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फिर एक कहानी और श्रीमुख "प्रतिहार"

फिर एक कहानी और श्रीमुख  प्रतिहार
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सन ७३२ ई. , भारत का पश्चिमोत्तर सीमांत। सिंध में अरबों का शासन स्थापित होने के बाद खलीफा ने मोहम्मद बिन कासिम को मार कर यजीद को सिंध का सूबेदार बना दिया था। यजीद कासिम से भी ज्यादा क्रूर था। उसने सिंध के किसानों से बहुत सारी जमीने छीन कर अरबवासियों को दे दी थीं, और इस तरह सिंध मुस्लिम ब्यापारियों का केंद्र बन चुका था। ये ब्यापारी भारत से हिन्दू युवक युवतियों को दास बना कर अरब ले जाते और उन्हें बेच कर धन कमाते। पूजा के सभी स्थलों को तोड़ कर उन्हें मस्जिदों में बदल दिया गया था, और भारतीय संस्कृति जैसे मर गयी थी।

सिंध में पूरी तरह से व्यवस्थित होने के बाद अरबी यजीद ने अब पुनः उत्तर की तरफ बढ़ने का मन बनाया था।

सिंध की सीमा से लगा एक छोटा सा राज्य था, उद्भाण्डपुर। किसी युग मे समस्त भारत पर शासन करने वाले कुषाणों का यह राज्य अब सिमट कर कुछ कोस तक ही सीमित रह गया था। इस समय कुषाण बंश का शासक रामपाल उद्भाण्डपुर पर शासन कर रहा था।

यजीद ने अरब सत्ता के विस्तार के लिए उद्भाण्डपुर को ही सबसे आसान शिकार समझा। उसने आक्रमण का बहाना ढूंढने के लिए उद्भाण्डपुर नरेश के पास एक अपमानजनक प्रस्ताव भेजा, कि रामपाल अपनी बेटी राजकुमारी त्रिशला को यजीद को दे दे। स्वाभिमानी रामपाल के लिए यह प्रस्ताव किसी थप्पड़ से कम नहीं था, पर उसकी सैन्य शक्ति इतनी अधिक नहीं थी कि वह यजीद से युद्ध कर सकता। रामपाल को पता था कि प्रस्ताव अस्वीकार करते ही यजीद को आक्रमण का बहाना मिल जाएगा, और वह युद्ध छेड़ देगा, अतः रामपाल ने भी अपनी छोटी सी सेना को अंतिम युद्ध के लिए तैयार कर लिया।

**/२

संध्या होने में अभी पहर भर की देर थी, पर घने वन में अभी से ही संध्या का आभास हो रहा था। वायु के वेग से घोड़े को दौड़ाते उस रहस्यमयी व्यक्ति को जैसे पल भर रुकने का भी अवकाश नहीं था, वह शीघ्र ही इस गहन वन से निकल जाना चाहता था। उसका रूप असामान्य था। दूध की तरह सफेद लम्बे बाल और घनी दाढ़ी मूछें, और माथे का अद्भुत तेज उसे ऋषि बता रहे थे, तो पूरे शरीर को ढकने वाले राजसी वस्त्र और पैर के बहुमूल्य जूते उसे कोई प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति सिद्ध कर रहे थे। किन्तु वह जो भी था, उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह शीघ्र ही अपने लक्ष्य पर पहुंचना चाह रहा था।

वन का यह भाग कन्नौज राज्य के अंतर्गत आता था, तथा राजधानी से अत्यंत निकट था। कुछ वर्षों पूर्व तक इस गहन वन में कन्नौज राज्य के गुप्त सैनिक अड्डे यत्र तत्र फैले हुए थे, पर नरेश यशोवर्मन के पराभव ने इन्हें समाप्त कर दिया था। कन्नौज के नए प्रतिहार राजा ने सम्भवतः इस तरफ ध्यान नहीं दिया था।

घोड़े को निरन्तर दौड़ाता वह अद्भुत व्यक्ति जब कन्नौज राजमहल के द्वार पर पहुंचा, तो घरों में दीपक जल गए थे। रहस्यमयी व्यक्ति ने घोड़े से उतरते ही उस बड़े घण्टे को जोर जोर से बजाना प्रारम्भ किया, जो राजा तक अपनी पीड़ा पहुचाने के माध्यम के रूप में लगाया गया था। घण्टा बजने पर तुरन्त ही वहां नियुक्त सैनिक पहुँचा।

सामान्यतः घण्टा बजाने वालों से देर तक बहस करने का आदी सैनिक तुरन्त ही राजमहल के अंदर चला गया। वह आगन्तुक की भेषभूषा देख कर अभिभूत हुए बिना न रह पाया था। कुछ ही देर में वह अद्भुत व्यक्ति सभी सीमाओं को लांघ कर प्रतिहार वंश के संस्थापक नागभट्ट प्रथम के समक्ष खड़ा था।

