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जीवंत समाजवादी चिंतक भगवती सिंह : कुछ अनुत्तरित सवाल

जीवंत समाजवादी चिंतक भगवती सिंह : कुछ अनुत्तरित सवाल
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समाजवादी चिंतक व प्रदेश के पूर्व मंत्री भगवती सिंह का आज लखनऊ में उनके ही महाविद्यालय में उनका देहांत हो गया। इसके बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए पूरा समाजवादी अखाड़ा उमड़ पड़ा। जो लोग यह कह रहे हैं कि उनके जाने से समाजवादी पार्टी या प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया को फर्क पड़ेगा। जो लोग यह कह रहे हैं कि उनके जाने से उनकी व्यक्तिगत क्षति हुई है। वे सभी झूठ बोल रहे हैं। समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री व समाजवादी चिंतक भगवती सिंह जिस महाविद्यालय में रहते थे, वह में रोड पर ही स्थित है। उस रोड से रोज सैकड़ों समाजवादी नेताओं का आना-जाना होता रहता था। लेकिन उनमें से एक भी उनसे मिलने नहीं जाता था। मिलने जाना तो दूर, उस तरफ देखना भी उन्हें गवारा नहीं था। लखनऊ में तमाम सपा नेता रहते हैं। लेकिन कोई उनकी कुशल क्षेम ही पूछने नहीं जाता था। मन में यही सवाल घुमड़ रहा है कि जो नेता समाजवादी पार्टी का शुभचिंतक रहा हो, समाजवादी चिंतक रहा हो। उसकी इतनी उपेक्षा क्यों ? चलिये मान लेते हैं कि समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं के पास समय नहीं रहता था। उन्हें उनकी जरूरत नहीं रहती थी। लेकिन क्या आज भी जो समाजवादी पार्टी मे पढ़ते लिखते हैं, उन्हें भी जाने की फुर्सत नहीं रहती थी। या वे इसलिए जाना पसंद नहीं करते रहे कि कहीं उनका नेता उनसे नाराज न हो जाए। आज कल के जितने पढ़ने लिखने वाले दिखाई देते हैं, उनमें कोई योग्यता नहीं है। वे सिर्फ आलाकमान की चरण वंदना करके कोई पुरस्कार पा लेना चाहते हैं। भाटगिरी करके कोई तमगा लगा लेना चाहते हैं।

कहने का सिर्फ इतना तात्पर्य है कि जो व्यक्ति समाजवादी पार्टी की सेवा में अपना पूरा जीवन होम कर देता है। उसे अपने अंतिम समय में गुमनामी का जीवन बिताना पड़ेगा। क्या ऐसे महापुरुषों के प्रति पार्टी और उसके एनताओं का कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता है ? आज सुबह से उनके जाने के बाद कई सवाल मन में घुमड़ रहे हैं। लेकिन उसका कोई भी जवाब नहीं मिल पा रहा है। अगर यही हाल रहा, तो समाजवादी पार्टी के असली शुभचिंतक उनसे दूर हो जाएंगे। जो नि:स्वार्थ भाव से दिन-रात सेवा करते हैं। जिस दिन ऐसा हुआ, उसी दिन समाजवादी पार्टी को समाप्त होते देर नहीं लगेगी।

