कवि केदारनाथ सिंह के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी कविता 'विद्रोह'

कवि केदारनाथ सिंह के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी कविता विद्रोह

केदारनाथ सिंह जन्मदिन: आज हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह का जन्मदिन है. उनका जन्म 20 नवम्बर 1934 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव में हुआ था. उनकी प्रमुख कृतियां हैं- अभी बिल्कुल अभी, ज़मीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और बाघ, तालस्ताय और साइकिल. इसके अलावा भी हिंदी साहित्य जगह्त में उनका योगदान काफी अविस्मरणीय रहा है. आइए उनके जन्मदिवस के मौके पर कविताकोश के सौजन्य से पढ़ते हैं उनकी कविता विद्रोह...

विद्रोह:

आज घर में घुसा

तो वहाँ अजब दृश्य था

सुनिए — मेरे बिस्तर ने कहा —

यह रहा मेरा इस्तीफ़ा

मैं अपने कपास के भीतर

वापस जाना चाहता हूँ

उधर कुर्सी और मेज़ का

एक सँयुक्त मोर्चा था

दोनों तड़पकर बोले —

जी, अब बहुत हो चुका

आपको सहते-सहते

हमें बेतरह याद आ रहे हैं

हमारे पेड़

और उनके भीतर का वह

ज़िन्दा द्रव

जिसकी हत्या कर दी है

आपने

उधर आलमारी में बन्द

क़िताबें चिल्ला रही थीं

खोल दो, हमें खोल दो

हम जाना चाहती हैं अपने

बाँस के जंगल

और मिलना चाहती हैं

अपने बिच्छुओं के डंक

और साँपों के चुम्बन से

पर सबसे अधिक नाराज़ थी

वह शॉल

जिसे अभी कुछ दिन पहले कुल्लू से ख़रीद लाया था

बोली — साहब!

आप तो बड़े साहब निकले

मेरा दुम्बा भेड़ा मुझे कब से

पुकार रहा है

और आप हैं कि अपनी देह

की क़ैद में

लपेटे हुए हैं मुझे

उधर टी० वी० और फ़ोन का

बुरा हाल था

ज़ोर-ज़ोर से कुछ कह रहे थे

वे

पर उनकी भाषा

मेरी समझ से परे थी

कि तभी

नल से टपकता पानी तड़पा —

अब तो हद हो गई साहब!

अगर सुन सकें तो सुन

लीजिए

इन बूँदों की आवाज़ —

कि अब हम

यानी आपके सारे के सारे

क़ैदी

आदमी की जेल से

मुक्त होना चाहते हैं

अब जा कहाँ रहे हैं —

मेरा दरवाज़ा कड़का

जब मैं बाहर निकल रहा था।

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