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धर्म की रक्षा ,मानवता का संदेश व आपस मे बढ़ रही वैमनस्यता को दूर करने कब लिए अवतरित हुवे थे परम पूज्य बाबा गणिनाथ :- संजय गुप्ता

धर्म की रक्षा ,मानवता का संदेश व आपस मे बढ़ रही वैमनस्यता को दूर करने कब लिए अवतरित हुवे थे परम पूज्य बाबा गणिनाथ :- संजय गुप्ता

भगवान शिव जी के परम भक्त श्री मंशाराम महनार(वैशाली) में गंगा के किनारे अपनी एक कुटिया में सपत्नीक रहते थे।मंशाराम जी सात्विक और धार्मिक विचारों को मानने वाले थे।वे अपने गृहस्थ जीवन के साथ साथ अपने भोले बाबा की सदैव उपसना किया करते रहते थे उनका अपना जीवन से खुश रहते थे संतानहीन होने बाद भी अपने इश्वेर पर पूरी तरह से विश्वास था. इसी विश्वास और मंशाराम की भक्ति से भोले बाबा प्रशन्न होकर एक रात उनके सपने आये और कहा कि जल्द ही आपको आपकी भक्ति और विश्वास का फल मिलेंगा।

मंशाराम नित्य प्रतिदिन की तरह लकड़ी लेने के लिए वन में गए. भीतर वन में पहुचने पर मंशाराम क्या देखते है कि एक बालक पीपल के पेड़ के नीचे किलकारी कर रहा है, उसके चेहरे से अद्भुत अलौकिक दिव्य प्रकाश निकाल रहा है, बालक मंद मंद मधुर मुस्करा रहा है,तभी बालक के अद्भुत अलौकिक दिव्य प्रकाश के प्रभाव से उस पीपल के पेड़ से मधु की बूंदे निकल कर बालक के मुँख में जा रही थी और वह बालक उस मधु को बड़े चाव से मधुपान करने लगे.बालक के इसी अद्भुत अलौकिक दिव्य प्रकाश का प्रभाव ही था वन में सारे जीव जंतु खुश होकर इधर उधर विचरण करने लगे

मंशाराम इस द्रश्य को देखकर भावविभोर हो कर अपनी सुधभुध खो बैठे.तभी आकाशवाणी होई कि मंशाराम, ये है तुमारी भक्ति का फल, इस बालक को अपने घर ले जाओ और इसे अपने पुत्र की तरह पालन करो मंशाराम उस बालक को अपनी गोद में लिया और अपने कुटिया में पहुँच कर और पत्नी से बोले यह बालक अपना है भोले बाबा ने तुम्हरी गोद भर दी।बालक के अद्भुत अलौकिक दिव्य प्रकाश के कारण गांव में समृधि बढ़ने लगी. मंशाराम जी की इच्छा थी कि अपने स्वजनों को भोज में तसमई खिलाए पर वे अपने इस इच्छा को पूरी नही कर पा रहे थे अगर इस कार्य में कोई बाधा थी वो था धन जो मंशाराम के पास पर्याप्त नहीं था।

बालक अपनी पिता की इस इच्छा को जानकर सभी स्वजनों को निमंत्रण भेजा।निमंत्रण स्वजनों को मिलने की सूचना मिल गयी यह जानकर मंशाराम ने भोज की तैयारी करने लगे भोज को तैयार करने वास्ते पर्याप्त बर्तन मंशाराम के पास नहीं थे, और बर्तन के लिए वे कुम्हार के पास गए और बर्तन माँगा, कुम्हार मंशाराम की आर्थिक को जानकर बहाने बना कर बर्तन देने से मना कर दिया.मंशाराम उदास हो गए पिता की उदासी को देख कर बालक ने अपनी लीला दिखाई. वही कुम्हार जब अपने बर्तन को पकाने के लिए आव लगाया तो वो जला ही नहीं, लाख प्रयतन करने पर भी आव नहीं जला तो नहीं जला।

तभ कुम्हार हार कर अपने इश्वर *को स्मरण किया इश्वर ने उसकी की गयी गलती को बताया, अपनी गलती को जानकर, कुम्हार भाग कर बालक के चरणों में लेट गया और भूल को स्वीकार किया.बालक ने उसकी इस गलती को क्षमा कर दिया. कुम्हार का आव लग गया, बर्तन मंशाराम को दिया.बर्तन की व्यवस्था हो जाने के बाद मंशाराम दूध के लिए ग्वाले के पास गए, ग्वाला जो काना था उसने भी बहाना बनाकर दूध देने से मना कर दिया. और एक गाय जो दूध ही नहीं देती थी, की ओर इशारा कर कहा उसे ढूह लो और ढूध ले लो, बालक जो मंशाराम के साथ थे फिर अपनी लीला दिखाई और उसी गाय ने इतना दूध दिया कि ग्वाला आश्चर्यचकित हो गया और वह समझ गया कि यह बालक साधारण बालक नहीं है, तुरंत बालक के चरणों में लेट गया,और क्षमायाचना की बालक ने क्षमा कर दिया और उसकी आँख भी ठीक कर दी

तय समय पर भोज में तसमई पकाई गयी और तसमई को सभी लोगो ने खाया और इसकी स्वाद की महक से आस पास के लोग भी आने लगे, पर यह तसमई कम नहीं पडी सभी ने इसका आनंद लिया. बालक की इस लीला को देख कर सभी लोग भोले बाबा की जयकरा लगाया और बालक का नाम गणिनाथ रखा और जय जय कर किया. बालक गणिनाथ ने तपस्या करने के लिए पिता मंशाराम से अनुमति मांगी, अनुमति मिलने पर तपस्या के लिए हिमालय पर्वत पर गए और पूरे अठ्ठारह वर्षों तक तपस्या की.तपस्या और योग से गणिनाथ जी ने आठ सिद्धि और नौ निधि को प्राप्त किया. गणिनाथ जी तपस्या पूरी करने के बाद वापस अपने गांव आये और एक यज्ञ का आयोजन किया

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