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खुमाड़ सल्ट क्रांति 5 सितंबर 1942:: एक बिखरी याद

खुमाड़ सल्ट क्रांति 5 सितंबर 1942:: एक बिखरी याद
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हर वर्ष 5 सितंबर आता है और चला जाता है ,किंतु अल्मोड़ा जिले के सल्टवासियों को वह दिलाता है एक ऐसी याद जो युगों-युगों तक भूली नहीं जा सकती । पांच सितंबर 1942 ही तो सल्ट के इतिहास में एक ऐसा दिन था जब भारत मां की गुलामी से ऊब कर सल्ट क्षेत्र (ग्राम खुमाड़) में स्वतंत्रता की बलिवेदी पर मानव मुंड लोट रहे थे और रक्त से नहा रही थी क्षुब्ध धरती। आह! क्या भयानक दृश्य था उस समय। जलवायु से आंलिगत होकर छूट रही थी अंग्रेजों की बंदूक से सनसनाती हुई गोलियां और हो रहा था अमंगल चीत्कार, महाविभात्सपूर्ण । माताएं बिलख रही थी और अबलाओं के पुछ रहे थे सिंदूर।

ब्याहताओ को दिख रहे थे गिरते हुए हाथ। कांप उठा पूरा आकाश, तपने लगी धरती। तपन से कंचित होकर रिमझिमा उठे देवताओं के आंसू।

पूरे हिंदुस्तान में अंग्रेजों का शासन स्थापित हो चुका था पर सल्ट का यह क्षेत्र ही था जहां के निवासियों ने अल्मोड़ा जिले के इस क्षेत्र को अंग्रेजों के शासन से मुक्त घोषित कर रखा था । यही कारण था कि यहां अंग्रेजी शासन के कोई नियम-कानून लागू नहीं होते थे। अंग्रेज शासकों की आंखों में सल्ट क्षेत्र किरकिरी के समान महसूस होता रहता था, इसलिए किसी भी तरह अंग्रेज हुकूमत इस क्षेत्र को अपने अधिकार में करना चाहती थी। प्रयासों में सफलता न मिलने के बावजूद अंग्रेज अफसर सल्टवासियों पर किसी ना किसी तरह जुल्म करते रहते थे।

सारे देश में स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी बहुत पहले से भड़क उठी थी वही सन 1914 से सल्टवासियों के अंदर इस चिंगारी ने जन्म दिया। सल्ट वासी किसी भी तरह अपने को अंग्रेजों के गुलाम मानने को तैयार नहीं थे। किसी राख में धंसी स्वतंत्रता कि यह चिंगारी सन 1930 के बाद भयानक लपटों में बदल गई। आखिरकार 1942 में क्षेत्र में एक प्रलयरूपी महा विस्फोट हो ही गया। देखते ही देखते सैकड़ों वीर सल्टवासी जेलों को आबाद करने लगे । घर-घर में पुलिस के छापे पड़ने लगे, क्योंकि सल्टवासियो की एकजुटता ,वीरता व अदम्यशक्ति से परेशान होकर 5 सितंबर 1942 को एसडीएम जॉनसन सशस्त्र पुलिस बल के साथ रानीखेत से सर्पिले उतार-चढ़ाव रास्तों से होते हुए अपने दल के साथ ग्राम खुमाड में आ धमका ।

रणसिंह और तूरी की थु थू की ध्वनि क्षेत्र के हर रास्तों और पहाड़ों से टकराकर गुंजित हो उठी। अंग्रेजी जुर्म के खिलाफ विद्रोह का डंका बज उठा। सामंतशाही के खिलाफ खुमाड़ में बड़ी आन-बान और शान के साथ तिरंगा लहरा उठा। शायद वह क्षण आ गया था जब सल्ट की माओं को अपने दूध को परखने व पिताओं को अपने खून में छिपी देशभक्ति की भावना को आंकने का मौका मिल रहा था।

सल्ट क्षेत्र व ग्राम खुमाड की माताओं द्वारा ममतापूर्ण आंसुओं के साथ सल्ट के वीर पुत्रों के माथे पर तिलक की लाल लकीरे झलकने लगी देखते ही देखते खुमाड़ भूमि क्षेत्र के दस हजार से अधिक वीरों से मानवांच्छिद हो गई। मानव के हाथों के तिरंगे झंडे वायु में लहरा उठे और सिर पर कफन लपेटे हुए उन स्वतंत्रता के वीरों के मुख से मुखरित हो उठे इंकलाब के नारे। रास्ते में ही स्वतंत्रता के अमर सेनानी लालमणि उपाध्याय और गोविंद ध्यानी ने जो सबक पुलिस और जानसन को दिया वह चिरस्मरणीय रहेगा। संभव था जानसन ननुवा की लाठी अथवा बहादुर सिंह के घुसे से कालग्रस्त हो जाता किंतु नियति, देव उसके पक्ष में थे। वह बच गया जिसकी उसको कल्पना नहीं थी।

जानसन घबरा उठा, वह लौटने को ही था कि उसे फिर कुछ द्रोहियों द्वारा उकसाया गया जिन्होंने देश और इज्जत के साथ गद्दारी की। बस क्या था इधर जानसन का आदेश और उधर गोरों के बंदूक से गोलियां दनदना कर छूट पड़ी। अग्नि के गोले बरस पड़े।

