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हरतालिका तृतीया एवं श्रीविद्या उपासना

हरतालिका तृतीया एवं श्रीविद्या उपासना
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(निरंजन मनमाडकर )

कल दिनांक ७/०९/२०२१ को भाद्रपद माह की शुक्ल तृतीया है इसे हरतालिका तीज! केवडा तीज के नाम से भी जाना जाता है!

कहते है की माँ पार्वतीजीने भगवान भोलेनाथ को पती रूप में प्राप्त करने हेतू जो अंतिम व्रत किया था तथा उन्हे जिस व्रत के फलस्वरूप अखंडसौभाग्य एवं मनोवाञ्छित वर की प्राप्ती हुई थी वह हरतालिका का व्रत कहा जाता है!

माँ गौरीने शनैः शनैः एक एक भोज्य वस्तुओंका त्याग कर केवल पत्तोंका उपवास किया तत्पश्चात जब उन्होने पत्तोंका भी त्याग कर केवल पवन का आहार किया तब वे अपर्णा के नाम से प्रसिद्ध हुई.

भगवान महादेव को केवडा याने केतकी पुष्प सर्वथा वर्जित है किंतु कहते है की इसी दिन माँ अपर्णाने अनेंको पत्तों के साथ केवडा भी भगवान को अर्पण किया था एवं भगवान ने उसे प्रेमपूर्वक स्वीकार किया था इसलिए इस तिथीको केवडा तीज भी कहते है!

स्कंदपुराण एवं शिवमहापुराण के अनुसार माँ शिवाने आशुतोष पिनाकपाणि की ही उपासना की थी! तो इस दिन पूजा गौरी समेत शंकर की होती है! सुहागन औरते अपने अंखड सौभाग्य हेतू तथा कुमारी कन्याएं अपना मनोवाञ्छित वर प्राप्ती हेतू इस व्रत का अनुसरण करती है!

शाक्तोपासना का दृष्टीकोण :-

शक्तिकी उपासना है तो शबल ब्रह्म की उपासना होती है, शक्तिविशिष्ट ब्रह्म की उपासना होती है!

चूँकी माँ भगवती स्वयं शबलब्रह्मस्वरूपिणी है प्रकृती एवं ब्रह्म दोनों है (देवी गीता प्रथम अध्याय) तो जब शिव एवं शिवा की एकत्रित उपासना होती है अप्रत्यक्षरूपसे ललिताम्बाकी ही उपासना होती है!

श्रीशिवाशिवशक्त्यैकरूपिणि ललिताम्बिका

तथापि केवल स्त्रियों एवं कन्यांओं ने इस व्रत का आचरण करना चाहिए?

तृतीया तिथी की अधिष्ठात्री देवता ही माँ भगवती है! इस तिथी को माँ भगवती के हेतू व्रत, उपासना की जा सकती है! इस विषय में अधिक प्रकाश हेतू त्रिपुरारहस्यम् माहात्म्य खंड के अध्याय २९, ३०, ३१ का अध्ययन करें तो समझ आएगा!

जब भगवान दत्तात्रेय जी गौरी अष्टोत्तरशतनाम कहते है, तब जिज्ञासू परशुरामजी माँ पार्वती के चरित्र विषय में पूछते है... तब इन्ही तीन अध्यायों में माँ गौरी की कथा आती है!

पर्वतराजपुत्रि जब उपवर हो जाती है तभी देवर्षि नारद के कथनानुसार पार्वतीजीका विवाह भगवान विष्णु से निश्चित करने का प्रस्ताव होता है! तब

मनोमन भगवान शिव को पती रूप में स्वीकार करके उन्हे अग्नि की साक्ष से पतीरूपमें प्राप्त करने की इच्छा रखने वाली शैलजा चिंतित हो जाती है तथा अपने घर का त्याग कर दूर गंगा के तट पर माँ भगवती पराम्बिका त्रिपुरा की आराधना में लीन हो जाती है!

वहा कामेश्वराङ्कनीलया ललितामहात्रिपुरसुंदरी की पार्थिव मूर्ती बनाकर अनेकों पत्रोंसे एवं पुष्पोंसे पूजा करती है, तांत्रिक एवं वैदिक विधान से उनकी सपर्या करती है!

यहापर विशेष मनन करना चाहिए,

माँ उमाने भगवतीकी स्तुती की है उसे ज्ञानकलिकास्तोत्रम् के नाम से जाना जाता है!

इस ज्ञानकलिकास्तोत्रम् के कारण ही माँ राजराजेश्वरी प्रसन्न हुई थी, किंतु इस संपूर्ण स्तोत्र में कही भी मनोवाञ्छित पती प्राप्त हो ऐसी वाच्यता नही उ!

माता का सर्वव्यापी अनंत रूप तथा उनके अनेकों रूपोंमेंसे चतुर्भुज पाशाङ्कुशधनुर्बाण धारी रूप सर्व श्रेष्ठ है, तथा आप ही चिती हो, चैतन्य हो, एवं चेतना का चक्षु हो इस आशयकी चर्चा की है!

अतः यह स्पष्ट है की ज्ञानकलिकास्तोत्रम् एवं हरतालिका के दिन माँ राजराजेश्वरी की सपर्या अपने मन का लय भगवती स्वरूप में होने हेतू करनी चाहिए, ऐसा श्रीविद्या उपासना का अप्रत्यक्ष संकेत है!

