घटानी होगी तेल पर निर्भरता : सुमित यादव

घटानी होगी तेल पर निर्भरता :  सुमित यादव

भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है यदि आगे इसी रफ्तार से हमारा आर्थिक विकास जारी रहा तो शीघ्र ही हम विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएंगे। लेकिन हाल में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में अपनी एक भाषण में आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम जी राजन ने एक महत्वपूर्ण बात कही उनका कहना था कि यदि भारत को वास्तव में अपनी युवाशक्ति का लाभ उठाना है तो अपनी विकास दर में 2 फ़ीसदी की बढ़ोतरी करनी होगी अन्यथा यह हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ बनकर रह जाएगी। हिंदू रेट आफ ग्रोथ का आशय कई दशकों तक विकास दर का स्थिर रहना है। यह शब्द 80 के दशक में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने भारत की तीन दशकों तक 3.3 फीसदी की स्थिरता के लिए व्यंगात्म रूप में इस्तेमाल किया था। तब से यह प्रचलन में हैं। रघुराम राजन की यह चिंता जायज ही हैं क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से हमारी आर्थिक विकास दर 7 फीसदी के आसपास ही टिकी हुई है। इसलिये भारत को अपनी विकास दर बढ़ाने के लिए उन विंदुओं पर गौर करना होगा जो इसकी राह में रोड़ा बन रहे हैं। हमारे पास विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति होने के बावजूद हम विकास की अभीष्ट रफ्तार बढ़ाने में असफल रहे हैं। जहां तक मेरा मानना है तेल आयात एक ऐसा क्षेत्र है जिससे हम सबसे ज्यादा मात खा रहे हैं।क्योंकि हम अपनी जरूरतों का 80 फ़ीसदी तेल आयात करते हैं एवं हमारी अर्थव्यवस्था तेल आधारित अर्थव्यवस्था है जिसमें सुई से लेकर हर बड़े से बड़े आइटम का निर्माण डीजल या अन्य पेट्रोलियम ईधन बिना नही होता। यही वजह है कि ज्यों ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल के दामों में बढ़ोतरी होती है त्यों ही हमारी अर्थव्यवस्था में चौतरफा दवाव बनना शुरू हो जाता है। एक तरफ रुपया गिरने लगता है, तेल के दाम बढ़ने लगते हैं, घरेलू वस्तुएं और विदेशी सामान महंगे होते जाते हैं दूसरी तरफ राजकोषीय घाटा बढ़ने लगता है,विदेशी मुद्रा भंडार घटने लगता है और आमजन की क्रय शक्ति भी घटने लगती है अर्थात अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों से भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत तय होती है। अगर यह कहा जाए कि हमने बहुत हद तक अपने आर्थिक विकास की रफ्तार की चाबी ओपेक संगठन के हाथों में दे दी है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। हाल का संकट इसकी तस्दीक देने के लिए पर्याप्त है अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जब तेल के दाम बढ़ने शुरू हुए तो एकाएक रुपए का डॉलर के मुकाबले मूल्य 69 से बढ़कर 74 तक जा पहुंचा जो अब तक का सर्वोच्च स्तर था। तमाम अर्थशास्त्रियों ने इसे मात्र तेल कीमतों का प्रभाव ना मानते हुए इसके लिए अमेरिका के फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बृद्धि, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध और ईरान पर प्रतिबंध की घोषणा की घटनाओं का मिलाजुला प्रभाव माना जो गलत भी नहीं है। परंतु यह प्रभाव हो सकता है लेकिन बराबर की भूमिका बताना गलत है। अर्थात मेरा यह मत है कि जहां इसमें अन्य सभी कारण का प्रभाव 25 फीसदी है तो वहीं तेल आयात का 75 फीसदी। क्योंकि आंकड़ों पर गौर करें तो तस्वीर और स्पष्ट होगी। इस संकट से पहले भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 425 अब जाकर के पास था जो अब 393 पर आ पहुंचा है वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अब तेल के दाम घट रहे हैं तो जो रूपये डॉलर के मुकाबले 74 के आसपास था वो अब 70-71 बीच चल रहा है। 74 से 70 तक का यह सफर अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में तेल के दाम घटने से हो गया। यहां ना तो फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर घटाई है ना ही चीन-अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध खत्म हुआ अर्थात इससे हम कच्चे तेल के प्रभाव को समझ जा सकता है। इसलिये अब तेल आयात की निर्भरता कम करनी होगी क्योंकि आगामी चुनौतियां गत चुनौतियां से कई गुना अधिक बड़ी हो सकती है। आगामी 6 दिसंबर को तेल की गिरती कीमतों को थामने के प्रयास करने के लिए ओपेक सदस्यों ने बैठक बुलाई है और ऐसा माना जा रहा है इसमें सदस्य मिलकर तेल के उत्पादन को जबरदस्त रूप से घटा सकते हैं यदि ऐसा होता है तो विश्व भर में तेल के दामों में एक बार फिर तेजी देखने को मिलेगी और इसमें कोई दो राय नहीं कि इसका सर्वाधिक प्रभाव भारत पर ही होगा। ध्यातव्य हो कि अभी जब तेल के दाम बढ़े थे तो भारतीय रुपए पर दक्षिण एशिया में सबसे अधिक प्रभाव पड़ा था इसके अलावा अमेरिका ने ईरान से तेल आयात करने की छूट हमें सिर्फ पांच 6 महीने के लिए दी है जो मई 2019 को खत्म होगी इसके बाद भारत के पास अन्य सभी विकल्प महंगे ही होंगे।

कुल मिलाकर यदि हमें वास्तव में हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ के प्रभाव से बचना है, युवा आबादी का लाभ उठाना है और बेहतर विकास दर के अभीष्ट को प्राप्त करना है तो अपनी अर्थव्यवस्था को तेल आधारित अर्थव्यवस्था से निकलना होगा। जिसके लिये तेल के अलावा अन्य विकल्पों को शीघ्र ही अपनाना होगा। अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए हम सौर ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं।आज चीन जहां सौर ऊर्जा से एक लाख तीस हजार मेगावाट से अधिक उत्पादन कर रहा है वहीं हम मात्र 18300 मेगावाट तक ही पहुंच सके हैं।शायद यही चीनी सामानों के सस्ता होने का एक कारण भी है। हमें भी अपने निष्क्रिय भूमि का उपयोग कर सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना होगा, वायोफ्यूल के उत्पादन को बढ़ाना होगा, गैसीय ईधन के क्षेत्र में प्रगति करनी होगी, जलविद्युत क्षेत्र में नई तकनीक का प्रयोग कर बेहतर उत्पादन की ओर अग्रसर होना होगा।

ऐसे तमाम प्रयास न केवल हमारी तेल आयात पर निर्भरता को कम करेंगे बल्कि सतत विकास लक्ष्यों 2030 की दिशा में लंबी छलांग लगाने के लिए हमारी मदद करेंगे।चूंकि उक्त प्रयास भारत के सामाजिक,आर्थिक और पर्यावरणीय दिशा में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं इसलिए इसके क्रियान्वयन में देरी करना देश को पीछे धकेलने से कम नहीं है।

सुमित यादव

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