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भगवान राम इस धरा पर चइत में ही क्यों अवतरित हुए?

भगवान राम इस धरा पर चइत में ही क्यों अवतरित हुए?

चइत के महीने में राम की बात न हो तो लगता ही नहीं कि चइत चल रहा है। गाँव का मानुस महीनों के हिसाब से जीता है। फागुन का महीना कृष्ण का महीना है, सो गाँव के बूढ़े-बुजुर्ग भी मुस्कुरा कर जीते हैं। लगता है जैसे सबके हृदय में कृष्ण की बाँसुरी बज रही हो... चइत राम का महीना है, सो वह गम्भीरता ले कर आता है।

सोच कर देखिये, भगवान राम इस धरा पर चइत में ही क्यों अवतरित हुए? क्योंकि चइत में समूची प्रकृति माँ के रूप में होती है। हर बृक्ष की गोद भरी होती है, बरसात में तांडव और गर्मी में शुष्क उदासी झेलने वाली नदियों की भी गोद भरी होती है, खेतों की गोद भरी होती है, पहाड़ तक हरिहरा गए होते हैं। राम के आने के लिए इससे सुन्दर समय दूसरा कौन होगा? ऐसे ही सुन्दर और ममता से भरे समय में जब राम उतरते हैं, तो चइत गम्भीर हो जाता है। क्यों न हो, जिस मास की गोद मे राम उतरे हों वह तो गम्भीर दिखेगा ही।

अब तनिक ऐसे सोचिये, प्रभु ने अवतरित होने के लिए रघुकुल ही क्यों चुना! इसका उत्तर उस कुल के इतिहास में ही है। महाराज त्रिशंकु ने विप्र की सेवा की, महाराज दिलीप ने धेनु की सेवा की, महाराज दशरथ ने देवासुर संग्राम में सुर (देवता) की सेवा की, और महाराज भगीरथ ने सन्त की सेवा की, तब उन चार पीढ़ियों की जीवन पर्यंत की तपस्या का फल बनकर प्रभु श्रीराम उस कुल में अवतार लिए।

बाबा ने लिखा है, "विप्र धेनु सुर सन्त हीतs लीन्ह मनुज अवतार..." भगवान इन्हीं की सेवा के बल पर प्राप्त भी होते हैं।

अब राम के जन्म की कथा देखिये। पुत्रेष्ठि यज्ञ के महाप्रसाद का पात्र महाराज दशरथ ने माता कौशल्या को दिया, पर उन्होंने उस पात्र का आधा हिस्सा माता कैकई को दे दिया। माता कैकई ने अपने हिस्से का आधा माता सुमित्रा को दे दिया, तो माता कौशल्या ने भी अपने हिस्से का आधा पुनः माता सुमित्रा को दिया। सोचिये न! जिस कुल की माताएं इतनी दानशील हों, वहाँ कैसे न आएंगे राम? जिस आँगन की स्त्रियां त्याग करना सीख लें, उस आँगन के बालक राम जैसे ही होंगे। कोई संदेह नहीं...

एक बार भगवान राम के लिए लिखे गए एक लेख की एक पंक्ति से असहमत हो कर कुछ मित्रों ने मुझे गालियां दी थीं। मुझे आज भी दया आती है उन लोगों पर... जिस व्यक्ति ने भगवान श्रीराम के चरित्र को समझने का हल्का प्रयास भी किया हो, वह किसी को गाली दे ही नहीं सकता। भगवान श्रीराम वे महापुरुष थे जिन्होंने अपने सबसे बड़े शत्रुओं बाली और रावण की पत्नियों तक को प्रणाम किया था। प्रभु ने तो उस मंथरा तक को सम्मान दिया था जिसने उन्हें वनवास कराने का षड्यंत्र रचा था।

मेरे एक दिल्ली वाले भइया हैं। वे कहते हैं कि देश के एक प्रतिशत पुरुष भी यदि भगवान राम की तरह जीना सीख लें, तो देश स्वर्ग हो जाएगा। पर राम की तरह जीना इतना आसान भी तो नहीं...

खैर! चइत चल रहा है। प्रकृति की ओर निहारिये, कण-कण में राम उतरे हुए हैं। राम का स्मरण करते रहिए, कोरोना दैत्य से लड़ाई आसान हो जाएगी।

जय जय सियाराम।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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