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त्रिपुरारहस्य माहात्म्य खंड ( निरंजन मनमाडकर)

त्रिपुरारहस्य माहात्म्य  खंड   ( निरंजन मनमाडकर)
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ॐनमश्चण्डिकायै

ॐ श्री मात्रे नमः ॐ श्री गुरूभ्यो नमः

🚩 परशुरामजी गुरूदत्तात्रेयजी से आश्चर्यजनक कुमारी कथा सुनकर विस्मय-विमुग्ध होगये । पुनः विनम्र भाव से मधुर वचनों से गुरूदेव से कहा !

भगवन् ! आपने तो बडी आश्चर्यजनक कहानी सुनाई है । माँ भगवती ब्रह्मा विष्णू तथा महेश द्वारा पूजित है । त्रिमूर्ति की भी जननी है । माँ की महिमा का कोई पारावार नहीं है । सच कहूं तो आप की कृपा से मे अनुग्रहीत हुआ । प्रभो ! मै आप के श्रीमुख से श्रीकथा का अमृतपान करना चाहता हूं । हे गुरो कृपा करें ।

इस तरह परशुरामजी की भक्तिमय प्रार्थना स्वीकार कर भगवान दत्तात्रय ने कहा ।

श्रृणु रामाऽभिधास्यामि त्रिपुरायाः कथाः शुभाः ।।

( यहाँ पर भगवान् दत्तात्रेय सृष्टि की रचना तथा कारण व भगवती का व्यापक रूपका वर्णन करते हैं । कहा जा सकता है कि यह त्रिपुरारहस्य का सर्ग विभाग है । शाक्तसिद्धांत या श्रीविद्या के तात्विक सिद्धांतों का आधारभूत विवेचन यहां श्रीगुरू कर रहे है.

यहाँ पर कथा भाग से ज्ञान की चर्चा की गई है । कथा अगले पोस्ट में आने वाली हैं । विश्लेषण अधिक प्रमाणभूत रहे इसलिए देवीभागवत तथा अन्य उपनिषदों का भी संदर्भ लिया है ।

मुख्य विषय है श्रीललिता महात्रिपुरसुंदरी पूर्णब्रह्म स्वरूपा और चिती consciousness सृष्टी की उत्पत्ति )

दत्त भगवान् ने कहा !

सा च श्रीत्रिपुराप्रोक्ता परमाकाशरूपिणी ।

अस्यां सर्वमिदं विश्वं प्रविभक्तं प्रकाशते ।।

राम ! वे श्रीत्रिपुरा परमाकाशरूपिणी है । वे सूक्ष्म तथा वायविक रूपसे व्याप्त है । यह चराचर विश्व उनके प्रकाश से प्रकाशित है ।

सा चिदानन्दाऽद्वयाऽऽत्मरूपिणि परमेश्वरी।

माँ भगवती चिदानंदा है अद्वया है वे स्वयं आत्मरूपिणि है ( परब्रह्मस्वरूपिणि ) है । परमेश्वरी है ।

वागिन्द्रियमनोऽतीता साक्षिणी सकलाश्रया ।

वे वाणी (शब्द words ) मन (mind ) से अतीत है ( अवाङ्मनसगोचरम् beyond mind and word or intellect! )

वे सभी की साक्षिणी { सब की चेतना तथा द्रष्टा अन्तर्यामिनी supreme consciousness }

सकलाश्रया याने सभी का आधार substratum of everything हैं

सा भक्तकृपया देवि नानाविधतनुक्रिया ।

तद्भेदगणने शेषः सहस्राऽऽस्योऽपि न प्रभुः ।।

तस्मात्प्रधानरूपाणि कानिचित्कथयामि ते ।

माँ भगवती भक्तों की कृपा हेतू नानाविध अवतार धारण करती है । उनके इस भेद की गणना करना हजारों मुखसे शेष को भी संभव नहीं है ।

