एक ही तस्वीर के कई पक्ष होते हैं....

एक ही तस्वीर के कई पक्ष होते हैं....

दीयों से तेल इकट्ठा करती इस बालिका की तस्वीर अयोध्याजी के घाट से ली गई है, जहाँ दीपावली की रात पाँच लाख दीये जलाए गए थे। तस्वीर में दिख रही बालिका कोई भी हो सकती है। इसका नाम कुछ भी हो सकता है। सुनीता, ममता, लक्ष्मी, फातिमा, या जैकलिन भी...

प्रथम दृष्टया इस तस्वीर में आपको दरिद्रता दिखती है, और आपके भीतर करुणा उपजती है। उपजनी भी चाहिए, दरिद्रता पर करुणा न उपजे तो व्यक्ति के मनुष्य होने पर सन्देह होता है। यह कहा जा सकता है कि जिस राजा के राज में इतनी दरिद्रता हो कि नन्ही बालिकाओं को बुझ चुके दीयों से तेल इकट्ठा करना पड़े, उस राजा को आडम्बरों में पैसा खर्च करने का अधिकार नहीं है।

सही बात है, किंतु इस तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है।

इस तस्वीर के दूसरे पक्ष में एक पिता है, जिसने अपनी बेटी को दीयों से तेल इकट्ठे करने के लिए हाँक दिया है। संभव है यह लड़की दो-चार या आठ-दस भाई-बहनों के बीच से हो। पिता ने केवल इसे जन्म भर दिया है। पर क्या सचमुच उसे इसे जन्म देने का अधिकार था?

भारत को सोचना होगा कि जो पिता अपने एक बच्चे को भी पाल सकने की सामर्थ्य नहीं रखता, क्या उसे आठ बच्चों को जन्म देने का अधिकार है! नहीं है।

दरिद्रता दूर करने का कर्तव्य केवल सत्ता का नहीं होता। इस देश की सरकारों ने पिछले 75 वर्षों में सबसे अधिक धन का व्यय इसी दरिद्रता को दूर करने में किया है, किन्तु कुछ नहीं बदला। अगले पचहत्तर वर्षों में भी कुछ नहीं बदलेगा। हम पक्ष-विपक्ष करते रह जाएंगे, हम भाजपा-कांग्रेस करते रह जाएंगे, पर धरातल की स्थिति नहीं बदलेगी। जब तक मनुष्य सड़क के किनारे उग रहे आवारा घास की तरह संतान उत्पन्न करता रहेगा, दुनिया की कोई ताकत भारत से दरिद्रता को नहीं मिटा सकती...

संतान जब माता-पिता के पुण्य का फल बनकर जन्म ले तो यशस्वी होती है, किंतु जब पिता के क्षणिक आनंद के दुष्प्रभाव के रूप में जन्म ले तो यूँ ही दीयों से तेल बटोरती है। यह केवल भारत का नहीं, समूचे विश्व का सत्य है।

भारत ने यदि सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती जनसँख्या को नहीं रोका, तो भारत शीघ्र ही विश्व का सबसे दरिद्र देश होगा।

वैसे इस तस्वीर का एक तीसरा पक्ष भी है। तीसरे पक्ष में है वह कैमरामैन, जिसने यह तस्वीर खींची है। संभव है यह तस्वीर केवल इसीलिए खींची गई हो, ताकि विश्व को दिखाया जा सके कि भारत कितना दरिद्र है। यह भी संभव है कि इस लड़की को तस्वीर खींच लेने भर के लिए ही बुलाया गया हो, और तस्वीर के बदले में उसे बीस रुपये मिले हों। संवेदनाओं के बाजार में दरिद्रता सबसे महंगी बिकती है। महीने भर पूर्व ही हमने देखा है कि रानू मंडल की दरिद्रता को बेचकर सिनेमा ने किस तरह से अरबों की टीआरपी कमाई है। यह बाजार है और इस बाजार में कुछ भी संभव है।

इस तस्वीर का एक चौथा पक्ष भी है, और इस पक्ष में है भारत की सवा अरब जनसंख्या! जिसकी सोच इस बात पर निर्भर करने लगी है, कि उसे क्या दिखाया जा रहा है। बाजार उसे जो दिखाता है, वह उसी को सही मान लेती है। इस देश कि दुर्गति का एक कारण यह भी है।

वैसे इस तस्वीर का एक पाँचवा पक्ष भी है जिसमें मैं खड़ा हूँ। पता नहीं क्यों...

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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