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अद्भुत मन्दिर जहां विष्णु जी के मस्तक पर शिवलिंग ( निरंजन मनमाडकर )

अद्भुत मन्दिर जहां विष्णु जी के मस्तक पर शिवलिंग   ( निरंजन मनमाडकर )
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अंबरीष वरद भगवंत! शैवोत्तम भगवंत!

श्रीहरी विष्णु का एक मन्दिर जहां उनके मस्तकपर शिवलिङ्ग है!

आईएं जानते है इस स्थान के विषय में...!

महाराष्ट्र राज्य के सोलापूर जिले में बार्शी नामका एक तालुका आता है उसी शहर में भगंवत का यह प्राचीन मंदिर है!

पंढरपूर से 90 किलोमीटर तथा सोलापूर से 70 किलोमीटर दूर है! मराठी भाषा में द्वादश को बारस कहते अतः एकादशी के समान द्वादशी को बारशी कहा जाता है, इसी द्वादशी के व्रत के कारण भगवान यहापर आए हुए..!

इस कथा के मतमतांतर है मराठी संतोकीअंबरीष वरद भगवंत!

महाराष्ट्र राज्य के सोलापूर जिले में बार्शी नामका एक तालुका आता है उसी शहर में भगंवत का यह प्राचीन मंदिर है!

मराठी भाषा में द्वादश को बारस कहते अतः एकादशी के समान द्वादशी को बारशी कहा जाता है, इसी द्वादशी के व्रत के कारण भगवान यहापर आए हुए..! इस कथा के मतमतांतर है मराठी संतोके अनुसार अंबरीष ऋषी थे तथा श्रीमद्भागवत के अनुसार वे राजा थे किंतु उनके द्वादशी युक्त एकादशी व्रत की कथा समान आती है! राजा अंबरीष भगवान श्रीहरी विष्णु के परम भक्त थे, तथा उनका त्रिदिवसीय एकादशी का व्रत होता था, मतलब तीन रात्री वे उपवास करते थे, एकादशी पूर्ण दिवस उपोषण, दशमी मध्याह्न काल मे भोजन तथा द्वादशी सूर्योदय समय पारण ऐसा विधान चल रहा था! एकसमय की बात है महाराज ने द्वादशी के दिन ब्राह्मणोंको भोजन तथा दान किया एवं अपना पारण करने ही वाले थे तभी मुनी दुर्वासा का आगमन हुआ, महाराज अंबरीष ने उनका यथोचित स्वागत सम्मान किया एवं भोजन ग्रहण करने की विनती की!

मुनीश्वरने कहा मै स्नान संध्या कर के आता हूँ तबतक आप प्रतीक्षा किजिए!

यह कह कर मुनी चले गए,!

काफि समय हुआ वे नही आए तबतक द्वादशी समाप्त होने वाली थी, व्रतभंग ना हो इसलिए राजा ने जलग्रहण कर के पारण किया!

तत्पश्चात मुनीश्री पधारे, उन्होने जान लिया की अंबरीष ने पारण कर लिया है तो उन्होने क्रोधवश शाप दिया तुम बार बार अनेक योनियों में जन्म लोगे.

भक्त ने भगवान की पुकार की तब भक्तवत्सल भगवान नारायण प्रकट हुए और वह शाप अपने उपर ले लिया... कहते है भगवान के अवतार इसी कारण हुए है... अंबरीष को द्वादशी के व्रत हेतू भगवान आए इसलिए इस क्षेत्र को बार्शी कहते है!

भगवान की मूर्ती चतुर्भुज है शंख चक्र गदा एवं अंबरीष को अभय देते हुए ऐसी है अतः इन्हे अंबरीष वरद भगवंत कहते है!

भगवान के शिरोभाग में शिवलिङ्ग है!

मंदिर की रचना 1260 मे हुई है, हेमाडपंथी प्राचीनता है तथा श्रीमंत पेशवा के काल मे जीर्णोद्धार किया गया था..

आज भी यह हरीहर क्षेत्र है भगवान अपने भक्त का रक्षण करते है तथा अपने आराध्य को सिरपर धारण करते है....

बार्शी ग्राम के ग्रामदैवत स्वयं भगवंत है, यह ग्राम पूर्वकालसे ही शैव बाहुल्य ग्राम है, जंगमवाडी मठों की अनेकों शाखाएं है! श्रावण मास के कारण यहापर भगवान को शैव अलंकार किए जाते है तथा हरी शैवोत्तमः इसका साक्षात्कार होता है भगवान भूतभावन महादेव के सर्वश्रेष्ठ भक्त के स्वरूप में भगंवत यहा विराजते है!

ॐ नमो हरीहरा

हरी शैवोत्तमः हरी शैवोत्तमः हरी शैवोत्तमः

लेखन व प्रस्तुती

निरंजन मनमाडकर श्रीक्षेत्र पंढरपूर

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