फिर भी उनके प्रधान स्वरूपों का वर्णन में करता हूँ ।

आद्या कुमारी तत्रोक्ता त्रिरूपाऽन्तरा मता ।

सबसे पहले कुमारी है । यह कुमारी जो अध्याय 7 ; 8 ; 9 में वर्णित है । जो अष्टादशभुजा है । अब हम देख सकते हैं कि दुर्गा सप्तशती रहस्य त्रय में कहा गया है

सर्वस्याद्यामहालक्ष्मी त्रिगुणापरमेश्वरी ।

लक्ष्मीतंत्र ; देवीभागवत ; दुर्गासप्तशती भगवती महालक्ष्मी महिषमर्दिनी को आद्याशक्ति बताते हैं । वहाँ तीनों ग्रंथों में माँ भगवती अष्टादशभुजा ही बतायी गयी है ।

त्रिगुणा सा महालक्ष्मी साक्षान्महिषमर्दिनी ।

वे त्रिगुणा हैं ! अतः अष्टादशभुजा कुमारी आद्या है ।

फिर यही कुमारी त्रिरूपा हुई गौरी रमा भारती । फिर प्राधानिक रहस्य का संदर्भ आता है ।

उसके बाद कालि ; चंडिका ; दुर्गा ; भगवती ; कात्यायनी देवियां है

और अंत में

ललिता सा महाराज्ञी तत्र पूर्णतमा मता ।।

यहां दत्तभगवान् विशेष रूप से बताते हैं कि श्रीललिता महाराज्ञी

पूर्णतमा ( superlative degree; it means no one is superior than Her Sri Lalita )

सत्यमेकं ललिताऽऽख्यं वस्तु बृह्वचोपनिषद्

अतएषा ब्रह्मसंवित्तिर्भावाभावकलाविनिर्मुक्ता चिद्विद्याऽद्वितीयाब्रह्मसंवित्तिः चिदानन्दलहरी महात्रिपुरसुंदरी. . . . .

परमाविद्या त्रिपुरापरमेश्वरी ।

( त्रिपुरोपनिषद् )

अतः श्रीविद्या उपासना पराम्बा महाराज्ञी श्रीराजराजेश्वरी ललितामहात्रिपुरसुंदरी की उपासना है अर्थात वह पूर्णब्रह्म की चिती consciousness परब्रम्ह यानी supreme soul आत्मस्वरूप की उपासना है ।

देवीगीता में भगवती कहती हैं

अहमेवासपूर्वं तु नान्यकिञ्चिन्नगाधिप ।

तदात्मरूपंचित्संवित्परब्रह्मैक नामकम्।

देवी अथर्वशीर्ष में भी

अहं ब्रह्मस्वरूपिणि । मत्तः प्रकृतिपुरूषात्मकम् जगत् शून्यंचाशून्यं च ।

वे भगवती ललिता कारणों की भी कारण है ।

प्रमाणों की प्रमात्री है । सभी की आधार है ।

हे राम तुम सावधानी से उनकी कथा सुनो ।

लेखन व प्रस्तुती

©️निरंजन मनमाडकर पुणे महाराष्ट्र

अवधूत चिंतन श्रीगुरूदेवदत्त 🚩

रेणुका नंदन स्मरण भार्गवराम 🚩

श्रीललिता महात्रिपुरसुंदरी माता की जय 🚩

श्रीगुरू महाराज की जय 🚩

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एतासां क्रमतोलीलाः श्रृणु वक्ष्यामि भार्गव ।।

इच्छाशक्ति ज्ञानशक्ति क्रियाशक्तीस्वरूपिणि ।।

विश्वश्वरी त्वं परिपासि विश्वं

विश्वात्मिका धारयसीति विश्वं ।।

विश्वेशवंद्या भवति भवन्ति

विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ।।

एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका ।

एकैव विश्वरूपिणि तस्मादुच्यतेऽनेका ।

अज्ञेया अनंता अलक्ष्या अजा एका अनेका

लेखन व प्रस्तुती निरंजन मनमाडकर पुणे महाराष्ट्र

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