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Janta Ki Awaz

फिर एक कहानी... "बन्दूक"

फिर एक कहानी...  बन्दूक
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उसके सारे साथी पीछे छूट गए थे। वह लगभग घण्टे भर से इस घने जंगल में भटक रहा था। अब उसे दिशा भी समझ में नहीं आ रही थी, वह यूँ ही इधर उधर भटक रहा था।

वे इस जंगल में घूमने आए थे। उसके साथ उसके तीन साथी और थे, जो अब कहीं दिख नहीं रहे थे। वह जंगल में घूमने और पशु-पक्षियों की तस्वीरें लेने हमेशा घने जंगलों में आता रहता था। इस बार भी वह और उसके दोस्त हाथी का झुंड खोजते असम के इन घने जंगलों में घुसे थे, और जाने कब भटक कर अलग अलग हो गए थे।

वह भटकते भटकते बहुत अंदर तक चला आया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि किधर जाए... आदमी जब कहीं फँस जाय तो मूर्खतापूर्ण हरकतें करने लगता है। वह जानता था कि यहाँ दूर दूर तक कोई मनुष्य नहीं है, पर अनायास ही जोर जोर से चिल्लाने लगा, "कोई है.... कोई है जो मुझे रास्ता बता दे...."

वह जानता था कि कहीं से कोई उत्तर नहीं आएगा, पर लगातार चिल्लाने लगा। अचानक पेड़ों की ओट से कुछ आवाजे आने लगीं। उसने आश्चर्य से उस ओर देखा, पर जबतक वह कुछ समझ पाता खूंखार हाथियों का एक बड़ा सा झुंड उसके अत्यंत निकट आ गया था। वह कांप गया, हाथी उससे मात्र 25-30 फीट की दूरी पर थे। उसने इधर उधर नजर दौड़ाई तो देखा, वह जिस पेड़ के पास खड़ा था उसपर चढ़ना आसान था। वह तीब्र गति से पेड़ पर चढ़ गया और जल्दी जल्दी और ऊपर चढ़ता गया। हाथियों का झुंड पेड़ के बिल्कुल करीब आ गया था।

उसने ध्यान नहीं दिया कि वह जिस डाली पर रुका हुआ है, वह सूख चुकी है। एकाएक डाली टूट गयी और वह नीचे गिर पड़ा। वह लगभग 30 फीट की ऊंचाई पर था, उसे लगा जैसे उसकी कहानी खत्म। पर...

वह जब भूमि पर गिरा तो उसे बिल्कुल भी चोट नहीं लगी। उसे लगा जैसे किसी ने उसे हवा में ही लोक कर धीरे से नीचे रख दिया हो। उसने घबड़ा कर सामने हाथियों को देखा, वे आश्चर्यजनक रूप से पीछे हटने लगे थे। कुछ कदम पीछे हटने के बाद सारे हाथी मुड़ गए और वापस चले गए। वह भय मिश्रित आश्चर्य से इधर उधर देखने लगा, पर कुछ दिखाई नहीं दिया। कुछ पल बाद उसे एक पुरुष की खिलखिलाहट सुनाई दी, उसे लगा जैसे वह इस हँसी को पहचानता है। उसने आश्चर्य से कहा, "कौन है?"

कुछ क्षण बाद आवाज आई, "पीछे मुड़ो और सीधे चले जाओ! रास्ता मिल जाएगा..."

उसने कहा, "आप कौन हैं?"

आवाज आई- तुम्हारा दोस्त। अब कुछ मत पूछो, चुपचाप भाग जाओ नहीं तो हाथी फिर आ जायेंगे। भागो....

वह सचमुच पीछे मुड़ा और भगा। लगभग पन्द्रह मिनट लगातार भागने के बाद उसने स्वयं को मुख्य सड़क पर पाया, जहाँ पहले से ही एक ट्रक रुकी हुई थी। ट्रक के ड्राइवर-खलासी शायद पेशाब करने के लिए रुके थे। उसने उनसे सहयोग लिया और घर भाग आया।

जंगल की घटना उसके मन में लगातार घूम रही थी, पर उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

★★★★★★★★★★★★★★

महीनों बीत गए, पर वह इस घटना को भूल नहीं सका। वह हमेशा उस अदृश्य सहायक के बारे में सोचता रहता था। वह कौन था, उसने उसकी सहायता क्यों की? वह मनुष्य तो था नहीं, तो था कौन? कोई प्रेत, कोई देव, कोई शक्ति... ? वह बार बार सोचता था कि उसे जंगल में जा कर पता करना चाहिए। जंगल जैसे उसे अपनी ओर खींच रहा था।

