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Janta Ki Awaz

' विदाई '

 विदाई
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आज से 90-95 वर्ष पूर्व।तमकुही राज के राजमहल की नृत्यशाला।

तकधिकधिनाकधिनक तिर्किट तकधा किट तकधा........

छम छमक छम.........

तबले की थाप के साथ थिरकते पाँवों में क्वणित नूपुर की संगत पूरे वातावरण को सम्मोहित कर रही थी। सारंगी की स्वर लहरों पर चंद्रमा की झिलमिल ज्योत्सना की तरह तिरते कस्तूरी बाई के सौंदर्य ने नृत्यशाला में उपस्थित व्यक्ति व्यक्ति को जैसे अभिमंत्रित सा कर दिया था। संगीत की बढ़ती लय के साथ-साथ सुर और सौंदर्य का सम्मिलित जादू भी बढ़ता ही जा रहा था। गीत के भाव अनुरूप नृत्य करती हुई कस्तूरी बाई के हाव भाव पूरी सभा के लिए अभूतपूर्व चमत्कार से थे। अपने चरम पर पहुंचकर सम की अंतिम थाप पर संगीत के साथ-साथ कस्तूरी के पांव भी रुक गए। सभा की निस्तब्धता छिन्न-भिन्न हो गई और पूरा सभागार 'वाह वाह' 'अति सुंदर' 'अद्भुत' आदि शब्दों के साथ तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कस्तूरी बाई ने पूरे सम्मान के साथ झुक कर गद्दी पर आसीन राजा इंद्रजीत प्रताप शाही का अभिवादन किया और राज सभाओं की परंपरा के अनुसार राजा साहब की ओर से मिलने वाले अनुग्रह की प्रतीक्षा करने लगी। लेकिन उसकी आशा के अनुसार राजा साहब ने ना तो अपनी मुट्ठी में सिक्के भर कर उसकी कमनीय देह के ऊपर फेंका और ना ही गले की मोतियों की माला तोड़कर उसकी मोतियों को ही उसकी तरफ उछाला। उन्होंने आशीर्वाद देने की मुद्रा में अपने दोनों हाथ उठाए और ' बहुत सुन्दर ' कहते हुए निर्विकार भाव से उठकर अंग रक्षकों के साथ नृत्यशाला से बाहर चले गए। कस्तूरी बाई अवाक खड़ी रह गई। यह पहली बार हुआ था जब उसकी कला की प्रशंसा करने वाले ने उसके सौंदर्य की तरफ देखा भी नहीं था। आज से पहले अपने कद्रदानों के हाथों में उसने पुरस्कार तो अपनी कला के लिए देखा था, परंतु उस पुरस्कार को न्यौछावर होते हुए अपने सौंदर्य के ऊपर पाया था। अभी तक उसने लोगों के होठों पर नृत्य की प्रशंसा भले ही पाई थी लेकिन आंखों में प्रशंसा के स्थान पर वासना के लाल डोरे ही देखे थे। कला के सम्मान में झुकी हुई आंखें उसे आज पहली बार देखने को मिली थीं। ' इसे वह अपना सम्मान समझे या अपमान ' इसी उधेड़बुन में पड़ी पड़ी वह अपने कक्ष में आ गई।

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कस्तूरी बाई नृत्यशाला से लौटने के बाद विश्राम की अवस्था में बैठी थी। उसकी परिचारिका उसके शरीर से आभूषणों को उतारकर उसके केश सँवार रही थी। वह तमकुहीराज के राजा इंद्रजीत प्रताप शाही के आमंत्रण पर उनके राज्य में दशहरे के अवसर पर होने वाले त्रिदिवसीय वार्षिक समारोह में सम्मिलित होने के लिए आई थी और आज उसका तीसरा और अंतिम दिन था। पूरी राजधानी को अलकापुरी की तरह सजाया गया था। दूर-दूर के राजाओं और जमींदारों को बुलाया गया था और उसका नृत्य देखने के लिए प्रजा भी बड़ी संख्या में आई थी।

' आहा कितना सुंदर दृश्य था पूरी नृत्यशाला रसिकों से भरी थी। सबने कितनी तन्मयता और सम्मान के साथ मुझे देखा और सुना। इतने लोगों के समाज में कहीं भी किसी ने कोई अभद्रता नहीं की। आज यह मेरे जीवन का अप्रत्याशित दिन था। इतने लोग जुटे थे जैसे मेला लगा हो। .........मेला.........हाँ वह मेला ही तो था।' कस्तूरी बाई खुले वातायन के पार शून्य को निहारने लगी।

12 वर्ष की नवकिशोरी सुगंधा अपने पिता से जिद कर रही थी- "बाऊ हो!हम सावन के झूला देखे जाब।हम मेला देखे जाब।"

