तुम नफरत की दीवारें खड़ा करोगे, मैं काँधे पे गमछा रख तुम्हारी सारी कूटनीतियाँ ध्वस्त कर दूंगा

तुम नफरत की दीवारें खड़ा करोगे, मैं काँधे पे गमछा रख तुम्हारी सारी कूटनीतियाँ ध्वस्त कर दूंगा

इधर धान का बोझा चौकी पर पटकता हूँ तो पता चला है कि दिल्ली के एक होटल के मालिक ने मेहनतकश कांधे पर रखे गमछे से उसका अधिकार छीन लिया। छीन लिया गया उस गमछे का रंग। अलग कर दिए गए उसके धागे, धागे की एकता, उसकी लोकरसता और परिधानता को।

होटल के मालिक को लगा होगा कि वो लार्ड कर्जन है। बंगाल की तरह गमछे की चौहद्दी को भी अलग अलग हिस्सों में बाँट देगा, भून देगा। पर ऐसा नहीं है हमेशा वक़्त एक जैसा नहीं होता। ये कर्जन का विभाजन नहीं हम इंसानों की एकात्मकता है। ये समुहबद्धता ही है कि पिछले दो दिन से समाज के हरेक वर्ग सोशल मीडिया पर अपने पहनावे के साथ, अपने गमछे के साथ खड़े हैं और आजीवन खड़े रहेंगे।

पैदा भी हुए थे तो माँ के आँचल के बाद बाबूजी का गमछा ही पीठ के नीचे बिस्तर बना था। मरेंगे भी तो काँधे पर गमछा रख साँस रोक देंगे।

थोड़ी बहुत जरूरत है तो उस होटल के अधिपति को अपने रसोइघर में जाकर अपने रसगुल्लेनुमा नेत्र में मोटका लेंस लगाकर देखने की कि उनके होटल के व्यंजन का मुख्य ईंधन क्या है ? किस चीज पर पलकर उनका बेटा देश विदेश में पढ़ रहा है? कहीं वो पैसा इन मेहनतकश गमछे वालों का ही तो नहीं ? कितना सही है लोक परिधान के साथ छेड़छाड़, भेदभाव करने की ?

उन्हें पता होनी चाहिए कि जब आप अपने ही देश के मेहनतकश नागरिक को होटल में प्रवेश करने से रोक रहे होंगे सिर्फ इसलिए कि उनके काँधे और गले में गमछा है तभी गाँव में पूरब टोला का गुडुआ, रकेसबा, पंकजवा, सुनिलवा जैसे हजारों लोग दस दिन की छुट्टी लेकर, हाथ से कलम छोड़ हँसुआ पकड़कर दिन दोपहरिये भोर करके धान की कटनी कर रहा होगा। मेहनत की फसल काट रहा होगा जिसको उसने काँधे पर गमछा रख ही दुलारा, बोया और उपजाया है।

जब आप गलती करने के बाद भी लोक परिधानता से थेथरोलॉजी कर रहे होंगे तभी गाँव की चाची गुडुआ के बाबूजी का गमछा अपने माथा पर रख बोझा ढो रही होंगी। तुम्हारे सात मंजिले होटल का दबाव और लाखों के घाटे का वजन अपने माथे पर गमछा रख तौल देंगी ये महिलाएँ।

तुम भूल रहे हो कि जिस बाजार से तुम्हारे होटल के महँगी थाली में भोजन परोसा जाता है उसका जैविक ईंधन वो गमछे वाले चाचा, दादा भैया फूफा और आँचल ओढ़ी चाची, दीदी और बुआ ही हैं।

तुम नफरत की दीवारें खड़ा करोगे, मैं काँधे पे गमछा रख तुम्हारी सारी कूटनीतियाँ ध्वस्त कर दूंगा।

आने वाली पीढ़ी जब हमसे आपसे पूछेगी कि अपने ही देश के दूसरे राज्य ने तुम्हारे लोक परिधान के गमछे को कबाड़ फेंक दिया तब तुम क्या कर रहे थे। तब हम सब गर्व से कह सकेंगे कि हम सबने अपने काँधे पर गमछा रखा, माथे का पसीना पोछ एक साथ खड़ा हुआ और लड़ा। गमछे के गुरूर को बचाने खातिर हाथ में हाथ डालकर एक श्रृंखला बनायी।

खड़ा होकर लड़ते रहिये लड़ते रहने पर तो मजबूत अर्थव्यवस्था वाली सरकार भी भीड़ के सामने झुक जाती है ये तय फिर भी शीशे का एक दरवाजा था।

जय हो।

अभिषेक आर्यन

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