**/३-**

कन्नौज के युवा शासक ने आंख फैला कर आगन्तुक की तरफ देखा, जैसे आंखों से ही उसके आने का कारण पूछ लिया हो। रहस्यमयी व्यक्ति ने चुपचाप अपनी कमर में बंधी एक चिट्ठी निकाली और राजा की तरफ बढ़ा दिया। नागभट्ट ने एक बार आश्चर्य से उस रहस्यमयी व्यक्ति को देखा, और फिर चिट्ठी खोल कर पढ़ने लगे। पत्र कुछ यूं था-

"प्रतिहार नरेश नागभट्ट को उद्भाण्डपपुर की राजकुमारी त्रिशला का प्रणाम। मैं नहीं जानती कि मेरा आपको पत्र लिखना मर्यादा की सीमाओं के अंदर है या पार कर गया है, किन्तु वर्तमान समय मे एक आप ही हैं जो हमारी रक्षा कर सकते हैं। क्रूर अरबी यजीद की भुजाएं हमारे राज्य को घेर चुकी हैं, पर सत्य यह है कि वह हमारे राज्य को नहीं बल्कि मुझे अपवित्र करना चाहता है। मैं चाहती तो अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए आत्मदाह कर सकती थी, किन्तु यह उस घमण्डी दैत्य से बिना लड़े समर्पण करने जैसा होता। मेरे राज्य की सेना उसका सामना कर पाने में समर्थ नहीं है। यदि आप सहायता करें तो उस दुष्ट को रोका जा सकता है। आप आर्यावर्त के भविष्य की एकमात्र आशा हैं, अतः आपसे पूछना मैंने अपना कर्तव्य समझा। मुझे आपसे बस यही पूछना है कि यजीद से स्वयं की रक्षा के लिए मैं आत्मदाह कर लूं, या आप आएंगे? आपके उत्तर की प्रतीक्षा में......"

नागभट्ट कुछ देर तक पत्र को निहारते रहे, फिर उस रहस्यमयी व्यक्ति से बोले- आपकी राजकुमारी कुछ घमण्डी प्रतीत नहीं होतीं?

रहस्यमयी व्यक्ति ने धीरे से कहा- उन्होंने अपने जीवन मे पहली बार, और सम्भवतः अंतिम बार किसी से सहायता मांगी है महाराज।

नागभट्ट ने सैनिक को बुला कर आगन्तुक के ठहरने की व्यवस्था का आदेश दिया, और सुबह में उत्तर देने का आश्वासन दे कर आगन्तुक को कक्ष से विदा किया।

**/४-**

अगले प्रभात में जब नागभट्ट ने आगन्तुक को अपने कक्ष में बुलाया तो वह उत्तर सुनने के लिए व्यग्र था। नागभट्ट ने रात्रि में ही अपने मंत्रियों,सेनापतियों से इस विषय मे आवश्यक विमर्श कर लिया था। नागभट्ट ने आगन्तुक से पूछा- यजीद ने कितने दिन पूर्व वह प्रस्ताव भेजा था? आगन्तुक ने धीमे स्वर में कहा- पांच दिन पूर्व। उसकी ध्वनि अत्यंत कोमल लग रही थी।

नागभट्ट ने फिर पूछा- तुमको यहां पहुचने में कितने दिन लगे थे?

आगन्तुक ने कोमल स्वर में ही उत्तर दिया- तीन दिन। उस घृणित प्रस्ताव के अगले दो दिन बाद ही राजकुमारी ने मुझे कन्नौज के लिए प्रस्थान करा दिया था।

नागभट्ट ने गम्भीर हो कर कहा- अगले एक प्रहर में ही मैं ससैन्य कूच करूँगा, तुम भी तुरन्त भोजनादि से मुक्ति पा कर तैयार रहो।

नागभट्ट ने ध्यान दिया, उस दूत की आंखे चमक उठी थीं।

छठवें दिन नागभट्ट अपनी सेना के साथ उद्भाण्डपुर राज्य की सीमा में थे। दूत उन्हें वन के मार्ग से ही लाया था, ताकि किसी को कन्नौज की सेना के आने का भान न हो। एक निश्चित स्थान पर दस सैनिकों की एक छोटी सी टुकड़ी जैसे उनकी प्रतीक्षा ही कर रही थी। तुरन्त महाराज रामपाल के पास संदेश गया और घण्टे भर के अंदर कुछ सैनिकों के साथ वे आ पहुँचे। युवा नागभट्ट ने बृद्ध हो चले रामपाल का चरण छू कर प्रणाम करना चाहा तो रामपाल जैसे जड़ हो गए। उन्होंने तुरंत स्वयं को पीछे खींचते हुए कहा- आप महान कन्नौज के सम्राट हैं महाराज, आपका मेरा पैर छूना शासकीय मर्यादा के विरुद्ध है।

