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नेता ब्राह्मण को प्रबुद्ध वर्ग बता कर उनका मज़ाक़ उड़ा रहे हैं या उनकी अबौद्धिकता पर खुश हो रहे हैं : शम्भु नाथ शुक्ल

नेता ब्राह्मण को प्रबुद्ध वर्ग बता कर उनका मज़ाक़ उड़ा रहे हैं या उनकी अबौद्धिकता पर खुश हो रहे हैं : शम्भु नाथ शुक्ल
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रिबन बांधने लायक़ शिखा बढ़ा लेना, सूत का धागा कान पर लपेट लेना, माथे पर त्रिपुंड-तिलक लगाना अथवा विकास दुबे या परशुराम को याद करना ही क्या ब्राह्मण की नियति है? आज उत्तर प्रदेश में 90 प्रतिशत ब्राह्मण ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। उसके बच्चे पढ़ नहीं पाते क्योंकि घर में कोई गाइड करने वाला नहीं है। पिता न दिहाड़ी की मज़दूरी कर पाता है न घर की औरतें दूसरे मध्यम वर्गीय घरों में जा कर झाड़ू-पोंछा का काम कर पाती हैं क्योंकि फ़िज़ूल की मर्यादा आड़े आती है। कोई कौशल उनके पास है नहीं। न वे पकौड़े तल सकते हैं न जलेबी को गोल-गोल घुमा सकते हैं। व्यापार की सूझ-बूझ भी नहीं है। सेठ लोगों के यहाँ भी अब न तो मुनीमी का काम उनके लिए बचा है न वकीलों के यहाँ मुंशी का काम। महराज और मिसराइन का काम अब जोमैटो आदि ने छीन लिया है। ऐसे में सिवाय आत्म हत्या के उनके पास क्या है। या तो भीख माँगो अथवा गर्हित या अमर्यादित काम करो।

समझ नहीं आता उनके तथाकथित नेता उन्हें प्रबुद्ध वर्ग बता कर उनका मज़ाक़ उड़ा रहे हैं या उनकी अबौद्धिकता पर खुश हो रहे हैं। श्रीमान एससी मिश्र या अभिषेक मिश्र ने क्या किया है, सिवाय उनके वोटों से अपने परिवार और रिश्तेदारों को आगे बढ़ाने के। ब्राह्मणों याद रखो- 'ब्राह्मण, कुत्ता, हाथी ये न जाति के साथी!' तुम इन किसी दल के इन टुकड़ची ब्राह्मण नेताओं के फ़रेब में न आओ बल्कि अपने लिए सामान्य नौकरियों में आरक्षण माँगो अथवा ओवैसी की तरह ख़ुद का नेतृत्त्व विकसित करो। क्योंकि ब्राह्मण भी इस देश में जातिवाद और कथित पुरोहितवाद एवं श्रेष्ठतावाद के शिकार हैं। वह ब्राह्मण है, इसलिए ऐसा नहीं कि उसके साधारण मानवीय अधिकार छीन लिए जाएँ। अतः ओ फटीचर ब्राह्मणों! जाति के इस मिथ्याभिमान से उबरो। देश की सभी जातियाँ अपनी जाति के ग़रीबों के लिए छतरी बन जाती हैं लेकिन ब्राह्मण सदैव ब्राह्मणों की ही पतरी में छेद करेगा।


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