दीपावली : सार्वभौमिक सर्वकालिक प्रकाश का महा उत्सव

दीपावली : सार्वभौमिक सर्वकालिक  प्रकाश का महा उत्सव

धर्मोत्सव का जो स्वरुप भारत में है वैसा विश्व में कहीं नहीं है। भारतीय उत्सव दायित्व, प्रदर्शन, दृश्य-कला और भोजन परम्पराओं की विविधता से आप्लावित है। हर उत्सव के साथ नृत्य और गायन के विविध स्वरुपों की मौजूदगी, हमारी मजबूत मनोरंजन संस्कृति की वाहक है। जो हमें तनाव, अवसाद और विचलनों से विलग रखती है। उत्सव हर भारतीय के जीवन का मूल हिस्सा है। उत्सव हमें एकजुट रखते हैं। ये हमारे उत्सव ही हैं कि सबको एक-दूसरे की संस्कृति और परंपरा को जानने, समझने और जीने का अवसर मिलता है। इनमें सक्रिय भागीदारी ही हमें यह बताती है कि हम एक-दूसरे को कितना समझना/जानना पसंद करते हैं। यही हमारी सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की परिचायक है। यही वह शैली है जिसके जरिए विविधता एकता में रुपांतरित होती है। भाषा-बोली, खान-पान, रहन-सहन, वस्त्र-आभूषण और पूजा-पद्धति सब वैविध्य लिए उत्सवों में समरस होकर समाज में समाहित होने को लालायित रहते हैं। इतनी विविधता के बावजूद हम भारत में लोग एकजुट हैं इन्हीं महान सांस्कृतिक परंपराओं के कारण। ये ही हमें भारतीय बनाती हैं।

दिवाली भारत का बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है क्योंकि केवल भारत में ही इस त्यौहार से बहुत सारी हिन्दू भगवान की कहानियॉ और किवदंतियॉ जुङी हुई है। दिवाली त्यौहार की सभी किवदंतियॉ जैसे: भगवान राम और सीता की कहानी, महावीर स्वामी की कहानी, स्वामी दयानन्द की कहानी, राक्षस नरकासुर की कहानी, भगवान कृष्ण की कहानी, पांडवों की कहानी, गणेश और देवी लक्ष्मी की कहानी, भगवान विष्णु की कहानी, विक्रमादित्य की कहानी, सिख गुरु हरगोविंद की कहानी आदि और बहुत सी कहानियॉ है जो केवल भारत से ही जुङी हुई है। इसी लिये भारत में दिवाली का महत्व मनाया जाता है।

त्रेतायुग में भगवान राम जब रावण को हराकर अयोध्या वापस लौटे, तब श्रीराम के आगमन पर दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया और खुशियां मनाई गईं।

यह भी कथा प्रचलित है जब श्रीकृष्ण ने आततायी नरकासुर जैसे दुष्ट का वध किया, तब ब्रजवासियों ने अपनी प्रसन्नता दीपों को जलाकर प्रकट की।

* विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बलि की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू-लोकवासी प्रत्येक वर्ष ‍दीपावली मनाएंगे।

राक्षसों का वध करने के लिए मां देवी ने महाकाली का रूप धारण किया। राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ, तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर के स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्र रूप काली की पूजा का ही विधान है।

भारतीय लोग बहुत ही धार्मिक और आध्यात्मिक रहे हैं, वे मानते है कि दिवाली पर सभी स्थानों पर दीयें जलाने से बुरी ऊर्जा को हटाकर अच्छी ऊर्जा आकर्षित होगी। वे समाज से इस बुराई को दूर करने के लिए पटाखें जलाकर बहुत तेज ध्वनि करते है। वे अपने घर और मन में आशीर्वाद, बुद्धि और धन का स्वागत करने के लिये रंगोली बनाते है, दरवाजे पर पर्दे लगाते है, देवी लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा करते है। दीवाली के त्यौहार की उत्पत्ति और इतिहास भारत से सम्बन्धित है। वे पूरे वर्ष शुद्ध आत्मा, समृद्धि और भगवान के आशीर्वाद के स्वागत के लिये अपने घरों, कार्यालयों और अन्य काम के स्थानों की साफ सफाई और पुताई कराते है।

दिवाली अच्छाई की बुराई के ऊपर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। दिवाली पर सरसों के तेल के साथ मिट्टी के दीये प्रज्जवलित करने का हिंदू अनुष्ठान है। लोगों के बीच दुश्मनी दूर करने और प्यार और दोस्ती को बढाने के लिये इस दिन मिठाई और उपहार वितरित करते है। यह पूरे भारत के साथ साथ भारत के बाहर भी विभिन्न धर्मों के लोगों द्वारा जैसे: हिन्दू, सिख, जैन और बुद्ध के द्वारा भी मनाया जाता है।

