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जंगल में जब से सोशल मीडिया ने पांव पसारा....

जंगल में जब से सोशल मीडिया ने पांव पसारा....

जंगल में जब से सोशल मीडिया ने पांव पसारा, सबसे अधिक चुनौती अपने साम्राज्य बचाने को लेकर शेर को आयी. इंटरनेट ने जंगल की तस्वीर ही बदल डाली. जंगल के भीतर एक नई चेतना का उदय हुआ.

भैंसों के झुंड द्वारा शेर के काम तमाम करने वाले वीडियो ने भैंसों के कुनबे में आत्मविश्वास का संचार किया. उस वीडियो ने उन्हें समूह में रहने का लाभ एवं अपनी सींगों की क्षमता का बोध कराया. उधर शिकारी कुत्तों के बीच एक दूसरे वीडियो ने तहलका मचा रखा था जिसमें एक शिकारी कुत्तों के झुंड ने दौड़ते-दौड़ते शेर की हेकड़ी निकाल दी थी. लकड़बग्घे, मगरमच्छ, अजगर वैगरह तो बिना सोशल मीडिया के मोर्चा खोलकर रखे थे लेकिन अब नये-नये वीडियो ने शिकार की नई तकनीक एवं बारीकियों का ज्ञान कराया.

उसी तरह लगभग हर प्रजाति, अपने कुनबे के किसी योद्धा का वीडियो देखकर कुलांचे भर रहा था. अपने दंत-नख को तीक्ष्ण करने में जुटा था.

शेर की चिंता सिर्फ इतनी ही नहीं थी कि भैंसे उनसे नहीं डरते या कुत्ते उन्हें आंख दिखा रहें हैं..परेशानी यह भी थी कि जंगल में इस तरह के मैसेज या वीडियो की भरमार थी जिसमें शेर के चरित्र एवं कमजोरियों का मजाक बनाकर पेश किया जा रहा था. यहाँ तक कि खरगोश भी अपने कुनबे में यह वीडियो दिखाकर ठिठोली करते पाया गया जिसमें एक चतुर खरगोश ने शेर को बहकाकर कुएँ में गिरा दिया था. दिन प्रतिदिन शेर की घटती संख्या के आंकड़े, नर सिंहों के बीच आपसी वैमनस्य को हथियार बनाकर जंगल में वायरल किया जाने लगा. चिड़ियाघरों में बंद कमजोर शेरों की वीडियो दिखाकर जंगल में खिल्ली उड़ायी जाने लगी. हद तो तब होने लगा जब अनजान नम्बर से शेर के वाट्सएप पर भैंसे या कुत्ते द्वारा उसी को खदेड़ने का वीडियो सेंड किया जाने लगा.

अब शेर की दहाड़ में इतना माद्दा नहीं रह गया कि वो दहाड़ के बल पर हुकूमत कर ले. पूरे जंगल को सिर्फ अपनी एक दहाड़ पर इकट्ठा कर ले या बुला ले. पेड़ पर बैठा बंदर अपने वाट्सएप चैटिंग में मशगूल रहता और उसे खबर ही नहीं होती कि नीचे से हुक्मरान गुजर गये. हिरन अपना झुंड बनाकर गूगल पर 'हाऊ टू सेव टाइगर' और "वीक पाइंट अॉफ लॉयन' सर्च करते.

अब स्थितियां बदल चुकी थीं. जंगल के जानवर अपने अपने हिसाब से लाबिंग कर रहे थे..सींग वालों का अपना वाट्सएप ग्रुप था.. पंख वालों का अपना, कूदने.. उछलने, तैरने वालों ने अपने हिसाब से मेम्बर बनाकर रखे थे. शाकाहारी, मांसाहारी, सर्वाहारी सभी ने अपने लोगों को ऐड करना शुरू कर दिया था.

शेर, शिकार में कमजोर पड़ने लगे, जिसकी वजह यह कि शेर की लोकेशन सेंड कर दी जाती थी. शेर जिधर से निकले उधर के लोगों तक यह खबर मैसेज की जाने लगी. शेर पूरे दिन टहलने और दौड़ने पर एक भी शिकार नहीं कर पाता. शेरनियों ने शेर के पौरुष को ललकारना शुरू कर दिया.

जंगल का पूरा सिस्टम बदल चुका था यहाँ तक की एक अदना सा सियार भी शेरनी के इनबाक्स में आकर 'लव स्टिकर' चिपकाकर मजे लेने लगा. बंदर और भालू तो लाइव आकार शेर को "का हो मामा का हाल बा" बोलकर खिल्ली उड़ाने लगे. लकड़बग्घों का एक खतरनाक ग्रुप अब सिर्फ शेर का शिकार करने का मोटिवेशनल वीडियो और आडियो बनाने में जुटा रहता.

सारे युद्ध आनलाइन होने लगे.. शेर की वॉल पर भेड़िया और सियार आकर ललकारने लगे. पूरी-पूरी रात शेर और सियार की गालीगलौज में बीत जाती. स्थितियां विकट होती चली जा रहीं थी. नये लड़के तो शेर का फोटोशॉप भी बनाने लगे. कोई शेर के साथ गधी को दुल्हन के रूप में जोड़ देता तो कोई उसके सिर की जगह पर कुत्ते का सिर जोड़कर ग्रुप में भेज देता.. यहाँ तक की कुत्तों ने अपने ग्रुप का नाम ही रख दिया " द डॉग इज किंग'

शेर के बच्चे ने युद्ध कौशल को छोड़कर बसंत पर प्रेम की कविताएँ पढ़ने लगे.. शेरनियों ने भी अपना अलग ही ग्रुप बना रखा था जिसमें शेर की पुरुषवादी मानसिकता को लेकर जहर उगले जाते थे..

पूरा जंगल अपवाहों के गुलाल से गुलज़ार हो गया.. शेरनी का लकड़बग्घे से प्रेम सम्बन्ध की अपवाह उड़ायी गई, शेर को समलैंगिक बताया गया..चमगादड़ को जंगल से दूर खदेड़ दिया गया, सूअर को जंगल की पहाड़ी के उस पार बसाया गया. चिड़ियों पर जासूसी का आरोप मढ़ा गया. बंदर को मगरमच्छ वाली कहानी सुनाकर नदी से दूर रहने की हिदायत दी गई. खरगोश को कछुए से हारने का वीडियो दिखाकर उसका मनोबल तोड़ा जाने लगा. गिरगिट के रंग बदलने वाले गुण को धूर्त और मक्कार बताया जाने लगा. शेर की तरफदारी करने वालों को तलवे 'चाटने वाला कुत्ता' की संज्ञा दी जाने लगी.

जंगल में अब कोई नहीं बचा, कुछ भी गोपनीय नहीं रहा. कौन कहां से वीडियो बना लेगा कोई नहीं जानता इसलिए सबलोग सतर्क हो गये..

जंगल में अब कोई शेर नहीं, और वो हर कोई शेर है जिसके हाथ में मोबाइल है..

जमाना वाकई बदल चुका है..

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रिवेश प्रताप सिंह

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