यही समय था जब जानसन को भी सल्ट क्षेत्र के प्रति अपने मन में छिपे क्रोध को उगलने का मौका मिल गया। उसने अपने होलनर में से पिस्तौल निकालकर भारत माता की जय हो, जिंदाबाद का नारा लगाने वाले चार सल्ट के वीर पुरुषों - खीमानन्द,

को पलक झपकते ही जमीन पर न टूटने वाली नींद सुला दिया। चारों ओर भगदड़ मच गई। कुछ ही देर में सारी धरती रक्तरंजित हो उठी। काफी देर तक वारा न्यारा होता रहा किंतु बद नियति। उन भीषण गोलियों के आगे कब तक निशस्त्र मानव टिक सकता था। ग्राम खुमाड़ का वह मैदान लाशों व घायलों से पट गया। घायलों को एकत्रित कर गिनती होने लगी और लोगों को शारीरिक दंड दिए जाने लगा। लगान चौगुना कर दिया गया।

एसडीएम जॉनसन का क्रोध इस पर भी शांत नहीं हुआ जाते-जाते गांव को फूकंने की आज्ञा दें गया पर किसी प्रकार सल्टवासियों का हमेशा भला चाहने वाले व संकट -दुख- परेशानी में में लोगों के काम आने वाले क्षेत्र व खुमाड़ ग्राम में एकमात्र प्रतिष्ठित सुसज्जन व्यक्तित्व पं० गंगाराम उपाध्याय, लाला जी ने गांव जलने से बचा लिया। जानसन के आदेश से ग्राम वासियों के चेहरे पर घबराहट के भावों को पढ़ कर उन्होंने गांव को जलने से बचाने के लिए आग लगाने वाले उन गोरे पुलिस वालों को अपनी दुकान की तिजोरी से पांच सौ से भी अधिक चांदी के सिक्के की थैली लाकर व अनाज के बोरे अपने यहां से दिए। गांव को राख में बदलने की मंशा से आए गोरों का पूरा दल लौट पड़ा। अंगरेज सैनिकों के लौटने के बाद गांव में मातम छा गया। यह मातम जानसन के मुंह से निकले उस शब्द का था जो जाते-जाते वह अपने गोरे सैनिकों से कह गया था। उस समय खुमाड़ में उपस्थित सभी लोगों के मन में एक ही बात हो रही थी ,अगर कहीं पंडित गंगाराम उपाध्याय जैसे देवता तुल्य व्यक्ति इस समय गांव में ना होते तो खुमाड़ के सारे मकान इस समय राख में बदल रहे होते।

अंग्रेजों ने पंडित गंगाराम उपाध्याय जी को गांव के प्रति उनके इस एहसान का बदला भी जल्द दे दिया। कुछ दिनों बाद उन्हीं की आंखों के सामने ही उनके पुत्र केशव दत्त उपाध्याय को पुलिस गिरफ्तार करके ले गई।

जानसन के आदेश के बाद अंग्रेज सैनिकोंं की लाठी-गोली के प्रहार से घायल गंगाराम, खीमदेव दो सहोदर भाई, मातृहीन , वृद्ध पिता और नन्हे बच्चों को छोड़कर स्वतंत्रता का मंत्र जपते हुए स्वर्ग धाम पहुंच गये। चूड़ामणि और बहादुर सिंह भी इंकलाब का नारा लगाते लगाते इह लीला समाप्त कर गए।





अठ्ठत्तर साल बाद खुमाड़ गांवों का यह ऐतिहासिक स्थल लावारिस सा हो गया है। प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को कई कदमों की आहट इस स्थल पर सुनाई देती है बस मात्र एक दिन वह भी इस दिन को कुछ लोगों द्वारा याद किए जाने के कारण अन्यथा सरकार कोई भी रही है उन्होंने कभी इस शहीद स्मारक को ऐतिहासिक बनाने में कोई प्रयास नहीं किया है यह बात अलग है की बचपन से देखते चले आ रहे उन खंडहरों की जगह पर दो मंजिल भवन जरूर बना दिया है पर वहां जाकर नई पीढ़ी के लोगों को पता नहीं चल पाता है कि कभी यह स्थल हमारे पूर्वजों के आत्मसम्मान का स्थल रहा है। जब भी मैं शहीद स्मारक स्थल पर जाता हूं तो तो स्तब्ध रह जाता हूं, वो स्थल जहां सल्ट के वीर सपूतों ने अपने अदम्य साहस से अंग्रेज सैनिकों से सामना कर अपनी इह लीला समाप्त की आज असामाजिक तत्वों का स्थल बना गया है । गंदगी का साम्राज्य। पता नहीं किस सरकार की बौद्धिक दृष्टि खुमाड़ शहीद स्थल पर पड़ेगी। खैर, इससे अच्छा तो बचपन से देखता आ रहा स्मारक भवन था। जहां दो बड़े-बड़े जर्जर हाल के समक्ष जा कर अपने दादा प० नारायण दत्त उपाध्याय वह अपने पिता वैश्विक साहित्यकार गोपाल उपाध्याय तथा गांव के बड़े बुजुर्गो के मुख से सुने तत्कालिक घटनाक्रम को मन से एहशासित कर मस्तक वीर शहीदों के लिए अनायस ही श्रद्धा से झुक जाता है।

हरीश गोपाल उपाध्याय ,'सल्टिया'

07860901077

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