बांग्लादेश चुनाव : भारत के लिए बेहद अहम (धीरेन्द्र कुमार दुबे)

बांग्लादेश चुनाव : भारत के लिए बेहद अहम  (धीरेन्द्र कुमार दुबे)

पड़ोसियों के साथ हमारे सौहार्दपूर्ण संबंध न केवल शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की आास्ति जगाते हैं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक उन्नयन की दिशा में सहज गतिशीलता के भी कारक होते हैं। शायद इसीलिए 30 दिसम्बर को बांग्लादेश में होने वाले आम चुनाव भारत के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं। सच है कि बांग्लादेश के निर्माण में दिसम्बर, 1971 में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसे में आम भारतीयों की यह सामान्य अपेक्षा हो सकती है कि बांग्लादेश के सत्तारूढ़ दलों को भारत के प्रति सदैव आभारी रहना चाहिए। लेकिन राजनीतिज्ञ कई बार सत्ता पर अधिकार बनाए रखने के लिए आमजन को अपने प्रोपेगेंडा के माध्यम से भ्रमित करते हैं। भारत-बांग्लादेश के संबंधों के बीच भी ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं था। फरक्का बांध के निर्माण और उसके ऑपरेशन को लेकर दोनों देशों के मध्य कई बार विवाद हुए। हुबली नदी में वांछित जलस्तर बनाए रखने की कोशिशों से क्षुब्ध बांग्लादेश ने कभी तो आरोप लगाया कि इसके कारण उसके हिस्से में गंगा का पर्याप्त पानी नहीं आ पाता। कभी कहा कि बांध से अचानक पानी छोड़ देने से उसके क्षेत्रों में जल-प्लावन की स्थिति हो जाती है।

सिलीगुड़ी गलियारे से होकर पूर्वोत्तर राज्यों तक जाने वाले वाहनों के आवागमन और सीमा पर घुसपैठियों पर कार्रवाई भी परस्पर विवादों का कारण रही। भारत और बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि एक दूसरे के हिस्से के कुछ संकरे गलियारों से गुजरना ही होता है। 26 जून, 1992 को भारत ने प. बंगाल का तीन बीघा का गलियारा बांग्लादेश को लीज पर दिया था। बाद में दोनों देशों के मध्य लीज की अवधि को लेकर विवाद हुआ। अवैध बांग्लादेशी शरणार्थियों का मसला तो लंबे समय तक समस्या बना रहा। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के संधारण के विचार के मूल में एक कारण यह भी रहा है। लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता बांग्लादेश की जमीन पर आतंकवादी गतिविधियों का संचालन। पाकिस्तान की तर्ज पर ही बांग्लादेश में भी कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने धार्मिंक उन्माद को भड़का कर अपने क्षुद्र स्वार्थो को साधने की कोशिशें की हैं। इनमें से कुछ का संबंध तो पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी पाए जाने के समाचार हैं। इसीलिए बांग्लादेश की संसद ''जातीय पंचायत' के लिए होने वाले चुनाव भारत के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

उल्लेखनीय है कि करीब एक दशक पहले जब अवामी लीग की नेता शेख हसीना सत्ता में लौटी थीं, तो उन्होंने वादा किया था कि बांग्लादेश में भारत-विरोधी गतिविधियां संचालित नहीं होने देंगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हसीना ने अपने वादे को कड़ी हद तक निभाया है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षो में दोनों देशों के मध्य ऐसे कई राजनीतिक-सामरिक-आर्थिक समझौते हुए हैं, जिनने दक्षिण-पूर्वी एशिया के दोनों पड़ोसियों के सांस्कृतिक-ऐतिहासिक संबंधों को सार्थक रूप दिया है। नवम्बर, 2013 से भारत और बांग्लादेश की सीमा पर वैसी ही सैनिक सलामी कार्यवाही होने लगी है, जिसके रोमांचक साक्ष्य के लिए भारत-पाकिस्तान की सीमा वाले वाघा में प्रतिदिन हजारों लोग हर दिन जुटते हैं। लेकिन चुनावों को देखकर बांग्लादेश में कट्टरपंथी और अराजक प्रवृत्तियां फिर सक्रिय हो गई हैं। दरअसल, बांग्लादेश नेशनल पार्टी की नेता बेगम खालिदा जिया ने वर्ष 2014 में आम चुनावों के बहिष्कार की घोषणा कर दी थी, और तब शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को सहज ही जीत मिल गई थी।

अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनल पार्टी अभी भी बांग्लादेश के प्रमुख राजनीतिक दल हैं, लेकिन अन्य छोटे दल भी इस कालखंड में अस्तित्व में आए हैं। कहा जाता है कि युद्ध और प्रेम में सब कुछ जायज है। बेगम खालिदा जिया एक बार फिर सक्रिय राजनीति में लौट आई हैं। अवामी लीग और उसके वृहत्त गठबंधन को गण फोरम के नेता कमाल होसैन के बीस पार्टयिों वाले गठबंधन ''जातीय औकिया फ्रंट' की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान हुई हिंसा के बारे में माना जा रहा है कि इसे आईएसआई समर्थित तत्वों ने अंजाम दिया है, और यह बांग्लादेश ही नहीं, भारत के लिए भी चिंता की बात है। बांग्लादेश में एक सदनीय संसद-व्यवस्था है, जिसमें 300 सदस्यों का निर्वाचन होता है, और पचास सीटों पर सत्तारूढ़ दल या गठबंधन द्वारा महिलाओं को नामांकित किया जाता है। देखना है कि इस बार बांग्लादेश में चुनाव का ऊंट किस करवट बैठेगा।

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