जन्मदिन विशेष : डॉ. राम मनोहर लोहिया... (डॉ मनीष पांडेय)

जन्मदिन विशेष : डॉ. राम मनोहर लोहिया... (डॉ मनीष पांडेय)

"कुछ और बढ़ गई है अंधेरों की जिंदगी

ऐसे भी हुआ है जश्न ए चराग़ाँ कभी-कभी.."

आज डॉ.लोहिया की जन्मतिथि है। विकास के तमाम पिंटते ढिंढोरों के बीच आज भी राजनीतिक सिद्धांतकार रजनी कोठारी की प्रस्थापना अक्सर सच प्रमाणित होती है, कि भारत में जाति और राजनीति एक दूसरे के पर्याय हैं। हालांकि 30 के दशक में ही "अजगर" की अवधारणा ने जन्म लिया था, जिसपर आगे चलकर काफी हद तक श्री चौधरी चरण सिंह ने अपनी राजनीति भी की, लेकिन वास्तविक रूप जैसा कि डॉ. राम मनोहर लोहिया स्वयं कहते थे, कि समाजवादी दल हिंदुस्तान के इतिहास में पहला राजनीतिके दल है, जिसने जाति प्रथा को समझा , और राष्ट्रवर्धक जाति-तोड़ो नीति को चलाया है। उनका स्पष्ट यह मानना था कि जहाँ कहीं कोई वैयक्तिक स्वार्थ टकराता है, छोटी जाति वाले अपना गुट, और बड़ी जाति वाले अपना गुट बनाना शुरू कर देते हैं। इससे ज़्यादा भयानक और कोई बात नहीं। लेकिन इसका कोई इलाज़ भी नहीं है, सिवाय राजनीतिक शिक्षा के। एक बात और भी ध्यान में रखने लायक है कि जब जलन किसी व्यक्ति या गिरोह का औजार बन जाती है, तब उस व्यक्ति और गिरोह के गुण और शक्ति नहीं उभर पाते(लोहिया के विचार: ओंकार शरद,पृ.सं.98)।

छोटी जातों में कुछ, जैसे अहीर, जुलाहे या चमार बहुसंख्यक हैं। दूसरी छोटी जातें जैसे माली, तेली, कहार वग़ैरह इनमें तादात में कुल मिलाकर, बहुत ज़्यादा हैं, लेकिन वे अनेक टुकड़ों में बिखरे और बंटे हैं। नतीजा यह होता है कि जब छोटी जाति उठती और जाति प्रथा पर हमला होता है तो बहुसंख्यक छोटी जातें ज्यादा फ़ायदा उठाती हैं। किसी हद तक यह अनिवार्य है, लेकिन सचेत रहना चाहिए कि दूसरी छोटी जातों में भी नेता बनें और जान आए (वही, पृ.सं.99)।

आज डॉ. लोहिया की आशंकाएं सच के कितने करीब हैं कि वास्तव में जातियां राजनीतिक हथियार बन गई और पिछड़ों के नाम पर बहुसंख्यक पिछड़ी जातियों ने सामाजिक-आर्थिक रूप से अपना वर्चस्व क़ायम किया। जिस राजनीति में डॉ. लोहिया ने जातीय मुद्दे उठाकर उनका समाधान करने की कोसिस की, कालांतर में वही जाती और जातीयता उस राजनीति का आधार बन गई, जिसे वह #राजनीतिक_शिक्षा के माध्यम से ठीक करना चाहते थे। उनके सपनों के भारत की राजनीति बहुसंख्यक पिछड़ी जातियों की बंधुआ हों गई और जैसे अन्य तमाम राजनीतिक दल है, उसी के अनुरूप उद्योगपति, अमीरों और एक उच्च वर्गीय स्थिति को हो चुकी जाति के अधीनस्थ हो गई।

