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बोरी, आखिर है किसकी! इनकी या मेरी....

बोरी, आखिर है किसकी! इनकी या मेरी....
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माह में दो-तीन बार गेहूँ पिसवाने जाता हूँ. कल भी चक्की पर गया था (आम बोलचाल में आटा ही पिसवाता हूँ लेकिन यहाँ इतना पेंचकश लगाने वाले हैं इसलिए यहाँ लिखने में 'मैं गेहूं पिसवा रहा हूँ').

आटा चक्की पर गेहूँ पिसने के बाद मेरी बोरिया वेइंग स्केल पर रखी गई. वजन कुल बत्तीस किलो पांच सौ ग्राम लगभग...नाक तक कसी हुयी. वहीं मेरे बराबर में एक भाई साहब खड़े थे. वो मेरी बोरी पर नजर गड़ाकर तीन बार लपके. एक बारगी मैं भ्रम में पड़ गया कि बोरी, आखिर है किसकी! इनकी या मेरी.... वैसे भी गेहूं पिसवाने में जो बोरियां प्रयोग में लायी जातीं हैं उसमें ज्यादातर यूरिया के खाली बोरे ही होते हैं. किसी बोरे पर 'इफको' लिखा होता है या किसी पर 'किसान'! बोरिया भी ज्यादातर पीले या सफेद रंग की होती है..इसलिए अपनी वाली बोरी को बहुत दमदारी से आप अपना नहीं बता सकते.. इसी भ्रम.. विभ्रम की स्थिति में मैंने उनसे पूछा- "क्या यह आपकी बोरी है?"

भाईसाहब- नहीं! दरअसल आपके बोरी के बराबर में जो डोरी रखी है वो मेरे बोरे कि है..[दरअसल वो डर रहे थे कि कहीं उनके बोरे के इज़ारबंद (जरबन) से मेरी बोरिया का गला न कस दिया जाये.]

मैंने कहा- आपकी डोरी कुछ विशेष है या जल्दबाज़ी में किसी ऐसी जगह से निकाल कर लायें जहाँ दुबारा फिट करना़ है आपको. यथा- जूते का फीता... पायजामे का नाड़ा...

भाई साहब- नहीं! ऐसी कोई बात नहीं दरअसल मेरी मिसेज़, डोरी से ही बोरिया पहचानतीं हैं.. अगर डोरी बदल जायेगी तो वो आटा लेने से मना कर देंगी. उन्हें लगेगा कि कहीं ऐसा तो नहीं की उनकी बोरी बदल गयी.

मैने कहा- यदि मेरी बोरिया में आप अपना नाड़ा कस देंगे तो क्या इस बोरी को वो अपना समझ लेंगी??

भाईसाहब- इसका तो पता नहीं लेकिन डोरी बदलने पर बहुत बवाल काटती हैं.

खैर! भाई साहब अपने बोरिया के 'इज़ारबंद' को लेकर इतने चौकन्ने थे की कोई दूसरा खींचता तो वो उसी से उसका गला कस देते लेकिन मुझे आश्चर्य और मजे की बात यह लगी कि उनकी पत्नी इज़ारबंद देखकर बोरिये को अपना मान लेतीं हैं. यह तो खतरनाक है मित्रों!!

रिवेश प्रताप सिंह

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