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सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर प्रतिवंध का पालन कराना मेंढकों के ढेर को तराजू पर तौलने से कम नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर प्रतिवंध का पालन कराना मेंढकों के ढेर को तराजू पर तौलने से कम नहीं है

पिछले दिनो सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर प्रतिवंध लगाने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इस दीपावली पर पर्यावरण सुरक्षा को ध्यान में रखकर कुछ महत्वपूर्ण दिशा निर्देश दिए हैं।

इस पूरी सुनवाई में उच्चतम न्यायालय ने पटाखों पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाने की दलील को इससे जुड़े रोजगार और आर्थिक प्रभावों के मद्देनजर खारिज करते हुये निम्न चार प्रमुख निम्न बातें कहीं हैं।

पहला, कोर्ट ने दीपावली जैसे पावन पर्व पर पटाखे जलाने को एक परंपरा से जोड़कर देखा इसलिए इसमें हस्तक्षेप के आधिक्य को दरकिनार करते हुए कोर्ट ने पटाखे जलाने का समय नियमित किया। मसलन दीपावली पर रात 8:00 बजे से 10:00 बजे तक ही पटाखे जलाए जा सकेंगे ताकि पहले से ही बढे प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित किया जा सके।

दूसरा, इस दीपावली को केवल ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल करने की सलाह कोर्ट द्वारा दी गई है। चूंकि अन्य पटाखों की अपेक्षा इनमें सल्फर डाई आॅक्साइब तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम होता है लिहाजा इसका मानव स्वास्थ्य पर अन्य पटाओं जैसा घातक असर कम ही पड़ता है। इसके अलावा अन्य पटाखों में तमाम विशैली गैसे निकलती हैं जो दमा,मितली और कैंसर आदि रोगों का कारण बनती है।

तीसरा, अब केवल लाइसेंस धारक दुकानदारों को ही पटाखों की विक्री करने का अधिकार होगा।

ताकि अवैध पटाखा फैक्ट्रियों तथा दुकानदारों पर लगाम लग सके। अक्सर देखा जाता है तमाम अवैध पटाखा फैक्ट्रियों में विना प्रशिक्षण लोग लगे रहते है और ऐसा रिहारसी इलाकों मे भी होता है। यही कुछ हाल फर्जी दुकानदारों का है जो न केवल स्वम के लिये बल्कि आम लोगों के लिये भी खतरनाख सावित होते है।

चौथा, कोर्ट के आदेशानुसार पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर पाबंदी होगी। यानि पटाखों को मात्र दुकान पर जाकर ही खरीदा जा सकेगा। इस निर्णय से जहां विदेशी पटाखों की आम जनता तक पहुत सीमित होगी वहीं आमजन में इनके खरीदने की रफ्तार को भी नियंत्रित किया जा सकेगा। हालाकि पटाखों की ऑनलाइन बिक्री आर्थिक रूप से भले ही लाभदायक हो सकती थी परन्तु यह हमे 2030 के सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में काफी पीछे धकेल देगी।

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने सामुदायिक रूप से मिलकर पटाखे जलाने को प्रोत्साहन देने की बात कही है ताकि सभी मिलकर एक ही पटाखे का आनंद लें और बदले में कम से कम पटाखे जलाए जाएं।

उपरोक्त आदेशों से ऐसा महसूस होता है कि इनके पालन से अब कहीं ना कहीं इस दीपावली प्रदूषण को कम किया जा सकेगा।

लेकिन उक्त दिशा निर्देशों का पालन कराना मेंढकों के ढेर को तराजू पर तौलने से कम नहीं है।

तमाम लोग अंत समय तक इस दिशा-निर्देश से अनभिज्ञ रह सकते हैं तथा भिज्ञ भी अनभिज्ञता का रोना रो सकते हैं।साथ ही इस दिशा निर्देशों के उल्लंघन पर सजा का कोई ठोस भी व्यवस्था नहीं है। वहीं एक तरफ कोर्ट के दिशा निर्देश मात्र अखबारों के पन्नों तक ही सीमित हो गए हैं दूसरी तरफ अब तक सरकारों की ओर से भी कोई ठोस प्रयास नहीं हुए कि आमजन को इस बाबत अवगत कराया जा सके।

कुल मिलाकर उपरोक्त दिशा निर्देशों का शत प्रतिशत पालन हो सकेगा इस की आशा बहुत कम है परंतु यदि आमजन को पर्यावरण के प्रति जागरुक किया जाए एवं सरकारों द्वारा विशेष अभियान चलाकर आमजन को कोर्ट के निर्देशों के प्रति सतर्क किया जाए और अपने ही स्वास्थ्य खिलवाड़ ना करने का प्रचार किया जाए तो बहुत बड़ा वदलाव हो सकता है।

इस दिशा में सभी गैर सरकारी संगठनों को एक साथ मिलकर काम करने की जरूरत महसूस होती है।

अंततः यही कहा जा सकता है कि सरकार ही सब कुछ कर दे ऐसा संभव नहीं है अच्छा होगा कि हम सब मिलकर इस दिशा में कदम उठाएं।

दीपावली पर जितनी कीमत के पटाखे हम जलाते हैं उसकी आधी ही कीमत की मिठाई अगर गरीबों में बांट दें तो वह खुशी की गूंज पटाखों की उस गूंज से कई गुना अधिक होगी ऐसा मेरा मत है।

।ये मेरे निजी विचार है।

सुमित यादव

रावगंज कालपी(उ.प्र)

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