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खुशहाली के रंग इस बार जम्मू में एक नई उमंग,उल्लास और ऊर्जा के संग खिले है।

खुशहाली के रंग इस बार जम्मू में एक नई उमंग,उल्लास और ऊर्जा के संग खिले है।

जम्मू में होली बहुत ही उमंग,उल्लास ऊर्जा के साथ मनाई जाती है।जिस तरह देश के बाकी हिस्सों में होली के रंगों की बौछार मे भीग जाते हैं,उसी तरह जम्मू के लोग भी खूब होली खेलते हैं।जम्मू में होली की परंपरा पंजाब,दिल्ली जैसे इलाकों की परंपरा से अधिक मेल खाती हैं।जम्मू में होलिका का त्यौहार बड़ा माना जाता हैं।होली के गीत गाते है,होलिका का दहन करते है,एक दूसरे के घर जाते है,रंग लगाते है एक दूसरे को,युवा और बुजुर्गं सब एक रंग में रंग जाते हैं।जम्मू में होली पर संगीत के ढेर सारे कार्यक्रम भी होते हैं।लेह में होली केवल आर्मी कैंप में दिखाई देती हैं।सामान्य रूप से वहां होली कहीं नही दिखती।

कश्मीर में होली मनाने की परंपरा का जिक्र न तो साहित्य में मिलता है न ही किसी ऐतिहासिक दस्तावेज में मिलता है कि कश्मीर के लोग होली मनाते थे।अक्सर लोगों को एक भ्रम होता हैं कि कश्मीर का नाम कल्हण के नाम पर पड़ा लेकिन वास्तव में कश्मीर का नाम कश्यप ॠषि के नाम पर पड़ा।कल्हण एक इतिहासविद थे और वह बहुत बाद में आते हैं।जहां तक कश्यप ॠषि की बात है तो मेरी नजरों से हजारों गीत गुज़रे होंगे लेकिन उनमे कही भी कश्यप ॠषि के समय में होली मनाए जाने का जिक्र नही मिलता हैं।यहां तक कि संस्कृत में भी कही ऐसा कोई साक्ष्य नही मिला कि उनके समय में होली मनाई जाती थी।वैसे तो होली ने मुस्लिम रचनाकारों-कलाकारों को भी अपने रंगों में रंगा है लेकिन वह पंजाब,दिल्ली और राजस्थान आदि के सूफी रचनाकारों को खासकर कृष्ण भक्तों को।कश्मीर की सूफी रचनाओं में होली का कोई जिक्र नही मिलता है।व्यवहारिक रूप से कश्मीर में होली बहुत कम होती रही है।परंपरागत रूप से कुछ परिवार ही होली मनाते रहे है।

अलबत्ता होली पर रंगोली जरूर बनाई जाती है।इसकी वजह यह है कि कश्मीर के लोग सूर्य के उपासक हैं।मुझे लगता है कि इसके पीछे उनका उद्देश्य यह होता है कि इसके बहाने सब लोग एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं।

होली का का अधिक जिक्र धमार में मिलता है।

होली खेलत नंदलाल जैसी अनेक लोकप्रिय संगीत रचनाएँ तो सभी ने सुनी गुनी हैं।कुछ संगीत रचनाएँ ध्रुपद में हैं और कुछ ख्याल गायकी में भी हैं,रंग लगाओ अपने पिया को,जबसे मेरे पिया घर आए,नाचो-गावो धूम मचाओ।लेकिन होली के अधिकतर कार्यक्रमों में ठुमरी अंग की बंदिशे ही गाई बजाई जाती हैं या फिर धमार गाया जाता है,जिसमे होली का जिक्र आता है।

मेरा मानना है कि होली हर जगह होनी चाहिए क्यो कि यह एक ऐसा उत्सव है जिसके रंग में जाति, मजहब,ऊंच-नीच,अमीर-गरीब ये सभी रंग दब जाते हैं।एक नया रूप निखरकर सामने आता हैं।इंसान-इंसान में समानता आ जाती हैं।दूरियां मिट जाती हैं।मेरे विचार से होली का अर्थ ही है कि सारे द्वेष भुलाकर एकता स्थापित हो,एक संगठन बने।इस लिए ये त्यौहार को हर जगह मनाया जाना चाहिए।

कश्मीर के सूर्य उपासक नई तरंग में हैं,तो लेह में सीमा की सुरक्षा कर रहे सैनिक नए जोश में

दूरियां मिटाकर रंग एक-दूसरे के गले मिल गए है।

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