प्रेम में डूबी लड़की को सामने सिर्फ सपनों का रंगभरा आकाश दिखता है ....

प्रेम में डूबी लड़की को सामने सिर्फ सपनों का रंगभरा आकाश दिखता है ....

बात..बारह तेरह वर्ष पहले की है. मैं अपने एक रिश्तेदार के घर पर बैठा हुआ था. रिश्तेदार के घर के सदस्यों के बीच एक उनकी परिचित लड़की भी आयी थी. लड़की ग्यारहवीं में पढ़ने वाली, प्रखर एवं तेजतर्रार थी.

उसी वक्त शाहिद कपूर की सुपरहिट फिल्म 'विवाह' थियेटरों में धूम मचाई थी.संयोग से एक दिन पहले वो बच्ची 'विवाह'फिल्म देखकर लौटी थी. फिल्म उसे बहुत पसंद आई. या यूं कहें कि उस फिल्म का उसपर जबरदस्त प्रभाव था. खैर! फिल्म भी अच्छी बनी थी.

वो बच्ची उत्साहित होकर सबके सामने फिल्म की स्टोरी नरेट कर रही थी. फिल्म की पटकथा, अभिनय, भावनात्मक मोड़, प्रेम संवादो आदि ने उसके व्यक्तित्व को मुग्ध कर रखा था. मैं भी उसी की तरफ़ मुखातिब था. मुखातिब होना मेरी मजबूरी भी थी क्योंकि उसके द्वारा फिल्म के विषय में जो अभिव्यक्ति दी जा थी वो संवेगों के झूले पर चढ़ कर की जा रही थी. वो लगातार आधे घंटे से फिल्म के संवेगात्मक पहलुओं को लोगों तक पहुंचाने में लगी थी किन्तु मैं बेहद सामान्य भाव से उसे सुना जा रहा था. मुझे यह प्रतीत हुआ कि वो मुझे निष्ठुर तथा भाव रहित समझ कर खीझ रही है क्योंकि मैं उसके भावात्मक फिल्म अभिव्यक्ति पर अपेक्षित पुनर्बलन नहीं दे पा रहा था.

मैंने उसके मनोभावना को समझकर उसे बीच में ही रोककर कहा... देखो बेटा! सचमुच तुम बड़ी शिद्दत से फिल्म की स्टोरी और उसके भावात्मक पक्षों को बताने का प्रयास कर रही हो लेकिन मुझपर उतना असर नहीं हो रहा जितना बताना चाह रही हो. तुम सोच रही होगी कि अंकल फिल्मी दुनिया से विरक्त कितने बोरिंग एक निष्ठुर व्यक्ति हैं. लेकिन ऐसा नहीं है!

बेटा! जब मैं दसवीं-ग्यारहवीं में था तो उस वक्त शाहरुख खान काजोल की सुपरहिट मूवी 'दिलवाने दुल्हनिया ले जायेंगे" रिलीज़ हुई थी. उस वक्त मेरी उम्र तुम्हारे उम्र के आसपास रही होगी. मुझे याद है उस फिल्म को देखने के बाद मैं हफ्ते तक उसी फिल्म में गुम रहा. दिनभर उसी फिल्म की चर्चा, घटनाओं का जिक्र. ऐसा लगता था कि सबकुछ मेरे साथ ही घट रहा था. फिल्म की म्यूजिक कान में आते ही पूरी चलचित्र मस्तिष्क में घूम जाती थी. मुझे अच्छी तरह से याद है कि फिल्म देखने के बाद मैं भी लोगों के सामने फिल्म स्टोरी बता-बताकर नहीं थकता. कुछ लोग सुनते.. लेकिन कुछ वरिष्ठ लोग बिना ध्यान दिये या अरुचि के साथ मेरी बात को सुनने का दिखावा करते. उस वक्त मुझे बड़ी चिढ़ होती कि किस भावना शून्य, पाषाण हृदय इंसान के सामने मैं अपनी कोमल अभिव्यक्ति दे रहा हूँ. किन्तु मुझे यह बात समझने में परिपक्व होने तक इंतज़ार करना पड़ा कि मैं पूरी तरह तो नहीं, किन्तु बहुत हद तक गलत था. मुझे यह बात बाद में समझ आयी कि न तो 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' बहुत अच्छी थी और न ही 'विवाह'...दरअसल हम उम्र के उस मोड़ पर थे जहाँ पर ऐसी फिल्में हमें ऐसी भावनात्मक कल्पनाओं में जकड़ लेती थीं जहाँ से निकलना मुश्किल हो जाता था. हमारे मस्तिष्क को अपनी मुठ्ठी में कैदकर अपने साथ बहाती थीं, उड़ाती थीं...हमारी अन्य प्राथमिकताओं के सामने ऐसी रंगभरी चित्रकारी सजा देती थीं कि हम उस चित्र की तितलियों को पकड़ने में अपना महत्वपूर्ण वक्त जाया कर देते थे.

