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बरखा बहार आई

बरखा बहार आई
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धान के दो पौधे बारी-बारी से घुटनों से मेरा पैर छूआ तो न चाहते हुए भी मैं मेड़ पर बैठ गया। वे दोनों पहले तो थोड़ा झिझके, शर्माए फिर मुझे देखता देखकर कुछ अधिक ही झूमने लगे... जंगली... पौधे।

पहली धान का पौध नई और दूसरी तीन-चार बरस की अनुभवी नाटी थी। नए नवेले पौधे पर अपने बड़े होने का रौब गांठ रही थी-" ज्यादा इतराओ न, अभी तुम आकाश में उमड़ते-घुमड़ते इन मेघों के कहर को देखी कहां हो? ठीक है कि सूरज के ताप से अभी ये हमको बचाए हुए हैं किंतु इनका डंडा गुंडा पवन है। जब-तक वह इनको अपने कंधों पर रखता है तब-तक तो ये उसके संग खूब इधर से उधर घूमते झूमते फिरते हैं पर वह जैसे ही थोड़ा ठहर जाता है तो ये मेघ मुंहझौंसे सेठ के जैसे पसर जाते हैं सारे आसमान में और तब इनका जी बहलाने के लिए आती हैं बिजली रानी और वो गुंडा पवन भयानक ढ़ोल बजा बजा कर इस बिजली को नचवाया है और उसी ताल पर ये मेघ रूपयों की तरह पानी लुटाता है और उसकी कीमत चुकानी पड़ती है हमको। हम लुट जाती हैं, बरबाद हो जाती हैं।"

तभी नहर पर खड़े बछड़ो का एक जोड़ा खेत में कूदा। दोनों सहम उठीं और उनके मुंह से कराह उठी- 'आ गए आवारे अब ये चर जाएंगे हमको।'

मेरी बगल से मेड़ पर की घास ने जैसे अंगड़ाई लिया- "क्या कुछ भी बोलती रहती हो तुम लोग, ये बछड़े जिन्हें तुम सब 'आवारे' कह रही हो। जब कभी बैलों का जमाना था तब इनकी पूछ तुम लोगों से ज्यादा होती थी। इनकी क्या मेरी भी खूब पूछ होती थी। मेरे लिए तो लाठियां और गोलियां तक चला करतीं थीं और देखना तुम लोग एक दिन जब अरब का तेल खरब में जाने लगेगा तब इन्हीं 'आवारे बछरुओं' के लिए लाठियां न तन गई तो कहना। गोदान से कम महत्व इनका न समझना। वो होरी के बेटा गोबरधन का प्रेम मंगनी के बैल के चलते ही हुआ था। आवारे न कहो इनको, उपेक्षित, तिरस्कृत कहो। नहीं तो कभी इन्हीं बछरुओं के जन्म पर जमींदारों और किसानों के घर फुलवरा बना करता था।"

नई नवेली धान की पौध ने घास से पूछा-''काकी! ये मेघ क्या सचमुच बहुत ख़तरनाक होते हैं?"

घास कुछ बिगड़ खड़ी हो गई-"पानी में डूबी, पानी में उगी, पानी में रोपी, पानी में पकी और पानी से धोई जाने वाली वाली को बादलों से बड़ी फिक्र हो रही है। तुम लोगों के चलते हमको कितना नोचा-बकोटा जाता है इसकी किसी को फिक्र नहीं।"

बछड़ों को भगाने के लिए मिट्टी के ढ़ेले उछाल मार रहे हैं, बेरोजगारी भत्ता वाले युवाओं की लाठियां और ललकार उन्हें लखेदे जा रही है।

नभ मंडल अपना मेघ कमंडल गड़गड़ा रहा है, बिजली की चमक और उसपर सोंधी हवा की गमक भारी जल प्लावन को तत्पर है।

उत्तरा चबूतरा बांध रही है और भादो की कमी को भरपाई करने वाली है... रात खूब बरसी है।

वे दोनों पौधे पसर गई हैं।

आलोक पाण्डेय

बलिया उत्तरप्रदेश

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