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भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां की पुण्यतिथि: भारत रत्न से सम्मानित शहनाई के पर्याय थे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान

भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां की पुण्यतिथि:  भारत रत्न से सम्मानित शहनाई के पर्याय थे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान
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शहनाई की बात हो और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम जुबान पर न आए असंभव सी बात है, एक तरह से शहनाई का पर्याय कहा जाता है उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को। दूरदर्शन और आकाशवाणी की सिग्नेचर ट्यून जो बरसों से हम सभी को विस्मित करती रही है, बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की ही आवाज है। यह बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का जादू ही है कि वह जब भी जहां भी सुनाई देती है सुनने वालों का मन दुनिया से हटकर बस और बस उनकी बजाई मधुर स्वर लहरियों में खोने को करता हैा

सोएंगे तेरी गोद में एक दिन मरके,

हम दम भी जो तोड़ेंगे तेरा दम भर के,

हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर,

गंगा तेरे पानी से वजू कर-कर के...।

भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां पर नजीर की यह शायरी बेहद मुफीद है। बिस्मिल्लाह खां गंगा को अपनी मां मानते थे और कहते थे कि गंगा में स्नान करना हमारे लिए उतना ही जरूरी है, जितना जरूरी शहनाई बजाना। चाहे कितनी भी सर्दी हो गंगा में नहाए बिना तो सुकून नहीं मिलता।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम कमरुद्दीन था। कहा जाता है कि जब कमरूद्दीन पैदा हुए उन्हें देखकर उनके दादा के मुंह से निकला था 'बिस्मिल्लाह' और उसके बाद कमरूद्दीन को इसी नाम से पुकारा जाने लगा, आगे चलकर वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए।

संगीत बिस्मिल्लाह खान को विरासत में मिला था, उनके पिता पैगम्बर खान बिहार की डुमरांव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई वादक थे। पिता की इच्छा बिस्मिल्लाह खान को भी शहनाई वादक बनाने की थी। 6 साल की उम्र में बिस्मिल्लाह खान को उनके पिता अपने साथ बनारस (वाराणसी) लेकर गए, जहां गंगा तट पर उनकी संगीत शिक्षा शुरू हुई। काशी विश्वनाथ मंदिर के अधिकृत शहनाई वादक अली बख्श 'विलायती' से उन्होंने शहनाई बजाना सीखा।

महज 14 साल की उम्र में बिस्मिल्लाह खान ने इलाहाबाद के संगीत परिषद् में पहली बार शहनाई बजाने का कार्यक्रम किया जिसे बेहद पसंद किया गया। जिसके बाद शहनाई वादक के तौर पर शुरू हुए उनके सफर में कहीं विराम नहीं आया और लगातार सफलता हासिल करते हुए वह 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से लेकर 1961 में पद्मश्री, 1968 में पद्मभूषण, 1980 में पद्मविभूषण और तानसेन पुरस्कार सहित 2001 मे भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किए गए।

21 अगस्त 2006 को 90 साल की उम्र में वाराणसी के हेरिटेज अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से उस्ताद बिस्मिल्लाह का निधन हो गया, आज भले ही वह इस दुनिया नहीं हैं किन्तु आज भी संगीत की दुनिया में उनकी शहनाई की मधुर गूंज हमारे बीच मौजूद हैं।


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