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किसानों हित की प्रतिबद्ध आवाज, चौधरी चरण सिंह : मणेन्द्र मिश्रा 'मशाल'

किसानों हित की प्रतिबद्ध आवाज, चौधरी चरण सिंह : मणेन्द्र मिश्रा मशाल

किसानों पर जारी सियासत के बीच देश की आज़ादी के बाद उभरे किसान राजनीति के असली रहनुमा को उनकी जयंती पर याद करना बेहद समीचीन होगा.किसान आत्महत्याओं के दौर में जब सरकार जमीनी सहूलियत की गंभीरता को नजरअंदाज करते हुए किसान चैनल के माध्यम से किसान हित की वकालत कर रही हो.ऐसे में किसानों की समस्या का स्थाई समाधान करने और उनके सुख-दुःख में आजीवन हिस्सेदार रहने वाले किसान नेता,धरतीपुत्र एवं प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह का समूचा व्यक्तित्व जीवंत हो जाता है. चरण सिंह के सादगी और जमीनी जुड़ाव वाले पहलू को याद करना आज आवश्यक है.जिससे सबक लेकर यह जानना चाहिए कि किस तरह एक सामान्य परिवार में पैदा होने वाले व्यक्ति ने देश में सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बाद भी किसान हित का साथ नही छोड़ा.उग्र जाट प्रदर्शनकारियों को यह भी जानने की जरुरत है कि देश के ज्ञात इतिहास में पहली बार प्रशासनिक सेवाओं में खेतिहर और ग्रामीणों के लिए पचास फीसदी आरक्षण की बात उन्ही के जाट परिवार में पैदा होने वाले पुत्र ने किया था.जो उनके जातिगत गौरवबोध से अलग महान छवि और सोच को दर्शाता है.इसी सोच को अपनाने की जाट समुदाय को जरुरत है.
चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए उनके व्यक्तिगत/सामाजिक जीवन से अधिक जरुरी गाँव-किसान के प्रति उनकी सोच को जानना एवं समझना है.अपने पिता के दस एकड़ पुस्तैनी जमीन में से तीन भाईयों के बीच बँटवारे के बाद लगभग तीन एकड़ भूमि पाने वाले इस किसान के राजनीतिक जीवन का प्रवेश 1937 के बागपत-गाजियाबाद परिक्षेत्र से चुनाव जीतने से हुयी.जमींदारी का खुला विरोध करने वाले चरण सिंह ने प्रांतीय सभा का सदस्य बनते ही 'लैंड यूटीलाईजेशन बिल'बनाकर सभी जनप्रतिनिधियों को भेजते हुए इस पर गंभीर विचार का आग्रह किया था.इन्ही प्रयासों के फलस्वरूप भारतीय किसान आन्दोलन के वैचारिक अगुवा प्रो.एन जी रंगा ने 'मंडी समिति एक्ट' में चरण सिंह के सुझावों को शामिल किया था. 1950 में यूपी के मुख्यमंत्री सम्पूर्णानन्द की सरकार में चौधरी साहब के प्रयास और मार्गदर्शन में ही जमींदारी उन्मूलन विधेयक बना.जो एक जुलाई 1952 को लागू भी हो गया.इसी तरह 1964 में सुचेता कृपलानी की सरकार में बतौर कृषि मंत्री उन्होंने 'कृषक समाज' की स्थापना के माध्यम से किसानों को आधुनिक तकनीकि से जोड़ने का प्रयास शुरू किया.जिसे आगे बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री बनने के बाद 'चकबंदी कानून' को अतिरिक्त मजबूत करते हुए किसान हित का ध्यान रखा. 23 दिसम्बर 1977 को केंद्र सरकार द्वारा उन्हें मंत्रिमंडल से निकाले जाने के विरोध में आयोजित किसान रैली के ऐतिहासिक भीड़ के विषय में जानकर तत्कालीन समय में उनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है.किसानों के पक्ष में ठोस नीतियाँ बनाने और उन्हें लागू करने की प्रतिबद्धता को देखते हुए ही समकालीन प्रख्यात अर्थशास्त्री और कृषि जानकार वुल्फ लेज़न्सकी ने चरण सिंह की मुक्त कंठ से प्रशंसा किया था.1977 में जनता पार्टी की प्रथम बैठक में भारतीय अर्थव्यवस्था और किसान नीति की बेहतरी के लिए बनाये गये रिपोर्ट की चर्चा करते हुए उन्होंने लघु एवं कुटीर उद्योग के उन्नयन की बात को जोरदार तरीके से उठाया.साथ ही बजट का 40 प्रतिशत हिस्सा कृषि पर व्यय करने से लेकर 50 फीसदी गाँवों के विकास पर खर्च करने का पक्ष उनके गाँव-किसान से गंभीर जुड़ाव को ही दर्शाता है.किसान विकास योजनाओं में धन की पर्याप्त उपलब्धता करने के लिए उन्होंने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान नाबार्ड का गठन किया.जिसकी सफलता आज भी निर्विवाद बनी हुयी है.
