रीना और रवीना का अपहरण और बलात धर्मपरिवर्तन सेक्युलरिज्म के मुह पर तमाचा है

रीना और रवीना का अपहरण और बलात धर्मपरिवर्तन सेक्युलरिज्म के मुह पर तमाचा है

रीना और रवीना का अपहरण और बलात धर्मपरिवर्तन उस विचारधारा के मुह पर तमाचा ही नहीं थूक है, जिसे गाँधी-नेहरू ने कभी सेक्युलरिज्म कहा था। पाकिस्तान में सेक्युलरिज्म के मुह पर यह कोई पहली थूक नहीं है, बल्कि पाकिस्तान सदैव इस विचारधारा के मुह पर थूकता रहा है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओं, ईसाइयों की रोज घटती संख्या साक्षी है कि वहाँ अल्पसंख्यकों के लिए कोई स्थान नहीं है। सरकार और कट्टरपंथी संगठनों की छोड़िये, इस तरह के अत्याचारों पर वहाँ की आम जनता की भी मूक सहमति होती है। यदि नहीं होती तो वहाँ का कथित बौद्धिक वर्ग ऐसे अत्याचार पर मुखर होता, पर वहाँ स्पष्ट चुप्पी है।

मंचों पर अमन और इश्क के तराने पढ़ने वाले शायर चुप हैं। "संगीत का कोई देश या मजहब नहीं होता", कह कर दुनिया भर से कमाई करने वाले पाकिस्तानी गायक चुप हैं। पाकिस्तान को अमन पसन्द देश बताने वाले नेता चुप हैं। इंसानियत की दुहाई देने वाले मानवाधिकारवादी चुप हैं। पूरा पाकिस्तान चुप है, जैसे हिन्दू बेटियों का रोज होने वाला अपहरण उनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं।

कुछ वर्ष पूर्व बच्चों की शिक्षा के लिए काम करने के नाम पर मलाला यूसुफजई को नोबेल पुरस्कार मिला था। हालांकि स्कूल जाने की अपनी जिद्द के बदले में गोली खाने के अतिरिक्त उन्होंने ऐसा क्या किया था कि नोबेल पुरस्कार दिया गया, यह नोबेल कमिटी दुनिया को नहीं समझा सकी, फिर भी उस पुरस्कार के बाद मलाला पाकिस्तान में मानवाधिकार के लिए कार्य करने वाला सबसे बड़ा चेहरा बन कर उभरी हैं। पर हिन्दू लड़कियों पर रोज होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध मलाला को कभी बोलते हुए नहीं सुना गया। यह साबित करता है कि पाकिस्तान में हिंदुओं के पक्ष में कोई नहीं बोलता।

आप भारत से तुलना कीजिये, मात्र एक अखलाक के साथ अन्याय हुआ तो देश के असंख्य बुद्धिजीवी सड़कों पर उतर आए। कवियों-शायरों ने अपना पुरस्कार वापस कर दिया। विश्व के सामने हल्ला कर दिया गया कि भारत अब रहने लायक नहीं रह गया, यहाँ असहिष्णुता बढ़ गयी है। इसमें कुछ बुरा नहीं, किसी भी सभ्य देश मे किसी निर्दोष के साथ अत्याचार नहीं होना चाहिए। अत्याचार के विरुद्ध खड़ा होना देश के बौद्धिक वर्ग का कर्तव्य है। पर यह समझ नहीं आता कि भारत के ये बुद्धिजीवी पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध मुखर क्यों नहीं हैं?

भारत के असंख्य शायर-कवि जिन्होंने अखलाक मुद्दे पर अपना पुरस्कार लौटाया था, पाकिस्तान में जा कर भाईचारे का पैगाम बाँटते रहे हैं। क्या उन्होंने पाकिस्तान के विरुद्ध कुछ बोला? क्या उन्होंने कहा कि ऐसे देश मे हम कविता नहीं पढेंगे? पाकिस्तान में हिन्दुओ पर रोज होने वाले अत्याचारों पर चुप्पी क्या यह नहीं बताती कि वे लोग बिके हुए हैं? मूल्य जो भी हो... राष्ट्र का सामान्य जन यदि पक्षपात करे तो राष्ट्र की हानि होती है, पर बौद्धिकता पक्षपात करे तो मानवता की हानि होती है। क्या भारत के स्वघोषित बुद्धिजीवी अपने इस पक्षपात का कारण बताएंगे?

एक दिक्कत और है। वे तब न बताएंगे जब हम पूछेंगे? हम भी तो नहीं पूछते... बिना पूछे उत्तर नहीं देंगे वे, क्योंकि वे जानते हैं कि हम अत्याचार का उत्तर अत्याचार से नहीं देते। यही प्रश्न यदि अखलाक की ओर से होता तो इस देश की बुद्धिजीविता बोलते बोलते मुह से गाज फेंक रही होती।

पाकिस्तान में हिन्दुओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों का एक ही कारण है, उनकी सहिष्णुता। सहिष्णुता के कारण ही वे बंगलादेश में काटे जाते हैं, सहिष्णुता के कारण ही वे पाकिस्तान में काटे जाते हैं, सहिष्णुता के कारण ही वे कश्मीर से भगा दिए जाते हैं, सहिष्णुता के कारण ही वे कैराना से भगाये जाते हैं।

अतिसहिष्णुत सभ्यताएं समाप्त हो जाती हैं पार्थ! हम कई हजार वर्षों से इसीलिए बने हुए हैं क्योंकि हमने सहिष्णुता के ढोंग के लिए अपने स्वाभिमान की बलि नहीं चढ़ाई थी। रीना और करीना पाकिस्तान की दो पीड़ित लड़कियों के ही नाम नहीं, बल्कि हर अतिसहिष्णु बाप की बेटियां रीना और करीना हो जाती हैं।

भारत! अपने बच्चों के लिए यदि सुखद भविष्य छोड़ना चाहते हैं तो स्वाभिमानी बनिये, सहिष्णु नहीं। आपको छोड़ कर दुनिया की अन्य कोई सभ्यता सहिष्णुता का ढोंग नहीं करती।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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