"चोप्प!देखत नाइ हइ कि बाऊ के केतना काम हौ।के ले जाई तोके मेला? बस चोप्प मारके घरे बइठ।"-माँ ने आँखें तरेरी।

"हमार सब सहेली जात हईं माई! हमरो के जाए द ना! हम बहुत जल्दी लउट आउब।"-बेटी ने मनुहार की।

माँ ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि पिताजी बोल पड़े-"अरे त जाए काहें ना देत हउ? कउन अकेले जाए के कहति बा! बच्चे न बा, घुमि आवे दा।"

बेटी खुशी के मारे बाप से लिपट गई।

"बिगारा खूब।तोहई भुगतबा।" कहते हुए माँ पैर पटकते हुए चली गई। पिता बड़े स्नेह से उसके सिर को सहलाते रहे।

"आह"-कस्तूरी बाई के होठों से हल्की सी चीख निकल गई।अतीत का दर्पण अचानक ही झनझना कर टूट गया। बालों में कंघी करती बाँदी को झिड़कते हुए बोली-"अरी! थोड़ा आहिस्ता सँवार न! खींच क्यो रही है? मैं तुझसे बार बार कहती हूँ न कि जब कोई मेरे बाल खींचता है तो मुझे बड़ी तकलीफ होती है! मेरे तो प्राण ही इन्हीं बालों में बसते हैं। ये बाल.............।

बालों को ही तो पकड़ कर वो संगीनधारी सिपाही सुगन्धा को घसीट कर ले जा रहा था। उसकी भयभीत सखियां एक दूसरे को पकड़कर जोर-जोर से चिल्ला रही थी, सिपाही से सुगंधा को छोड़ देने की विनती कर रही थी और तमाशा देखती भीड़ से सहायता के लिए गिड़गिड़ा रही थी। उन मासूमों को क्या पता था कि उनकी सहायता के लिए कोई नहीं आएगा क्योंकि सुगंधा का अल्पविकसित कौमार्य फिरंगियों के द्वारा नियुक्त किये गए बनारस के नायब कासिम अली की आंखों में चढ़ गया था। अपने बाऊ की दुलारी कुछ ही क्षणों के बाद कासिम अली की कसबिन(रखैल) बन चुकी थी और ऐसी दीवारों में कैद हो चुकी थी जहां ना तो उसकी मां की ममता भरी डांट पहुंच सकती थी और ना ही पिता का अबाध स्नेह पहुंच सकता था।

"बाई जी!"-परिचारिका ने फिर से विघ्न डाला। कस्तूरी बाई ने स्वयं को सचेत किया। देखा तो आंखों में बिन बुलाए आंसू आ गए थे जल्दी से उन्हें पोछते हुए परिचारिका से बोली-" अब क्या हुआ?"

"बाई जी! मैंने आपके सारे गहने उतार दिए। बस यह नथ ही रह गई है, लाओ इसे भी उतार कर रख दूं ।जल्दी से जाने की तैयारी भी करनी है।"

"नथ"-कस्तूरी के पूरे शरीर में झुरझरी सी दौड़ गई। यह वही नथ तो थी जिसे उस रात उसकी छिदी हुई नाक में गहने के नाम पर डाले गए नीम की सींक के तिनके को निकालकर पहली बार कासिम अली के आदेश पर पहनाया गया था। उस रात ही तो उसे सुगंधा के स्थान पर नया नाम मिला था 'कस्तूरी'। उस रात की पीड़ा............उफ्फ! चीख भी तो नहीं पाई थी वह। खुद को बचाने के लिए अपने बाऊ को भी पुकार नहीं पाई थी और उस रात के बाद वह पीड़ा जैसे उसकी नियति बन गई, और वह बन गई गोरी सरकार के अफसरों और उनके तीमारदारों की आवभगत का सामान। धीरे-धीरे उसने सच स्वीकार कर लिया 4 साल के बाद ही जब कासिम अली का मन भर गया तो उसे दाल मंडी में भेज दिया गया जहां उसके नाम के साथ बाई शब्द भी जुड़ गया धीरे-धीरे कस्तूरी बाई का नाम पूरे बनारस की जुबान पर चढ़ गया। गोरे अफसरों, राजाओं महाराजाओं से लेकर कारिंदे तक उसके दीवाने थे। धन सावन के मेघ की तरह बरसता था। उसके रूप की चांदनी राजाओं के दरबार के साथ-साथ उनके शयन कक्षों को भी बिना किसी हिचक रोशन करती आ रही थी लेकिन तमकुही राज में आकर उसे बड़े भारी आश्चर्यजनक असंतोष का सामना करना पड़ा था।

"यहां के राजा इंद्रजीत प्रताप शाही ने मुझे परखने में भूल कर दी या मेरे रूप का आकर्षण ही अब क्षीण होता जा रहा है?" उसने मन ही मन खुद से पूछा और परिचारिका की ओर घूम कर बोली-"अरी सुन ना! जरा मेरी ओर गौर से देख तो!"

