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सावन के रंग और गांव...

सावन के रंग और गांव...
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पहले सावन का महीना कौवों के उचरने का महीना होता था। आंगन की मुंडेर पर बैठे कौवे से महिलाएं पूछतीं, "कोई आ रहा है?" और यदि कौवे ने उड़ कर हामी भर दी तो उनका रोम रोम खिल उठता कि बेटी आ रही है। अब गाँव में न झूले पड़ते हैं, न नई पीढ़ी की कोई लड़की कजरी गाना जानती है, और न ही हरी चूड़ियां बेचने वाली मनिहारिन ही किसी के दरवाजे पर आती है, पर यकीन मानिए, गाँव आज भी बेटियों के आने पर जितना खुश होता है उतना कभी नहीं होता...

भारत प्रकृति के साथ जीता था। माघ-फागुन में जब खेतों में सरसो फुला कर पूरे सरेह को पीली चादर ओढ़ा देती तो महिलाएं पीली साड़ी पहनती थीं और सावन में जब पूरी प्रकृति हरी हो जाती तो हरी साड़ी... अब यह न पूछियेगा कि रंगों का यह विधान पुरुषों के लिए क्यों नहीं था! देहात के पुरुषों ने सजना-संवरना पिछले तीस-चालीस वर्षों से ही सीखा है, नहीं तो उसके पहिले बहुतों का जीवन बिना कुर्ते के ही पार लग जाता था। तब अभाव का दिन होता था साहब! फिर भी गाँव के गरीब खुद भले बिना कुर्ते के दिन काट लें, बेटियों के लिए हरी साड़ी जरूर खरीदते थे।

तब सावन ससुराल का नहीं, नइहर का महीना होता था। कहीं पढ़ा कि सावन में बहुएं बेटी हो जाती हैं। असल में सारी बहुएं अपने अपने नइहर जा कर बेटी बन जाती थीं। गांव में कोई बहू बचती ही नहीं थी। सावन चढ़ते ही नइहर गयी लड़कियां महीने के अंतिम दिन भाई को राखी बांध कर लौटतीं... यह भारत का प्राकृतिक रेन-वेकेशन था।

फिर गाँव के बेकार लोग काम वाले हो गए। अपने घर में काम करना "बेकारी" और दूसरों के घर मे बर्तन धोना "प्रोफेशन" कहलाने लगा। बेटियों का सावन में नइहर आना छूट गया।

धीरे धीरे गाँवों में लड़कों को भी विदा करने की परम्परा हो गयी। तब सावन में कौवों के उचरने पर बूढ़ी माताओं को लगता कि कुल देवता की सावनी पूजा चढ़ाने के लिए बेटे-बहु आ रहे हैं। माँ खिल उठती, घर महक उठता... फिर धीरे धीरे लड़कों ने सावनी पूजा में भी आना छोड़ दिया। अब तो नए लड़कों को यह पता तक नहीं होता कि उनके कुल देवता कौन हैं।

बेटे बेटियों ने आना छोड़ दिया तो धीरे धीरे महिलाओं ने कागों को उचारना छोड़ दिया और कागों ने आंगन की मुंडेर पर बैठना छोड़ दिया। पर गाँव इतनी आसानी से हार नहीं मानता, वह एक परम्परा के मरने पर दूसरी परम्परा गढ़ लेता है। सावन में हरा न सही, भगवा सही... कजरी न सही, बोल-बम सही...

कजरी न गायेगा कोई तो मोबाइल पर भोले बाबा का गीत बजेगा। पिछले बीस वर्षों में सावन में बाबा धाम जाने वालों की जो संख्या बढ़ी है, वह अद्भुत है। पहले गाँव मे कोई एक जाता था, अब हर घर से कोई न कोई जाता है...

तुलसी बाबा अयोध्या के रामजन्मभूमि को अपना घर बताते थे। कहते थे, राम पिता हैं तो उन्ही का घर न मेरा घर हुआ। अब भोले बाबा भी तो बाबा हैं, उनका घर भी तो अपना घर हुआ। तो इस हिसाब से सावन का महीना अब भी नइहर जाने का ही महीना है। दुनिया कितनी भी बदल जाय, गाँव किसी भी तरह अपना रंग जमा ही लेंगे।

इस साल वह भी बन्द है। कोई बात नहीं, असो गांव की किसी बूढ़ी काकी दादी से कजरी सुन लेते हैं।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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