मुझे यह भी पता है कि मेरे इतना समझाने के बाद भी तुम्हारे ऊपर रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा होगा क्योंकि इस वक्त तुम्हारे मन- मस्तिष्क पर 'विवाह' फिल्म की भाव तरंगे बिछकर तुम्हें कुछ भी सोचने समझने से जबरन मना कर रहीं हैं लेकिन जब आज से दस वर्ष बाद इस फिल्म को याद करोगी तो तुम्हें भी यह सामान्य सी महसूस होगी. तुम इस फिल्म पर बात करने के लिए दो मिनट भी नहीं खर्चना चाहोगी. और हाँ! उसी वक्त कोई सोलह साल का लड़का/ लड़की किसी ऐसी ही फिल्म को तुम्हारे सामने नरेट करेगा और तुम बिल्कुल मेरी तरह ही व्यवहार करोगी.

सच! जीवन के बहुत से निर्णयों में उम्र का बहुत बड़ा हाथ होता है. एक प्रेम में डूबी लड़की के देखने और सोचने का दृष्टिकोण तथा उसके जिम्मेदार पिता के सोचने के दृष्टिकोण में..उम्र, अनुभव एवं जिम्मेदारियों का फर्क है. एक लड़की के सामने सिर्फ सपनों का रंगभरा आकाश है किन्तु उसके पिता के सामने धूप मे तपती धरती जैसी वास्तविकता. लड़की ने जो निर्णय लिया वो क्षणिक उद्वेग, भावनात्मक तीव्रता, संवेगात्मक अस्थिरता में लिया गया. उसके सामने वर्तमान का लक्ष्य ही सबसे बड़ी उपलब्धि थी किन्तु उसके पिता के सामने अपनी पुत्री का भविष्य, समाज की प्रतिष्ठा, परिवार का संस्कार, लालन पालन पर प्रश्नचिन्ह जैसे तमाम प्रश्न उसके कंधों पर बैठकर उसके कंधों को झुका रहें हैं.

यह दुर्भाग्य ही है कि अपनी भावनात्मक जिद्द को हासिल करने में माता-पिता, भाई बहन नात रिश्तेदार सब हार जाने वाले अपने को विजेता समझ रहें हैं.. और एक पिता इसलिए व्यथित, अपमानित और पराजित हैं क्योकि वह अपने बिटिया के बेहतर भविष्य का सपना संजोए था.

एक पिता के लिए बेटी द्वारा ऐसा किया जाना किसी भी दशा में अपमानजनक है किन्तु ऐसा नहीं है कि ऐसी भावनात्मक लहरें हमेशा साथ रहेंगी.. समुद्र फिर सामान्य दशा में आयेगा..... वक्त फिर लौटकर सामने खड़ा होगा.... और वहाँ से देखने पर पता चलेगा कि पिता कितना सही था और तुम कितने गलत. लेकिन उस वक्त पछतावे का कोई अर्थ भी नहीं क्योंकि जितना एक पुत्री द्वारा अपने पिता का प्रतिष्ठा हनन किया गया उसे बताया नहीं जा सकता बल्कि सिर्फ एक पिता द्वारा उसे महसूस करके सिर्फ घबराया या भयभीत हुआ जा सकता है.

रिवेश प्रताप सिंह

गोरखपुर

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