समाजिक सिद्धांतकार माइकल यंग ने कभी कहा था कि कृषि जाति पैदा करती है, और मशीनें वर्ग बनाती हैं। लेकिन, भारत के संदर्भ में यह इसलिए भी इतनी अनुकूल नहीं हो सकती क्योंकि यहाँ जातियों को ख़त्म करने के सामाजिक और मूल्यगत प्रयास के बजाय राजनीतिक दबाव को महत्व दिया गया, जिसके दुष्परिणाम जातीय अस्मिता को बढ़ावा देने वाला साबित हुआ। ऐसा इसलिए भी कि राजनीति और जाति के घालमेल का खेल अंग्रजो ने गुलामी के दौर में ही शुरू कर दिया था, जिसका स्पष्ट परिणाम गाँधी जी के जातीय भेदभाव के मूल्यगत परिवर्तन वाले भाव की सउद्देश्य उपेक्षा में दिखा। हालाँकि कि डॉ. #लोहिया स्वयं को गाँधी का अनुयायी मानते हुए ख़ुद असल गांधीवादी यानी #कुजात_गांधीवादी कहते थे, लेकिन जातीयता के खात्मे को उन्होंने #गाँधी के विपरीत जाकर #आम्बेकर के रास्ते को छूने की कोसिस की जहाँ जाति की समस्या का राजनीतिक समाधान था। नीति और नीयत की स्पष्टता के बावजूद भी जाति के राजनीतिक समाधान ने जनतांत्रिक व्यवस्था की खामियों को उजागर किया और स्पष्तः #जातियां #गिरोह में बदलती चली गईं।

डॉ लोहिया अपने स्वाभाविक #अतिरेक में अक़्सर #भावनात्मक हो जाते थे, और हमारा समाज भावनाओं का निर्ममता से शोषण करने की प्रवृत्ति रखता है। भावनात्मकता उदार हृदय का प्रस्फुटन होती है। हालाँकि एक शासक या नेतृत्वकर्ता या किसी को भी #सामाजिक_परिधि में #संवेदनशील होना चाहिए, भावुक नहीं लेकिन डॉ लोहिया छोटी से छोटी घटना को भी लेकर एक आंतरिक वेदना से भर जाते थे। जब वो #रिक्शे की सवारी करने को लेकर कहते थे कि इससे बड़ी अमानवीयता और क्या हो सकती है कि एक व्यक्ति दूसरा व्यक्ति खींचता है। वह #संवेदना की #चरम की अनुभूति करते हैं, अंतिम व्यक्ति की पीड़ा उनकी व्यक्तिगत पीड़ा हो जाती है, और वही संवेदना उनके स्वाभाविक अतिरेक और भावना में बदल जाती है, जिसका दुरुपयोग उनके अनुयायी और भी अधिक निर्ममता से करते हैं।

हाल के कुछ चुनावों पर ध्यान दें तो डॉ. लोहिया के कथित अनुयायिओं ने जीत का आंकलन विचार-विश्वास के बजाय जातीय गोलबंदी के रूप में प्रचारित करने लगे। नीति और नीयत दोनों को बदलते क्षण भर भी नहीं लगते। बदले में अन्त्योदय की अवधारणा पर चलने वाले राजनीतिक दल ने अति-दलित और अति-पिछड़ा के आरक्षण का राग शुरू कर दिया। हालाँकि डॉ. लोहिया ने अपने समयकाल में ही यह आशंका व्यक्त की थी कि #पिछड़ों, जिसमें वह दबे-कुचलों के साथ मुस्लिम और महिलाओं को भी वह सम्मिलित करते थे, के कुछ वर्ग ही बदलाव का सामाजिक-आर्थिक लाभ उठा लेंगे (हालांकि आज डॉ लोहिया के कथित अनुयाई पिछड़ा वर्ग शब्द की मनमानी व्याख्या कर उसमें सिर्फ़ पिछड़ी जाति को शामिल करते हैं )। समय के साथ यह कितना सच साबित हुआ, आंकलन का विषय हैं, लेकिन जातीय अस्मिता को कम करने और उसी तोड़ने के बजाय वोट बैंक की तरह इस्तेमाल कर राजनीतिक दलों ने जातीय वैमनस्व को ही ज्यादा बढ़ावा दिया बजाय इसके कि समाज में समता और सम्पनता स्थापित हो...।

जिस दिन हम इन सभी राजनीतिक और कल्पनीय #इतिहास के #पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर समता और समृद्धता की तरफ़ सर्व समाज को उन्मुख कर लेंगे, उसदिन डॉ. लोहिया के प्रति देश की सच्ची आस्था का प्रकटीकरण होगा......

(डॉ मनीष पांडेय)

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