उपयोगी है। वो बात अलग है कि लोगबाग को बाँस के गुणों के विषय में जानने की उतनी रुचि नहीं रहती जितना किसी उत्सर्जी मार्ग को अवरुद्ध करने की। जी हाँ! बाँस का सर्वाधिक प्रयोग दूसरे के विरोध करने के लिए किया जाता हैं। अगला कोई कितना भी बढ़िया काम कर रहा हो लेकिन यह जालिम दुनिया बाँस लेकर तैनात हो जाती है। शहरी और डिजिटल युग के वे बच्चे, जो ग्रामीण स्तर पर बांस की उपयोगिता और उसके बहुउद्देशीय प्रयोग को देख पाने से वंचित रह जायेंगे वो तो बांस को सिर्फ एक हथियार की तरह समझेंगे उनकी नजर में बांस प्रकृति द्वारा प्रदत्त एक उपकरण मात्र है जिसका प्रयोग ' केवल गतिमान तंत्र, या व्यक्ति के कार्य बाधित करने के लिये किया जाता है।

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आश्चर्य की बात यह कि बाँस, घास कुल में पैदा होता है लेकिन उसकी सख्ती और ऊंचाई देखकर कोई मानने को तैयार न होगा कि इसकी पट्टीदारी दूब, धान और गेहूँ जैसे परिवार में पड़ती है।

सोचिए! घास जैसे रीढ़विहीन और लिजलिजे परिवार से निकलकर कोई कैसे इतनी उंचाई और मजबूती से खड़ा हो सकता है भला? लेकिन आपके बीच, बाँस ने यह कर दिखाया। तन कर मजबूती से खड़ा होना उसका प्राथमिक गुण है। उसके 'वृद्धि की गति' का लोहा वृक्ष तक मानते हैं तो घास की क्या जुर्रत ? प्रगति के मार्ग पर बढ़कर ऊंचाईयों को छूना लेकिन मजाल क्या कि कमर झुक जाये। वैसे किसी को संदेह भी नहीं होना चाहिए कि बाँस महाशय अपने कुल खानदान के पूजनीय और आदर्श होगे।

बांस एक प्रेरणा है उन लोगों के लिए भी हैं जिन्हें अपने रीढ़ पर विश्वास ही नहीं, वे अपने रीढ़ के बल पर पर खड़े होने से घबराते हैं। अपने बल पर उठकर दो चार फीट भी ऊंचाई नहीं चूम पाते।

बांस संयुक्त परिवार का बहुत बड़ा उदहारण पेश करता है.. हमेशा भरे पूरे परिवार के साथ रहना उसकी खासियत है.. जब आपको एक बड़े संयुक्त परिवार में समायोजन में परेशानी हो तो आप बाँस का ध्यान करें। बाँस एक ही जड़ पर सैकड़ों परिवार का प्रतिनिधित्व करता है वह भी तब, जब सभी अपने बल पर खड़े होने की हैसियत में हैं कोई भी सहारे के लिए दूसरे पर अधीन नहीं.. कि आप ताना मारें कि उसकी मजबूरी थी तब सटा था.. वैसे नहीं।

लाठी की शक्ल में आकर दुश्मनों की हड्डियाँ तोड़ने के अलावा बाँस ने अन्य बहुत से मिथकों को भी तोड़ा है जैसे घास की प्रजाति में पैदा होकर वृक्षों को चुनौती देने का माद्दा.. बला की लम्बाई पाने के बाद भी लचक नहीं देना. अन्दर से खोखला होने के बावजूद दुनिया की नजर में विश्वसनीय होना... हांलाकि खोखले व्यक्ति और व्यक्तित्व पर लोगों को संदेह बना रहता है लेकिन बाँस ने खोखलेपन के इस मिथक को तमाचा जड़ा। प्रत्येक कदम पर इनके शरीर पर गांठें होने के बावजूद अपनी गाठों से जुदा न होना भले आपको लगे की इनके हर कदम पर सामंजस्य नहीं। इनकी पतली परत उघाड़ने पर भी अपनी ऊंचाई को बरकरार रखते हैं ये।

बाँस की पतली कईन देखने में भले दुबली लगे लेकिन जहाँ गिरती है वहाँ कि त्वचा पर एक गहरा निशान छोड़ जाती है इसलिए जब दण्ड की तीव्रता को बढ़ाना होता है तो डंडों की श्रेणी में बांस की कईन को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है।

बेंत के बाद लाठी की के रूप में द्वितीय दावेदार बाँस ही है.. उठाने के लिहाज़ से हल्की और बुजुर्गों का पूरा वजन थाम लेती है यह.. हांलाकि लाठी के रूप में यह स्त्रीलिंग धारण कर लेती है किन्तु साहस के तौर पर बड़े-बड़े मर्दों का भूत झांड़ देती है यह।

वजन में हल्के और खोखले होने के बावज़ूद दुनिया के भीतर बाँस ने जो भरोसा कमाया है वह एक मिशाल है। आधार स्तम्भ के रूप में इनकी महती भूमिका को झुठलाया नहीं जा सकता। बड़े से बड़ा पांडाल बनाने से लेकर मंच तक इनकी दमदार उपस्थिति से कौन अनभिज्ञ है.. इमारतों के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण आलंब हैं यह। विशाल प्रतिमाओं का वजन बांस के मजबूत आधार पर ही टिका रहता है। झोपड़ी से लेकर टोकरी तक, बेना से लेकर सीढ़ी तक, पांडाल से लेकर तोरणद्वार तक.. खटिया, लाठी, डेहरी, पतवार, सजावट, श्रृंगार ऐसे न जाने कितने विविध उपयोग की वस्तुओं में इनकी प्रबल हिस्सेदारी है।

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जीवन भर व्यक्ति हजारों वाहन बदलता है किन्तु उसकी अन्तिम यात्रा का वाहन सिर्फ बाँस ही बनता है..बाँस जीवित व्यक्ति के जीवन की अनेक आवश्यकताओं की मजबूती से पूर्ति करने बाद घाट तक पहुंचाने चला आता है।

मित्रों! बाँस जैसा मजबूत बनें, उंचाइयों को स्पर्श करें, आधार स्तम्भ बनें, अन्त तक साथ दें ऐसा न कि हमें उस रूप में जाना जाये जैसा बाँस को लोगबाग दूसरे के काम में अड़ंगा लगाने में प्रयोग करते हैं॥

रिवेश प्रताप सिंह

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