आखिर उससे रहा नहीं गया। महीने भर बाद वह अकेले ही उस जंगल में निकल पड़ा। जगह उसे याद थी, सो उसे पहुँचने में अधिक परेशानी नहीं हुई। मुख्य सड़क पर जिस जगह उसे ट्रक वाला मिला था, उसी जगह उसने अपनी जीप लगाई, और अंदर वन में उतर गया।

वह तेजी से अंदर की ओर बढ़ रहा था। वह मन ही मन उस अदृश्य शक्ति को प्रणाम कर उनसे मिलने की प्रार्थना कर रहा था। जंगल में शांति पसरी हुई थी, और वह पत्तों को खड़खड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था। अचानक...

उसके कानों से एक तेज गुर्राहट टकराई। वह जंगल और जानवरों को खूब समझता था, सो जान गया कि गुर्राहट शेर की है। वह रुक गया, और हड़बड़ा कर इधर उधर देखने लगा। उसे जाने क्यों भरोसा था कि वह शक्ति उसकी मदद करेगी।

वह अभी इधर उधर देख ही रहा था कि उसकी दृष्टि शेर पर पड़ी, शेर उससे सौ कदम की दूरी पर खड़ा उसे ही देख रहा था। उसके रौंगटे खड़े हो गए। शेर अब धीरे धीरे उसी की ओर बढ़ने लगा था।

अचानक जैसे किसी ने उसे हवा में उछाल दिया। वह लगभग सौ कदम की दूरी पर गिरा। उसे लगा जैसे कोई कह रहा हो, "फिर फँस गए बेटा! उधर भाग, उस इमली वाले पेंड़ के पीछे भाग..."

इमली का पेंड़ उससे बीस कदम की दूरी पर था। वह उठा और उसने तेज दौड़ लगा दी। पल भर के अंदर वह इमली के पेंड़ के नीचे था। अचानक उसकी नजर नीचे गयी, जमीन पर एक बंदूक पड़ी थी। उसने तेजी से बंदूक उठाई और नली ऊपर उठा कर ट्रिगर दबा दिया। उसे उम्मीद भी नहीं थी कि बन्दूक लोडेड होगी और फायर हो जाएगा। पर फायर हुआ और उसने देखा, शेर पीछे मुड़ कर भाग रहा था।

एकाएक उसने सोचा, "इस बिराने में बंदूक, वह भी लोड की हुई..." वह कांप उठा, बन्दूक उसके हाथ से छूट गयी। अचानक फिर उसे वह अदृश्य खिलखिलाहट सुनाई दी। उसने दिमाग पर जोर देकर सोचा कि कभी न कभी, कहीं न कहीं तो यह हँसी सुनी है। पर उसे कुछ याद नहीं आया। वह किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा था। अचानक उसे वही आवाज सुनाई दी, "मुझे मत ढूंढ बेटा! घर जा... और फिर कभी इधर मत आना।"

उसने तेज आवाज में पूछा, "पर आप हैं कौन? आप हर बार मेरी सहायता क्यों करते हैं?"

उत्तर आया, "तू नहीं समझ पायेगा। बस इतना समझ कि तुझे बहुत प्यार करते हैं हम। अच्छा एक काम कर, यह बन्दूक लेता जा। लाख रुपये की है, तेरे काम आएगी। अब कुछ मत पूछना, सीधे घर लौट जा।"

उसे भी कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। वह आश्चर्य में डूबा बन्दूक ले कर जंगल से निकल आया। उसकी जीप वहीं खड़ी थी, उसने बन्दूक गाड़ी में रखी और घर चल दिया।

इस बार वह इस घटना को छिपा नहीं सका। वह घर लौटा तो उसके चेहरे पर भय साफ दिख रहा था। उसे देखते ही उसके पिता ने हड़बड़ा कर पूछा, "क्या हुआ अशोक! इतने डरे हुए क्यों हो?"

वह सोफे पर बैठ गया और उसने पूरी कहानी उन्हें बता दी। आश्चर्य में डूबे पिता ने पूछा, "वह बन्दूक किधर है? तनिक दिखाओ तो..."

