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मेरे राम!

मेरे राम!

यूँ तो प्रभु श्रीराम पूरे विश्व के हैं, पर उनको सबसे अधिक प्रेम किसी ने किया तो उनके ससुराल वालों ने किया, हम पूर्वांचल वालों ने किया। कैसे न करते, हमारे बुजुर्गों ने उन्हें अपनी बेटी दी थी। श्रीराम हमारे लिए प्रभु से पहले पाहुन हैं। और पाहुन का सम्मान करना मिथिला वालों से अधिक कौन जानता है!

हमने प्रभु को इतना प्रेम किया कि उनके धरा धाम से जाने के युगों बाद भी वे हमारे हृदय में ही नहीं, हमारे सम्पूर्ण जीवन में बसे हुए हैं।

हमने उन्हें इतना प्रेम किया कि आज भी जब हमारे आँगन में कोई दूल्हा उतरता है तो हमारी माताएँ उसका नहीं, राम का गीत गाती हैं। आज भी हमारे घर जब कोई पुत्र जन्म लेता है तो हम राम का गीत गाते हैं। हमारा फगुआ, चैता सब राम से ही है। हम राम के बिना जी ही नहीं सकते, राम हमारे प्राण हैं।

हमने अपने श्रीराम से इतना प्रेम किया, कि आज भी हमारी माताएँ खुश हो कर अपनी बेटी को यही आशीर्वाद देती हैं, "जा तुझे राम जैसा दूल्हा मिले..."

प्रभु की तीनों माताओं का सौभाग्य था कि उन्होंने राम को जीवन भर देखा और देख कर खुश होती रहीं। पर एक माँ हमारी ओर भी थीं, श्रीराम की सासू माँ, माता सुनयना! उन्होंने बस एक बार राम को देखा, और राम पर लहालोट हो कर उतना प्रेम किया जितना किसी ने नहीं किया। लोक कहता है, सास का प्रेम माँ के प्रेम से दोगुना होता हैं। आप दामाद के रूप में उस सुन्दर नवयुवक को पा कर खुशी के मारे रो उठी माता सुनयना के प्रेम की कल्पना कर सकते हैं? नहीं कर सकते मित्र! आपको सर्वेश होना पड़ेगा, आप को रोना पड़ेगा...

आप जानते हैं, आज भी मिथिला के असँख्य बुजुर्ग अयोध्या के क्षेत्र में अन्न-जल ग्रहण नहीं करते। बेटी के गाँव में अन्न-जल ग्रहण नहीं करते न! फिर अपनी मिट्टी की सबसे यशश्विनी, सबसे पूज्य बेटी के गाँव में कैसे अन्न जल ग्रहण कर लें। उसके गाँव में जब तक रहेंगे, निराहार रह कर व्रत करेंगे। अयोध्या हमारे लिए स्वर्ग है, तभी तो हम अयोध्या नहीं, अयोध्या जी कहते हैं।

तुलसी बाबा ने लिखा है,मिथिला के पथ पर गुरु के साथ चलते राम-लक्ष्मण को देख कर विह्वल हुए छोटे-छोटे बच्चे उन्हें छू कर देखते थे। उनकी आँखें जैसे कहती थीं, "कौन है यह देवता? काश! कि यही धनुष तोड़ता..."

उन्हें देख कर विह्वल हुई मिथिला की स्त्रियाँ मन ही मन कहती थीं, "वर हो तो ऐसा हो..." यह विह्वलता केवल हमारी मिट्टी में हुई है।

राम को मिथिला के कण-कण ने प्रेम किया है। टूट कर प्रेम किया है। तभी जब राम मन्दिर के पक्ष में कोर्ट का निर्णय आया तो मन्दिर निर्माण के लिए सबसे पहले पटना हनुमान मंदिर ट्रस्ट से महाराज किशोर कुणाल जी ने दस करोड़ रुपये देने की बात कही। बात धन की नहीं है, धन तो भारत में इतना आ जायेगा कि सोने की मन्दिर बन सकता है। बात उत्साह की है। राम का नाम सुनते ही उछल पड़ते हैं हम... कैसे न उछल पड़ें? उनके ससुराल वाले हैं न...

जय हो पाहुन की... जय जय सियाराम

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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