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अहं ब्रह्मास्मि!

अहं ब्रह्मास्मि!

क्यों परेशान हो जाते हो मन?

क्या जरूरी है किसी और का कंधा?जैसा कि पहले ही मैंने तुमसे कहा है कि तुम्हारे सिवा कोई और तुम्हे नही बना सकता।

तुम ही तुम्हारे ब्रह्म हो।

फिर तुम ये कैसे उम्मीद करते हो कि कोई तुम्हारे बढ़ती उम्र के अंदर बैठे नादान बच्चे को खेलायेगा,पुचकारेगा,उसके नखरे उठाएगा,उसकी जिद पूरी करेगा,प्रेम देगा।

हां अगर तुम्हारे पास अभी भी ऐसा कोई है तो कड़वी सच्चाई तक पहुंचने से पहले पूरी निष्ठा से उसको उसके हिस्से का प्रेम दो,जितना दे सको,बिना उम्मीद के,क्योंकि तुमको हकीकत पता है,तुम ब्रह्म हो।

अगर ऐसा कोई नही है,या चला गया तो शोक क्यों?

तुम ब्रह्म हो,तुम खुद को बना सकते हो तो खुद को संजो क्यों नही सकते?खुद की सारी ख्वाहिशें पूरी क्यों नही कर सकते?खुद से मुहब्बत क्यों नही कर सकते?जिस मुहब्बत की उम्मीद तुम कहीं और से करते हो वो खुद को देकर खुद से रिटर्न क्यों नही ले सकते?

तुम कर सकते हो ये....

कहो 'अहम ब्रह्मास्मि'।

फिर भी तुम तुम्हारे ब्रह्म को अनदेखा करके बस उम्मीदें पालते हो तो तय है कि तुम्हारे हिस्से बस आंसू हैं।

....और आंसूओ में पड़ने के बाद भी हो सकता है कि तुम कुछ दिन के लिए निकल जाओ इन आंसूओं से,जीत जाओ तकलीफों से और 'बड़ा' बन जाओ,पर तब भी तुम्हे एक नियत अंतराल के बाद रोना ही पड़ेगा,क्योंकि तुम 'बड़े' हो जाओगे पर 'सयाने' नही।

....बड़े बड़ों को नाना प्रकार के कष्ट में बिलखना पड़ता है,पर सयाने या तो उस दुःख को पास आने का मौका नही देते,या फिर उन दुखों से मुस्कुराकर बाहर निकल जाते हैं।

सो कहो अहं ब्रह्मास्मि!

सयाने हो जाओगे...

रे मन!

तू बस मन नही ब्रह्म है,तेरा ब्रह्म,जो तुझे बनाता भी है तेरा लालन पालन भी करता है।

पवन कुमार अर्पित

'आरा'

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