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मेरे गुलशन को भस्म कर.....तुम क्या पाओगे

मेरे गुलशन को भस्म कर.....तुम क्या पाओगे


मेरे गुलशन को भस्म कर ।

क्या हासिल कर पाओगे ?

जतन से सिंचा है इस मुल्क को जिसने ।

उनके अरमानो को दफनाओगे ।।

नफ़रतों के बीज बोकर तुम ।

इस कदर हिंसक बन जाओगे ।।

कैसी आजादी,किससे आजादी ।

बर्बादी की राह अख्तियार कर बताओगे ।।

भूला गये इंसानियत को ।

खून के प्यासे बन जाओगे ।।

नेपथ्य में किरदार कोई और हैं ।

बाग में पत्थर बरसाने की होंड है ।।

बहकावे में आकर तुम कब तक ।

उत्पात,आगजनी सिर्फ मचाओगे ।।

बिगाड़ कर आबोहवा को ।

सुलगा कर आखिर माने तुम ।।

सजा कर महफिल बाग में ।

झोंक रहे क्यों संपदा को आग में ?

कुछ सियासतदान उलझा कर रख दिये ।

सजा कर हमें अपनी चाहत की दुकान में

एक चिराग बुझ गया ।

अपनी फर्ज निभाने में ।।

अभय सिंह की कलम से .....

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