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ग्रंथपरिचय : त्रिपुरारहस्य

ग्रंथपरिचय  : त्रिपुरारहस्य
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(निरंजन मनमाडकर)

त्रिपुरारहस्य हमारी शाक्त परम्पराका संहिता ग्रंथ है ,

यह भगवती त्रिपुरा स्वरूप ज्ञान तथा माहात्म्य वर्णन करता है.

यह भगवान दत्तात्रेय तथा भार्गव परशुरामजी का संवाद है,

भगवान दत्त स्वयं रहस्यमय सिद्धांतो का प्रतिपादन परशुरामजी को करते है.

आदिनाथाच्छक्तिमुखात्सदाशिवतुरीयकात्।

रूद्रविष्णोर्मयालब्धं नान्यो जानाति कश्चन।

मर्त्यलोके महाविष्णोरंशो दत्तगुरूः स्मृतः ॥

यह परमरहस्यमय ज्ञान भगवान आदिनाथसे भगवतीशक्ति ने उनसे तुरीयक सदाशिव ने उनसे रूद्र और रूद्र से विष्णुजीने भगवान विष्णूसे ब्रह्मा

पृथ्वीलोकपर केवल दत्तात्रेय जी को ही यह ज्ञान प्राप्त है.

आद्योमहात्म्यखण्डःस्यात् ज्ञानखण्डस्तथापरः।

चर्याखण्डस्तृतीयः स्यादेवमेतद्भविष्यति ॥

यह त्रिपुरारहस्य माहात्म्य खंड ज्ञान खंड तथा चर्याखंड तीन खंडोमे विभाजित है.

भगवान दत्तात्रेय जी से परशुरामजी हरितायनजी सुमेधा आदि उपासकोंको यह प्राप्त हुआ.

नानाख्यानकथाचित्रं त्रिपुरायारहस्यकम्।

पठतांपापशयनं श्रृण्वतां क्लेशनाशनम् ॥

यह त्रिपुरारहस्य पाठक का पापशमन करता है एवं श्रोता का क्लेशनाश करता है.

विचारितं स्वात्मलाभजननं मोक्षसाधनम्।

पूजितंत्रिपुराभक्तिकरं कथाविभवकिर्तनम् ॥

विद्याप्रदंसुलिखितं सेवितं वाञ्छितार्थदम्।

साम्प्रत काल में वेदान्तियों के अध्ययन हेतू ज्ञान खंड की कई सारी प्रतियां प्रकाशित है वे आङ्ग्लभाषा तथा राष्ट्रभाषा सहित प्रादेशिक भाषिओंमें उपलब्ध है!

माहात्म्य खण्ड में माँ भगवती त्रिपुरा का चरीत्र तथि परशुरामजीको उपदेश दिया है वह प्रसंग एवं बहोत सारे स्तोत्र तथा उपासना पद्धती का विवरण उपलब्ध होता है! इस खंड का प्रकाशन राष्ट्रभाषा में हुआ है तथा अंग्रेजी में भी उपलब्ध है! कैलास आश्रम महासंस्थान की पुस्तक मन्तव्य है!

चर्या खंड जिसके कुछ अध्याय ही उपलब्ध है जिसमे साधक की चर्या एवं पूजा विधान आदि बडे विस्तारपूर्वक दिया है! वाराणसी विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिका में इन अध्यायोंका मूल पाठ प्रकाशित हुआ है तथा महाजाल पर यह उपलब्ध है!

श्रीविद्या उपासना का एक सर्वमान्य संहिता ग्रंथ है त्रिपुरारहस्यम्! साधकको चाहिए की श्रीगुरुदेव के सान्निध्य में इसका श्रवण करें! तभी योग्य दृष्टिसे ज्ञान प्राप्त हो गा!

भगवान दत्तात्रेय की वाणी है अतः यह प्रमाणभूत ग्रंथ है!

माहात्म्य खंड के ८० अध्याय

तथा ज्ञान खंड के २२ अध्याय है

चर्या खंड के अध्याय ३, ४, ५, ६, ७, ८, और १३, १४,१५ ऐसे कुछ उपलब्ध है!

प्रतिशोध की अग्नी में जल रहे हुए भार्गव परशुराम जी के मन की प्रक्षुब्धता शांत नही हो रही थी तभी एक अवधूत के दर्शन हो गए!

उनकी अवस्था बडी विचित्र थी किंतु भृगुकुलभूषण जामदाग्न्य राम का मन शांत होगया!

यस्य सान्निध्य मात्रेण चिदानन्दायते मनः। ऐसी अवस्था हुई किंतु जैसे ही वे अवधूत दूर चले गए परशुराम जी पुनः अपनी पूर्वअवस्था को प्राप्त हुए!

तभी उन्ही अवधूत की खोज में वे गन्धमादन पर्वतपर गए जहा अवधूत शिरोमणी भगवान दत्तात्रेय निवास करते थे, परशुरामजी ने भगवान दत्त प्रभूसे जो ज्ञान प्राप्त किया उसेही त्रिपुरारहस्य के नाम से जाना जाता है! वही ज्ञान जब परशुराम जी ने हरितायन को दिया तब उसीका संस्कृत भाषा में लिपिबद्ध ग्रंथ ही त्रिपुरारहस्यम् है!

भगवान दत्त का उपदेश चर्या खंड एवं दत्त संहिता में आता है जो श्रीविद्या का प्रमाण भूत ग्रंथ है तथा साम्प्रतकाल में दोनों भी ग्रंथ अनुपलब्ध होने के कारण केवल परशुराम कल्पसूत्र का अनुसरण किया जाता है!

भगवान दक्षिणामूर्ती से दत्तात्रेय

तथा दत्तात्रेय से परशुराम जी ऐसी दक्षिणामूर्ती सम्प्रदाय की परम्परा मानी जाती है!

तथापि सभी सम्प्रदायोंमे त्रिपुरारहस्यम् मान्य है!

लेखन व प्रस्तुती

निरंजन मनमाडकर श्रीक्षेत्र पंढरपूर

ॐ नमश्चण्डिकायै

अवधूत चिंतन श्रीगुरूदेव दत्त

रेणुका नंदन स्मरण भार्गव राम

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