बिल्वपत्र, तुलसी, दूर्वा, शमी, कदम्ब, केवडा, करवीर, बदरी, जपापत्र, बन्धूक पत्र..... आदि भाँति भाँति के पत्तोंसमेत पुष्पोंसे श्रीयंत्र तथा माँ भगवती के श्रीविग्रह की पूजा करनी चाहिए! तथा यथा शक्ति ज्ञान कलिका स्तोत्रम् का अनेकों बार पाठ करना चाहिए! जिससे माँ भगवती ललिताम्बिका महात्रिपुरसुन्दरी प्रसन्न हो कर हमे दर्शन प्रदान करें!

इसी हरतालिका के दिन अध्यात्मिक उन्नती हेतू ज्ञानकलिकास्तोत्रम् का पाठ करना चाहिए!

श्रीमत् त्रिपुरारहस्यम् माहात्म्य खंडम्

श्रीज्ञानकलिकास्तोत्रम्

परापदाम्बुजप्रीतिरसमाद्यच्छुभाऽन्तरा ।

अद्भुतं ज्ञानकलिकास्तोत्रं समुपचक्रमे ॥

शिवे देवि संवित्सुधासागराऽऽत्मस्वरूपासि सर्वान्तराऽऽत्मैकरूपा ।

न किञ्चिद्विनात्वत्कलामस्ति लोके ततः सत्स्वरूपाऽसि सत्येऽप्यसत्ये ॥१॥

असत्यं पुनः सत्यमन्ये द्विरूपं द्वयातीतमेते जगुः सर्वमेतत्।

न ते तां विदुर्मायया मोहितास्ते चिदानन्दरूपा त्वमेवासि सर्वम् ॥२॥

क्षणानां क्रमैर्भिन्नरूपां धराद्यैर्मितामाहुरेके तमोमात्ररूपाम्।

तमोदीप्तिसंभिन्नरुपाञ्च शान्तस्वरूपां महेशीं विदुस्त्वां न तेऽज्ञाः ॥३॥

शिवादीक्षितप्रान्ततत्वावलिर्या विचित्रा यदीये शरीरे विभाति।

पटे चित्रकल्पा जले सेन्दुतारानभोवत्परा सा त्वमेवाऽसि सर्वा ॥४॥

अभिन्नं विभिन्नं बहिर्वाऽन्तरे वा विभाति प्रकाशस्तमोवाऽपि सर्वम्।

ऋते त्वां चितिं ये न नो भाति किञ्चित्ततस्त्वं समस्तं न किञ्चित्वदन्यत् ॥५॥

निरूध्याऽन्तरङ्गं विलाप्याऽक्षसङ्घं परित्यज्य सर्वत्र कामादिभावम् ।

स्थितानां महायोगिनां चित्तभूमौ चिदानन्दरूपा त्वमेका विभासि ॥६॥

तथाऽन्ये मनः सेन्द्रियं सञ्चरप्याऽप्यसंयम्य तन्मार्गके जागरूकाः ।

स्वसंवित्सुधाऽऽदर्शदेहेस्फुरन्तं महायोगिनाथाः प्रपश्यन्ति सर्वम् ॥७॥

निरूक्ते महासारमार्गेऽतिसूक्ष्मे गतिं ये न विन्दति मूढस्वभावाः ।

जनान् तान् समुद्धर्तुमक्षाऽवगम्यं बहिःस्थूलरूपं विभिन्नं बिभर्षि ॥८॥

तदाराधनेऽनेकमार्गान् विचित्रान् विधायाऽथ मार्गेण केनापि यान्तम् ।

नदीवारिसिन्धुर्यथा स्वीकरोति प्रदाय स्वभावं नु स्वात्मिकरोषि ॥९॥

तथा तासु मूर्तेष्वनेकासु मुख्या धनुर्बाणपाशाऽङ्कुशाऽऽढ्यैव मूर्तिः।

शरीरेषु मूर्धेव ये तां भजेयुर्जनास्त्रैपुरीं मूर्तिमत्त्युत्तमास्ते ॥१०॥

जनान् दुःखसिन्धोः समुद्धर्तुकामा पथस्ताननेकान् प्रदिश्यप्रकृष्टान्।

दयार्द्रस्वभावेतिविख्यातकीर्तिस्त्वमेकैव पूज्या पराशक्तिरूपा ॥११॥

सदा ते पदाब्जे मनःषट्पदो मे पिबन् तद्रसं निर्वृतः संस्थितोऽस्तु ।

इति प्रार्थनां मे निशम्याऽऽशु मातर्विधेहि स्वदृष्टिं दयार्द्रामपीषत् ॥१२॥

इति संस्तुत्य सा गौरीं त्रिपुरां परमेश्वरीम्।

स्तोत्रेण ज्ञानकलिकाऽऽख्येन ध्यानं समाधिना ॥१३॥

ॐनमश्चण्डिकायै

ॐ श्रीकृष्णावेणीअक्षय्यकृपाप्रसादमस्तु

©️निरंजन मनमाडकर श्रीक्षेत्र पंढरपूर

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