एक कहानी : ट्रेन

एक कहानी : ट्रेन

मुझे याद है अभी कुछ साल पहले तक ही घर से कहीं भी बाहर निकलना एक त्यौहार हुआ करता था..अपनी मानसिक और आर्थिक पोज़िशन बलिया स्टेशन से दोनों दिशाओं में जाने वाली पैसेंजर ट्रेनों के साथ ही कम्फर्टेबल हो पाती थी..मेरे लिए ट्रेन का मतलब ही वही जिसमें कि सीट मिल जाए..और थोड़ी देर चलने के बाद घर से छनवाई हुई लिट्टी और हरा मिर्चा खाकर किसी हॉल्ट पर लगे हुए हैंडपंप से दो चिरूवा पानी पीकर सीट के ऊपर सामान रखने वाली जगह पर फैल जाना ही फाइवस्टार अय्याशी हुआ करती थी....

लेकिन, कुछ विशेष नवकमासुत लोगों के मुँह से यदा कदा शताब्दी, राजधानी जैसी ट्रेनों के नाम भी सुनने को मिल जाते थे....ये भी सुनने में आता था कि ये ऐसी ट्रेनें हैं कई कई घँटे रुकती ही नहीं हैं..इनमें बैठने वाले लोगों के पास चाय, बिस्किट, पकौड़ी सबकुछ अपनेआप आ जाता है...और तो और भीतर बैठने पर गर्मी सर्दी भी नहीं लगती है..कम्बल, तकिया और चद्दर भी मिलते हैं..एकदम धुले धुले...

ये ट्रेनें अपनी रफ्तार के साथ उड़ती धूल के आगे छोटे छोटे स्टेशनों को तो आँखें भी खोलने नहीं देती..जब ऐसी ट्रेनें भागती हैं तो ये छोटे स्टेशन अपनी ही तरह की छोटी ट्रेनों को अपनी छाती से चिपकाए रोके रहते हैं क्रॉसिंग के बहाने कि बड़ी ट्रेनों को निकलने में कोई मुश्किल न आ सके...और जब इन तेज भागने वाली ट्रेनों को रुकना होता है तो ये रुकती हैं चमचमाते प्लेटफॉर्म वाले शानदार स्टेशनों पर जहाँ इनके आने से पहले ही इनके आने का उद्घोष हो रहा होता है..

पहले मैं भी तरसता था कि पाँचबजिया पैसेंजर की तरह अंधेरे स्टेशन पर खड़ी हो गई अपनी जिंदगी में भी शताब्दी की स्पीड और राजधानी की एक्यूरेशी क्यों नहीं आ जाती...जब कभी बड़े स्टेशनों पर पैसेंजर ट्रेन पहुंचती है तो उसे सबसे आखिरी का निर्जन वाला प्लेटफार्म ही क्यों मिलता है??

कुछ समय बीता..या यूँ कहें कि समय ने थोड़ी करवट ली...हम नौकरी में आ गए..तनख्वाह पाने लगे...बनारस जाने के लिए पैसेंजर छोड़कर सारनाथ एक्सप्रेस से जाने लगे..थोड़ा और समय बीता तो अब रिजर्वेशन कराने लगे, फ़िर एसी थ्री टीयर, टू टीयर और कुछ समय बाद तो एसी फ़र्स्ट क्लास वाली ट्रेनें ही खोजी जाने लगीं...

अब ट्रेन से कहीं भी जाने में वो पहले वाला अल्हड़पन नहीं रह गया, और क्यों रहे भी आख़िर.. एकएक क्षण कीमती है..ट्रेन में जाने के साथ ही अपनी बर्थ पर बिस्तर बिछाकर, चार्जर को उसके लायक जगह में ठूसकर ठंडी ठंडी यात्रा के लिए ही तो पैसे भरे हैं....