कार्तिक अमावस्या के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविंदसिंहजी बादशाह जहांगीर की कैद से मुक्त होकर अमृतसर वापस लौटे थे।

* 500 ईसा पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के समर्थकों एवं अनुयायियों ने 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में हजारों-लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी।

सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक दीपावली के दिन हुआ था इसलिए दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं।

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों (नदी के किनारे) पर बड़े पैमाने पर दीप जलाए जाते थे।

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन शुरू हुआ था।

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में अपना शरीर त्याग दिया। महावीर-निर्वाण संवत् इसके दूसरे दिन से शुरू होता है इसलिए अनेक प्रांतों में इसे वर्ष के आरंभ की शुरुआत मानते हैं।

दीपोत्सव का वर्णन प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है। कल्पसूत्र में कहा गया है कि महावीर-निर्वाण के साथ जो अंतरज्योति सदा के लिए बुझ गई है, आओ हम उसकी क्षतिपूर्ति के लिए बहिर्ज्योति के प्रतीक दीप जलाएं।

पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय 'ओम' कहते हुए समाधि ले ली।

महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की।

दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे।

* मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेते थे।

* शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लाल किले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।

भारत में दीपावली का यह पर्वोत्सव 5 दिनों का होता है , हर दिन की अलग मान्यता और महत्व है । दीपावली का पहला दिन धनतेरस कहा जाता है।

धन तेरस इस दिन धन की देवी लक्ष्मी तथा देवता कुबेर की पूजा की जाती हैं.

इस दिन से दीपावली का यह महा पर्व शुरू हो जाता हैं. घर में रंगोली बनाई जाती है, शुभ मुहूर्त में सोने, चांदी के बर्तन, गहने ख़रीदे जाते है. इसके साथ ही घर के लिए नया नया समान ख़रीदा जाता है.

नरक चौदस ,यह दूसरा दिन होता हैं इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठ कर स्नान करके सूर्य देवता की पूजा की जाती हैं और माना जाता हैं ऐसा करने से मरणोपरांत स्वर्ग की प्राप्ति होती हैं.

दीवाली ,दीपावली तीसरे दिन मनाई जाती हैं घर में कई पकवानों के साथ सभी परिवार जन देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं और घर के हर एक कोने को दीप प्रज्वलित कर प्रकाशित किया जाता हैं और फटाको की आवाज के साथ इसे मनाया जाता हैं. घर को तरह तरह की लाइट से सजाया जाता है, रंगोली बनाई जाती है.

गोवर्धन पूजा ,यह दीपावली का चौथा दिन होता हैं जिसमे छप्पन भोग बनाकर गोवर्धन की पूजा की जाती हैं विशेषकर यह दिन खेती किसानी वाले लोग मनाते हैं. कई परिवार इस दिन अन्नकूट करते हैं और सभी साथी संगी को भोजन करवाते हैं.

भाई दूज ,यह सबसे आखरी दिन होता हैं, जिसमे बहन भाई को तिलक करती हैं और शादीशुदा बहन भाई को भोजन पर आमंत्रित कर हर्षौल्लास से भाई दूज मनाती हैं.

ये पांच दिनों का महापर्व प्रकाश का उत्सव है। बुराई के अंधकार पर सच्चाई के प्रकाश के प्राकट्य का पर्व है ।

हमारा हर उत्सव हमारे सांस्कृतिक क्रिया-कलापों और रीति-रिवाजों तथा परंपराओं का वाहक है। अपने उत्सवों के प्रति हम अपनी उमंग और उत्साह को इसीलिए कायम रख पाए हैं कि हमारी संस्कृति उदार मन से वैयक्तिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आयामों को समय और परिस्थितियों के हिसाब से समाहित करती रही है। इसलिए यह आज भी अपने मौलिक तत्वों के साथ उपस्थित है। दूसरी संस्कृतियों को सही समय पर सही निर्णय के साथ आत्मसात कर लेना ही इसकी समकालीनता और स्वीकार्यता को बढ़ाता है। समय के साथ चलते रहना भारतीय संस्कृति का अनूठापन है।

डॉ प्रमोद कुमार शुक्ला

समन्वयक,राजीव गांधी स्टडी सर्कल ,गोरखपुर

संपादक , पूर्वा स्टार ( राष्ट्रीय पत्रिका )

पूर्व अध्यक्ष , NSUI , JNU unit New Delhi.

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