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वट सावित्री व्रत...व्रत विधि एवं कथा

वट सावित्री व्रत...व्रत विधि एवं कथा

इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने सुहाग के दीर्घायु होने और उनकी कुशलता के लिए वट के वृक्ष की पूजा-उपासना करती हैं। ऐसा मान्यता है कि वट सावित्री व्रत कथा के श्रवण मात्र से महिलाओं के पति पर आने वाली बुरी बला टल जाती है।

व्रत कथा

पौरणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार, प्राचीन काल में भद्रदेश के राजा अश्वपति बड़े ही प्रतापी और धर्मात्मा थे। उनके इस व्यवहार से प्रजा में सदैव खुशहाली रहती थी, लेकिन अश्वपति स्वयं प्रसन्न नहीं रहते हैं, क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थीं। राजा अश्वपति संतान प्राप्ति हेतु नित्य यज्ञ और हवन किया करते थे, जिसमें गायत्री मंत्रोच्चारण के साथ आहुतियां दी जाती थीं।

उनके इस पुण्य प्राप्त से एक दिन माता गायत्री प्रकट होकर बोली-हे राजन! मैं तुम्हारी भक्ति से अति प्रसन्न हुई हूं। इसलिए तुम्हें मनचाहा वरदान दे रही हूं। तुम्हारे घर जल्द ही एक कन्या जन्म लेगी। यह कहकर माता गायत्री अंतर्ध्यान हो गईं। कालांतर में राजा अश्वपति के घर बेहद रूपवान कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम सावित्री रखा गया।

जब सावित्री बड़ी हुई तो उनके लिए योग्य वर नहीं मिला। इसके बाद राजा अश्वपति ने अपनी कन्या से कहा-हे देवी! आप स्वयं मनचाहा वर ढ़ूंढकर विवाह कर सकती है।

तब सावित्री को एक दिन वन में सत्यवान मिले जो राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे। जो राज पाट चले जाने के कारण वन में रह रहे थे। सावित्री ने मन ही मन सत्यवान अपना पति मान लिया। यह देख नारद जी राजा अश्वपति के पास आकर बोले-हे राजन! आपकी कन्या ने जो वर चुना है, उसकी अकारण जल्द ही मृत्यु हो जाएगी। आप इस विवाह को यथाशीघ्र रोक दें।

राजा अश्वपति के कहने के बावजूद सावित्री नहीं मानी और सत्यवान से शादी कर ली। इसके अगले साल ही नारद जी के कहे अनुसार-सत्यवान की मृत्यु हो गई। उस समय सावित्री अपने पति को गोदकर में लेकर वट वृक्ष के नीचे बैठी थी। तभी यमराज आकर सत्यवान की आत्मा को लेकर जाने लगे तो सावित्री उनके पीछे-पीछे चल पड़ी।

यमराज के बहुत मनाने के बाद भी सावित्री नहीं मानीं तो यमराज ने उन्हें वरदान मांगने का प्रलोभन दिया। सावित्री ने अपने पहले वरदान में सास-ससुर की दिव्य ज्योति मांगी( ऐसा कहा जाता है कि सावित्री के सास ससुर अंधे थे)।

दूसरे वरदान में छिना राज-पाट मांगा और दूसरे तीसरे वरदान में सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा, जिसे यमराज ने तथास्तु कह स्वीकार कर लिया।

इसके बाद भी जब सावित्री यमराज के पीछे चलती रही तो यमराज ने कहा-हे देवी ! अब आपको क्या चाहिए ?

तब सावित्री ने कहा-हे यमदेव आपने सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान तो दे दिया, तब सावित्री ने कहा बिना पति के मैं मां कैसे बन सकती हूं? यह सुन यमराज स्तब्ध रह गए। इसके बाद उन्होंने सत्यवान को अपने प्राण पाश से मुक्त कर दिया। कालांतर से ही सावत्री की पति सेवा, सभी प्रकार के सुखों का भोग किया।

पूजन विधि...

इस दिन सुबह उठकर स्नान करने के बाद सुहागिनें नए वस्त्र धारण करती हैं। वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं खूब सजती-संवरती हैं। सबसे पहले भगवान सूर्य को अर्घ्य दें, इसके बाद सभी पूजन सामग्रियों को किसी बांस से बनी टोकरी या पीतल के पात्र में इकट्ठा कर लें। अपने नजदीकी वट वृक्ष के पास जाकर जल अर्पित करें और माता सावित्री को वस्त्र व सोलह श्रृंगार चढाएं। फल-फूल अर्पित करने के बाद वट वृक्ष को पंखा झेलें।

इसके बाद धागे को पेड़ में लपेटते हुए जितना संभव हो सके 5, 11, 21, 51 या फिर 108 बार बदगद के पेड़ की परिक्रमा करें। फिर व्रत कथा को ध्यानपूर्वक सुनें। इसके बाद दिन भर व्रत रखें।

अर्घ्य देने का श्लोक

अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।

पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते।।

(पं . रवि पाठक)

जय श्री राधे... जय श्री हरिदास...

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