ख़ैर, हुआ यूँ कि कुछ दिन पहले एक काम से मुरादाबाद जाना हुआ...ट्रेन थी 'अर्चना एक्सप्रेस'...सबकुछ मजे में चल रहा था कि लगभग रात के दस बजे एक जोर की आवाज हुई और ट्रेन रुक गई...ट्रेन रुकी और रुकी ही रही..करीब घँटे भर बाद अचानक ट्रेन का एसी भी बंद हो गया...मैंने मोबाईल की लाइट जलाकर खिड़की से बाहर देखना चाहा... लेक़िन, चूँकि खिड़की पर काली फ़िल्म लगी थी और बाहर भी अँधेरा था तो कुछ ठीक से दिखा नहीं..एक ही चीज दिखी जो मेरी वाली खिड़की के ऊपर लिखा था 'आपातकालीन खिड़की'....क्योंकि अब ट्रेन का एसी बन्द था और मेरे भीतर का नवधनाढ्य औकात में आ चुका था इसीलिए ये 'आपातकालीन खिड़की' मुझे बड़ी मजेदार लगी...सच ही तो है कि जहाँ चकाचौंध ज्यादा हो जाती है वहाँ थोड़ी सी मुश्किलें भी बाहर देखने में कुछ ऐसी ही दिक्कते तो पैदा कर ही देती हैं...और ऐसे समय में हमारे मन की चकाचौंध भी तो कोई न कोई आपातकालीन राह ही खोजती है..

अन्य यात्रियों के साथ मैं भी बोगी से उतरने लगा...एक जगह लिखा था कि गाड़ी खड़ी करने की जंजीर बाइं ओर है...मुझे याद आया कि ठीक ऐसी ही जंजीर छपरा से आने वाली पांच बजिया पैसेंजर में भी है...उसे खींचने पर वो भी उसी तरह रूकेगी जैसे ये वाली जंजीर खींचने पर ये तेज भागती 'अर्चना' रुकेंगी....इंसान के जीने का स्तर चाहें जो भी हो, कठिनाइयों को भोगने का तरीका एक ही होता है...

नीचे उतरकर पता चला कि ट्रेन के इंजन से कोई बड़ा जानवर टकरा गया है..इंजन फेल हो गया है..ट्रेन आगे नहीं जाएगी...

सहयात्रियों के साथ मैं भी ट्रेन के ट्रैक पर बैठकर तारे देखने लगा..थोड़ा बोर हुआ तो मोबाइल फोन निकाल लिया..देखा, कि घर से पिताजी का मैसेज आया है कि हमारे बचपने से हमारे घर में काम कर रही दाई की मृत्यु हो गई है..बीच राह रुकी हुई यात्रा से परेशान मन दुःखी भी हो गया...

दुःख और न बढ़े इसलिए फेसबुक खोल लिया...देखता हूँ कि फ़ेसबुक भी रँगा हुआ है तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की मृत्यु की खबरों से...तुरन्त मुझे वो अपनी पाँचबजिया पैसेंजर याद आ गई जो एकबार ऐसे ही चिलकहर स्टेशन पर इंजन फेल होने से खड़ी हो गई थी..और, फिर खड़ी ही रही..हमने भी ट्रेन छोड़कर बस पकड़ ली...लेक़िन, यहाँ 'अर्चना' सुपरफास्ट है तो इसके लिए मुरादाबाद से दूसरा इंजन आ रहा था...लेक़िन, ये तो तय है कि ट्रेन चाहें कोई भी हो, ईंजन फेल होने पर रुकना ही पड़ेगा....

यही कुछ ऐसे क्षण होते हैं जो मेरे जैसे अल्पकालीन हवा में उड़ने वाले लोगों के सामने आते रहने चाहिए...यदि ऐसा न हो तो अपने अतीत को भूलकर और भविष्य के लिए बिना तैयार हुए वर्तमान के शानदार दृश्यों पर वाह वाह करते करते न कुछ पीछे का याद रहेगा और न आगे हाथ आएगा...

रात आधी होने लगी थी...तारे और तेज टिमटिमाने लगे थे...लम्बी सी ट्रेन अंधेरे की छाती पर बोझ बनी हुई खड़ी थी...तभी एक टोकरी में कुछ समोसे रखे एक थोड़ा उम्रदराज आदमी बेचने भी आ गया...समोसे ठंढ़े थे लेक़िन, दो मैंने भी ले लिए...एक बात और गौर की मैंने कि समोसे खरीदने में एसी फर्स्टक्लास वाले भी थे और जनरल वाले भी...

विपत्ति स्तर का अंतर मिटाना जानती है..

सौरभ चतुर्वेदी

बलिया

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