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के मार्गदर्शन में राजनीति की शुरुआत करने वाले समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव उनके नीतियों के क्रियान्वयन की दिशा में हमेशा मजबूती से खड़े रहे.उत्तर प्रदेश में बतौर मुख्यमंत्री रहते हुए मुलायम सिंह यादव ने किसान हित योजनाओं के माध्यम से हमेशा किसानों को मजबूत साथ देने का वायदा निभाते रहे.हाल ही के दिनों में जब केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून से किसानों की जमीन हड़पने का काला कानून लाने का प्रयास किया.तब सड़क से संसद तक लोहिया-चरण सिंह के किसान केन्द्रित विचारों का उल्लेख करते हुए,उन्होंने सरकार को चरण सिंह के गाँव-किसान केन्द्रित विचारों के प्रासंगिकता को देखते हुए उनपर कार्य करने का सुझाव दिया.इसी धारा के अनुगामी उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी चरण सिंह की परम्परा को स्मृति में समेटकर गाँवों की खुशहाली करने का प्रयास करते दिखते है.चरण सिंह द्वारा सुझाये गये विचार के अनुरूप ही सूबे के मुखिया ने 2015-16 के बजट को गाँव-किसान केन्द्रित बनाया. साथ ही किसान वर्ष मनाने का निर्णय भी लिया है.हाल ही में बेमौसम बारिश और ओला वृष्टि से किसानों के हुए नुकसान की भरपाई की दिशा में किसानों को उचित मुआवजा देने और अनेक सहुलियते प्रदान करने की दिशा में यूपी सरकार के त्वरित निर्णय की सराहना समूचे देश में हुयी.
इन पहलुओं को समग्रता में देखने पर पूर्व प्रधानमंत्री के अन्नदाता हितैषी वाले व्यक्तित्व की झलक मिलती है.साठ वर्षो के लम्बे सामाजिक/राजनैतिक जीवन में सम्बन्धों को निभाने जो गुण चौधरी साहब में था,वह अन्यत्र दुर्लभ है.सादगी,वैचारिकता और प्रतिबद्धता का अनूठा समन्वय उनमें मौजूद था.लेकिन पिछली कई सरकारों द्वारा चरण सिंह के विचार-कर्म को जो महत्व दिया जाना चाहिए,उसका अभाव अभी तक बना हुआ है.हालिया केंद्र सरकार ने उनके पूर्व निवास स्थान को खाली कराने को लेकर भी जिस हल्केपन को प्रदर्शित किया.वह रवैया आधुनिक भारत में किसान हित के पर्याय चरण सिंह के नाम का अपमान करने वाली घटना थी.भारत में जहाँ सत्ताधारी दल अपने विचार से जुड़े पूर्व प्रधानमंत्रियों सहित विचारधारा में सहयोगी पुरुषों को देश का सर्वोत्कृष्ट पुरस्कार भारत रत्न देने में संकोच नही करते.वही देश की बहुसंख्यक आबादी जो खेती-किसानी से जुड़ी है,आजादी के बाद उस परम्परा के शिखर पुरुष चरण सिंह के नाम पर चुप्पी निराशाजनक है.यह सरकारों की प्राथमिकता में किसानों और उनके हितसाधकों के न होने की ओर इंगित करती है.ऐसे में समाज और सरकारों को राजनीति से प्रेरित फैसलों से ऊपर उठकर चरण सिंह जैसे महान विभूतियों के विचारों के प्रचार-प्रसार हेतु आगे आना चाहिए.बदहाल खेती-किसानी की आवाज़ सुनकर उन्हें भरोसा देते हुए आत्महत्या सहित किसानों को लेकर बेचारगी की सोच को तोड़ने बेहद जरुरी है.इस दिशा में देश के मुखिया और किसानों की आवाज़ रहे चरण सिंह की परम्परा को मजबूत करना ही उन्हें सच्ची श्रधांजलि होगी.


मणेन्द्र मिश्रा 'मशाल'


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