नागभट्ट मुस्कुराए। बोले- शासकीय मर्यादा जो हो महाराज, पर आर्यावर्त की मर्यादा इसी में है कि मैं आपके पैर छू कर आशीष लूं।

रामपाल की आंखों में जल भर आया। उन्होंने भर्राए स्वर में कहा- अमर होवो पुत्र, युगों युगों तक तुम्हारी प्रतिष्ठा बनी रहे। तुम सचमुच आर्यावर्त के प्रतिहारी हो, तुम सच्चे प्रतिहार हो।

महाराज रामपाल ने कन्नौज की सेना का वहीं डेरा लगवाया और यजीद के संभावित आक्रमण की सूचना दी। यजीद की सेना अगली ही सुबह उद्भाण्डपुर पहुचने वाली थी। नागभट्ट ने अपनी सेना को तैयार रहने का आदेश दिया, और स्वयं तैयारियों का निरीक्षण करने लगे।

इस बीच किसी ने ध्यान नहीं दिया, रहस्यमयी दूत का कहीं पता नहीं था।

**/५-**

यजीद की अरबी सेना उद्भाण्डपुर की सीमा पर शाम को पहुँची और पड़ाव डाल दिया। उसे अगले सुबह उद्भाण्डपुर की कुछ सौ की सेना के साथ युद्ध की आशा थी, पर उसका स्वागत करने के लिए कन्नौज की सेना खड़ी थी। यजीद के सैनिक अभी उठ कर आक्रमण की तैयारी करते, तबतक प्रातःकाल में ही नागभट्ट की सेना ने उनपर धावा बोल दिया। जबतक वे कुछ समझते तबतक एक चौथाई अरब मर चुके थे। कन्नौज की सेना जीत के उत्साह के साथ युद्ध कर रही थी, फल यह हुआ कि दोपहर तक आधे अरब मारे जा चुके थे।

शाम होते होते अपना एक हाथ और तीन चौथाई सेना गंवा कर यजीद दक्षिण की ओर भाग चला। उद्भाण्डपुर में जीत का उल्लास छा गया था।

दो दिनों तक उद्भाण्डपुर का मेहमान बने रहने के बाद तीसरे दिन जब नागभट्ट कन्नौज के लिए प्रस्थान करने लगे, तब उन्होंने राजा रामपाल से कहा- कुछ निवेदन करूँ तो देंगे आर्य?

रामपाल ने गर्व से छाती चौड़ी कर के कहा- निवेदन नहीं पुत्र आदेश करो, उद्भाण्डपुर अब तुम्हारा ही है।

नागभट्ट मुस्कुराए- मुझे आपका वह रहस्यमयी दूत चाहिए महाराज। मैं उसे कन्नौज ले जाना चाहता हूं।

रामपाल के माथे पर स्वेद की बूंदे झलकने लगीं। उनके मुह से निकला- पर पुत्र, वह तो....

नागभट्ट की मुस्कुराहट बढ़ गयी। बोले- जानता हूँ महाराज। सप्ताह भर की यात्रा को तीन दिन में पूरा करने की जिद किसी दूत की नहीं हो सकती। महाराज, किसी भी साम्राज्य का आधार केवल सम्राट का शौर्य नहीं होता, अपितु सम्राज्ञी की तपस्या, उसकी बौद्धिक क्षमता और सतर्कता भी उसका महत्वपूर्ण भाग होती है। मैं वचन देता हूँ कि राजकुमारी त्रिशला की मर्यादा पर कभी आंच न आने दूंगा।

बृद्ध रामपाल ने लपक कर नागभट्ट को गले लगा लिया।

**/६-**

चार दिन बाद कन्नौज की साम्राज्ञी राजकुमारी त्रिशला को विदा करा कर कन्नौज लौटते समय राह में नागभट्ट ने पूछा- महारानी! क्या आपको सचमुच विश्वास था कि मैं आपकी सहायता करूँगा?

त्रिशला ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया- आप आर्यावर्त के सर्वश्रेष्ठ योद्धा हैं महाराज, आपके ऊपर अविश्वास का कोई कारण ही नहीं था। प्रतिहार होने के गर्व के साथ शस्त्र उठाने वाला बीर हमारी सहायता कैसे नहीं करता। पर मुझे आपसे ज्यादा स्वयं पर विश्वास था महाराज।

नागभट्ट ने गम्भीर हो कर कहा- इस विश्वास को बनाये रखियेगा महारानी, हमें एक बड़े साम्राज्य का निर्माण करना है। आपका विश्वास ही उसकी नींव बनेगा।

राजकुमारी मुस्कुरा उठी।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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