"क्या हुआ बाई जी?" परिचारिका ने नासमझी के साथ पूछा।

"तू तो मेरे साथ वर्षो से रह रही है जरा देख तो मेरी खूबसूरती में कुछ कमी आ रही है क्या?"

" यह आप क्या कह रही हैं बाई जी! आपको तो देखकर पूनम का चांद भी समुद्र में डूब जाता है। देखने वालों की आंखें भंवरे की तरह आपके मुख कमल से उलझ कर रह जाती हैं। नैनों के कटाक्ष की कटार इतनी तीक्ष्ण है कि अकेली ही पूरी सेना को भी आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर सकती है। आपको तो बस नजर ना लगे किसी की।"

"सच?" कस्तूरी ने दासी की आंखों में देखते हुए पूछा।

" भरोसा ना हो तो कहो कसम खा लूँ।"- दासी ढिठाई के साथ बोली।

"तो फिर यहां के राजा ने मेरी ओर देखा तक क्यों नहीं? मेरे सौंदर्य का ऐसा अपमान क्यों?"- कस्तूरी मन ही मन विचार करने लगी।

"बाई जी!"- अचानक कक्ष के द्वार पर शाही नौकर ने आ कर पुकारा-" गाड़ी तैयार है राजा साहब ने आपको बुलावा भेजा है"।

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कस्तूरी बाई जब राज दरबार में पहुंची तो उसने देखा कि राजा रानी के साथ साथ पूरा राज परिवार उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। राज दरबार में आज उसका बड़ा ही अभूतपूर्व स्वागत हुआ। बड़े सम्मान के साथ उसे आसन पर बैठाया गया। सबसे पहले स्वयं रानी उठकर उससे मिलने गई और विदाई स्वरूप कीमती वस्त्र, जड़ाऊ स्वर्ण आभूषण इत्यादि के साथ ढेर सारा धन देकर आशीर्वाद दिया। फिर एक-एक करके राज परिवार के सभी सदस्यों ने उसका अभिनंदन किया और सबसे अंत में राजा साहब ने बड़े ही स्नेह के साथ उसकी ओर देखते हुए दोनों हाथ जोड़कर कहना शुरू किया-" यह हम सभी का, पूरे तमकुही राज का परम सौभाग्य था कि आप जैसी कला-साधिका के चरण इस धरा पर पड़े। आपके ऊपर साक्षात मां सरस्वती की विशेष अनुकंपा है। उस अनुकंपा के प्रसाद स्वरूप दशहरे के इस समारोह में आपने हम सभी के ऊपर जो रस- वर्षा की है उसके लिए हम सभी सदैव आपको याद रखेंगे और निवेदन करेंगे कि भविष्य में भी जब समय मिले तो आप ऐसे ही हमारा आतिथ्य स्वीकार करती रहें।"

कस्तूरी फफक पड़ी। सब लोग चकित हो गए। राजा साहब ने आश्चर्य के साथ घबराकर पूछा-" क्या हुआ? हमसे कोई गलती हो गई क्या? क्या यहां किसी ने भी किसी प्रकार से आप का अपमान किया है?"

"नही महाराज!"-कस्तूरी ने रोते हुए कहा।-"आज मुझे मेरे बाऊ की याद आ गई। मैंने पता नहीं कितने राजाओं की रंगशालाएं और जमींदारों की महफिलें सजाई हैं। सब ने मुझ पर अपनी रानियों से भी अधिक प्रेम और संपत्ति लुटाई है। रातभर महफ़िलों की रानी रहने वाली यह कस्तूरी वहां से लौटते समय सदैव ही एक तवायफ, एक वेश्या, एक रक्कासा या एक रंडी के रूप में ही विदा होती आई थी लेकिन आज यहाँ से विदा होते हुए पहली बार ऐसा लगा है मुझे, जैसे मैं एक बेटी के रूप में विदा हो रही हूं। इन आंखों के जो आंसू सालों पहले एक बेटी के मरने पर सूख चुके थे आज उसी बेटी के फिर से जीवित हो जाने पर पुनः बह चले हैं जिनसे सिंचित होकर समाज की निगाहों की अग्नि में झुलसी यह लता आज फिर से पल्लवित पुष्पित हो सुगंधा हो गई है। मिट्टी के धेले के समान श्रीहीन हो चुकी यह कस्तूरी पुनः अपनी मदहोश कर देने वाली खुशबू से गमगमा उठी है। मैं फिर से सुगंधा हो गई......मैं फिर से सुगन्धा हो गई........।"

-संजीव कुमार त्यागी

लट्ठूडीह, गाजीपुर

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