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प्रकृति व मानव के अटूट बंधन एवं पतिव्रत के संस्कारों का प्रतीक वट सावित्री व्रत,ये है सावित्री और सत्यवान की कथा

प्रकृति व मानव के अटूट बंधन एवं पतिव्रत के संस्कारों का प्रतीक वट सावित्री व्रत,ये है सावित्री और सत्यवान की कथा
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आज 10 जून 2021 को सुहागिनों का त्योहार वट सावित्री व्रत है. आज के दिन महिलाएं पति की लंबी आयु और संतान प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं और बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं और परिक्रमा करती हैं. साथ ही सत्यवान और सावित्री की भी पूजा की जाती है. मान्यता है कि इसी दिन सावित्री से यमराज से अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी. वट सावित्री व्रत का जिक्र भविष्योत्तर और नारद पुराण में भी किया गया है.

इस व्रत के लिए कहा गया है कि इस दिन जो महिलाएं श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करती हैं, उनका सौभाग्य, समृद्धि और सुख बढ़ता है. मनोकामना पूरी होती है और अनजाने में हुए गलत कामों के दोष कटते हैं. लेकिन इस व्रत की पूजा के दौरान बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर सत्यवान और सावित्री की कथा पढ़ना जरूरी होता है, तभी ये व्रत पूर्ण माना जाता है और इस फल प्राप्त होता है. कुछ महिलाएं निर्जल रहकर पूरे दिन व्रत नियमों का पालन करती हैं. वहीं जो महिलाएं पूरे दिन व्रत नहीं रख सकतीं, वे पूजा करने के बाद व्रत खोल सकती हैं. जानिए व्रत कथा और पूजन विधि.

ये है सावित्री और सत्यवान की कथा

सावित्री नाम की एक बेहद सुंदर और संस्कारी कन्या थी. योग्य पति न मिलने की वजह से सावित्री के पिता काफी दुःखी रहते थे. एक दिन उन्होंने अपनी बेटी से कहा कि वो खुद अपना पति ढूंढ लाए. सावित्री जंगल में भटकने लगी. जंगल में सावित्री को साल्व देश के राजा द्युमत्सेन मिले. द्युमत्सेन का राज्य किसी ने छीन लिया था. तब सावित्री ने उनके बेटे सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना. सत्यवान वेदों के ज्ञाता थे, लेकिन अल्पायु थे.

तब नारद मुनि ने सावित्री को सलाह दी कि वे सत्यवान से विवाह न करें क्योंकि सत्यवान अल्पायु हैं. लेकिन सावित्री मन में ठान चुकी थीं, इसलिए उन्होंने सत्यवान से ही विवाह किया. जब पति की मृत्यु तिथि में जब कुछ ही दिन बचे थे, तब सावित्री ने घोर तपस्या की थी. जब उनके पति की मृत्यु हुई तो सावित्री ने उनके पुन: जीवनदान के लिए व्रत रखा. जब यमराज सत्यवान के प्राण ले जा रहे थे तो सावित्री उनके पीछे—पीछे चल दीं.

यमराज के बार-बार मना करने पर भी सावित्री ने अपने पति को नहीं छोड़ा और बार—बार यमराज से पति को फिर से जिंदा करने की प्रार्थना करती रहीं. सावित्री की पवित्रता और सतीत्व से प्रसन्न होकर यमराज ने सावित्री से कहा कि मैं तुम्हारे पति के प्राण तो वापस नहीं कर सकता, लेकिन तुम्हें कोई वरदान दे सकता हूं. पति के प्राण को छोड़कर कुछ भी मांग लो.

तब सावित्री बोलीं सावित्री ने कहा कि मेरे सास-ससुर वनवासी और अंधे हैं, उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें. यमराज ने कहा ऐसा ही होगा. इसके बाद भी सावित्री यमराज के पीछे चलती रहीं. तब यमराज ने कहा कि एक और वर मांग लो और यहां से लौट जाओ. तब सावित्री बोलीं कि हमारे ससुर का राज्य छिन गया है, उसे पुन: वापस दिला दें. यमराज ने सावित्री को कहा ऐसा ही होगा. फिर कहा अब तुम लौट जाओ, लेकिन सावित्री पीछे-पीछे चलती रहीं. इसके बाद यमराज ने उन्हेंं एक और वरदान मांगने को कहा तो सावित्री ने 100 संतानों और सौभाग्य का वरदान मांगा और यमराज ने तथास्तु कह दिया.

तब सावित्री ने यमराज से कहा कि प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है. बगैर पति के मैं संतानों का सुख भला कैसे प्राप्त कर सकती हूं. तब यमराज को विवश होकर सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े. कहा जाता है कि सत्यवान को दूसरा जीवन बरगद के पेड़ के नीचे ही मिला था, जिसके बाद उसी पेड़ के फूल खाकर और पति के हाथों से जल पीकर सावित्री ने अपना उपवास पूरा किया था. तब से हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री व्रत के रूप में मनाया जाता है. महिलाएं इस दिन बरगद के पेड़ और सत्यवान—सावित्री की पूजा करके अपने पति की लंबी उम्र और संतान की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करती हैं.

ऐसे करें पूजन

1- बरगद के नीचे श्री गणेश, शिव-पार्वती और सत्यवान और सावित्री की मूर्तियां रखें. यदि आप बरगद के पेड़ के नीचे नहीं जा सकतीं तो बरगद की एक डाल को किसी गमले में लगाकर घर में ही पूजा कर लें.

2- सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें फिर भगवान शिव-पार्वती की पूजा करें और इसके बाद सत्यवान और सावित्री की पूजा करें.

3- इस दौरान भगवान को अबीर, गुलाल, कुमकुम, चावल, हल्दी, मेंहंदी, फूल और प्रसाद अर्पि​त करें. इसके बाद बरगद के पेड़ को एक लोटा जल चढ़ाएं. हल्दी-रोली लगाकर फल-फूल, धूप-दीप आदि चढ़ाएं.

4- इसके बाद परिक्रमा करते हुए कच्चे सूत को 12 बार वृक्ष पर लपेटें और हर परिक्रमा पर एक फल या चना वट वृक्ष पर चढ़ाएं.

5- इसके बाद पेड़ के नीचे बैठकर सत्यवान व सावित्री की कथा सुनें या पढ़ें. फिर प्रसाद लोगों को बांटें और किसी जरूरतमंद को सामर्थ्य के अनुसार भोजन, फल या वस्त्र आदि दान करें.

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