वह दौड़ता हुआ गया और जीप से बन्दूक निकाल लाया। उसके पिता ने बस एक नजर देखा बन्दूक की ओर; और उनका पूरा चेहरा सफेद हो गया। वे कांप कर धड़ाम से गिरे और बेहोश हो गए।

वह आश्चर्य में डूबा, हड़बड़ाया हुआ उनके चेहरे पर पानी के छींटे डालने लगा। उनकी बेहोशी नहीं टूटी तो उसने पड़ोस से डॉक्टर को बुलवाया। आधे घण्टे बाद उनकी बेहोशी तो टूट गयी पर वे कुछ बोल नहीं रहे थे। डॉक्टर ने भी कहा कि इन्हें परेशान न किया जाय, इन्हें आराम की आवश्यकता है।

रात तक घर के सारे लोग उन्हें घेर कर बैठे रहे। फिर सब अपने अपने कमरों में सोने चले गए।

★★★★★★★★★★★

राजेन्द्र! राजेन्द्र! अबे साले, बन्दूक इधर फेंक....

वह डरा हुआ था। बन्दूक एक ही थी जो उसके हाथ में थी। शिकार की तलाश में घने वन में घूमते इन दो शिकारी मित्रों राजेन्द्र सिंह और सत्यजीत वसु पर शेर ने एकाएक आक्रमण किया था। दोनों झटके से मुड़ कर पीछे भागे, राजेन्द्र एक पेंड़ की ओट में छिप गए पर सत्यजीत का पैर में जमीन से बाहर निकली किसी पेंड़ की जड़ से फँस गयी और वे गिर पड़े। शेर उनके ठीक सामने खड़ा था। पेंड़ के पीछे छिपे राजेन्द्र सत्यजीत को दिख रहे थे, वे बार बार राजेन्द्र को इशारा कर उनसे बन्दूक मांग रहे थे पर राजेन्द्र भय से सुन्न हो गए थे। वे सब देख रहे थे, पर उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा। शेर धीरे धीरे सत्यजीत के पास पहुँच गया था। उसने अंतिम बार राजेन्द्र को पुकारा, "साले अब तो फेंक बन्दूक, नहीं तो यह मार डालेगा मुझे..."

राजेन्द्र के हाथ पांव फूल गए थे। बन्दूक उनके हाथ से छूट गयी। सत्यजीत ने उनके हाथ से बन्दूक गिरते देखा, और फिर देखा शेर को... उनके चेहरे पर एक मरी हुई मुस्कान तैर गयी। अगले ही क्षण शेर का पंजा उनकी गर्दन पर था।

राजेन्द्र देर तक पेड़ के पीछे सुन्न पड़े रहे। कुछ देर बाद चेतना आने पर वैसी ही दशा में गिरते पड़ते घर लौट आये।

बिस्तर पर पड़े राजेन्द्र सिंह के दिमाग में आंधी चल रही थी। बीस साल पहले घटी घटना और वह दोस्त आज उनकी आंखों के आगे नाच रहे थे।

सुबह हो गयी थी। राजेन्द्र सिंह अब स्वस्थ थे। अशोक ने उनसे बन्दूक देख कर डरने का कारण पूछा तो वे टाल गए। अशोक ने भी ज्यादा परेशान नहीं किया, वह उन्हें स्वस्थ देख कर सन्तुष्ट था।

★★★★★★★

दो दिन बाद सुबह के समय अशोक ने देखा, पिता का कमरा खाली था। उसने इधर उधर ढूंढा पर वे नहीं मिले। वह वापस कमरे में लौटा तो देखा, तकिए के नीचे दबा एक कागज दबा हुआ था। उसने जल्दी से कागज खींच कर पढ़ा, उसपर कुछ यूं लिखा था--

" मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना बेटा, क्योंकि अब हम नहीं मिलेंगे। मैं अपने उस दोस्त के पास जा रहा हूँ जो मुझे और तुमको सबसे ज्यादा प्यार करता था। तुम्हे सत्यजीत चाचा याद होंगे, वही जो तुम्हारे बचपन में रोज ही हमारे घर आते थे और तुम्हे बड़ा प्यार करते थे। आज के पन्द्रवें दिन किसी ब्राह्मण से मिल कर मेरा और उनका श्राद्ध कर देना। और याद रखना, हम दोनों ही तुम्हे बहुत प्रेम करते थे। बहुत...."

अशोक आश्चर्य, शोक, और भय के मिले जुले भाव के साथ वहीं बैठ गया। जंगल से मिली बन्दूक वहीं निकट ही रखी हुई थी। अनायास ही उसने बन्दूक हाथ में लेकर ध्यान से देखा तो उसकी आंखें आश्चर्य से फटी रह गईं। कुन्दे पर लाल स्याही से लिखा हुआ था- राजेन्द्र सिंह!

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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