भगवती सिंह सच्चे अर्थों में समाजवादी चिंतक थे। सिर्फ वे प्रवचन ही नहीं देते थे। बल्कि उस पर अमल भी करते थे। इसी कारण उन्होने सिर्फ अपना जीवन नहीं, मरने के बाद अपना शरीर भी मेडिकल कालेज को दान कर दिया था। जिससे वह भी जल गल कर राख़ न हो जाए, बल्कि उनके जाने के बाद भी उसका भी सदुपयोग हो जाए। इतना बड़ा त्याग का भाव उनमें एकाएक नहीं आ गया । बल्कि उन्होने डॉ राम मनोहर लोहिया, राज नारायण जैसे जमीनी समाजवादियों के पास बैठ कर राजनीति सीखी थी। उनके जीवन को देख देख कर उसे अपने जीवन और व्यवहार में उतारा था। इसी करना उनके जीवन और कर्म में शुचिता के दर्शन होते हैं। जिस समाजवादी पार्टी की स्थापना में उन्होने महती भूमिका निभाई, उससे आजन्म जुड़े रहे। इसी कारण उन्होने समाजवादी पार्टी से कभी किनारा नहीं किया। अपने चौथेपन में शारीरिक अशक्तता की वजह से जरूर उनका पार्टी कार्यालय आना जाना कम हो गया। इसी कारण उन्होंने समाजवादी पार्टी को मजबूत करने में उन्होंने पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

उधर, भगवती सिंह के निधन की सूचना मिलने पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक सच्चे समाजवादी के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए आज होने वाली महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस को निरस्त कर दिया। अपने समस्त कार्यक्रमों को टालते हुए अखिलेश यादव उनके आवास पर गए और उनका अंतिम दर्शन कर उनके समर्पण पर कृतज्ञता व्यक्त की। इसके बाद ट्वीट करते हुए उन्होने लिखा कि समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य, पूर्व सांसद एवं पूर्व मंत्री भगवती सिंह का लखनऊ में निधन, अत्यंत दुखद ! शोकाकुल परिजनों के प्रति मेरी संवेदना ! ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति एवं शोक संतप्त परिजनों को इस दुख की घड़ी में संबल प्रदान करे। भावभीनी श्रद्धांजलि!

89 वर्षीय पूर्व मंत्री भगवती सिंह समाजवादी पार्टी के संरक्षक पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी माने जाते थे। उन्होने मुलायम सिंह यादव के साथ कंधे से कंधा मिला कर सिर्फ पार्टी को ही खड़ा नहीं किया। बल्कि जब जब सरकार बनी। उसमें अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनके मृदुल और मधुर व्यवहार की वजह से हर कार्यकर्ता उनसे खुश और संतुष्ट रहता। वे कभी किसी को निराश नहीं करते। जो भी मिलने आता, उससे मिलते, उसका कुशल क्षेम पूछते और बातों ही बातों में उसे कोई न कोई ऐसा पाठ पढ़ा जाते, जिसका अनुपालन कर वह अपने राजनीतिक जीवन को सार्थक कर सके। इनका जन्म बीकेटी विकास खंड के अर्जुनपुर गांव में हुआ था। दिन भर कहीं भी रहें, शाम को अपने गाँव लौट आते। अपने गाँव को ही उन्होने प्रयोग स्थली बना रखी थी। इस समय किसान आंदोलन चल रहा है। अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी लगातार किसानों के लिए आंदोलन कर रही है। समाजवादी चिंतक भगवती सिंह ने आजीवन किसानों और मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ते रहे। अपने अंतिम समय पर भी वे किसानों के आंदोलन से जुड़ी खबरों को बड़े चाव से पढ़ते और जहां कहीं कुछ खटकता, उस पर अपनी टिप्पणी करते। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव से उनकी काफी नजदीकिया रही। नई पार्टी बनाने के बाद उन्होने उन्हें प्रसपा का झण्डा देकर समाजवाद को बचाने का उत्तरदायित्व सौंपा था। उन्होने भी इस समाजवादी चितेरे को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वरिष्ठ समाजवादी नेता भगवती सिंह के निधन की खबर से स्तब्ध व मर्माहत हूँ। भगवती सिंह राजनीति में लोहिया व गांधीवादी मूल्यों के साथ ही संत परम्परा के वाहक थे। उनका जाना मेरी व्यक्तिगत क्षति है। ईश्वर शोकाकुल परिवार को यह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें। विनम्र श्रद्धांजलि।

1977 में उन्होने अपने चुनावी राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। उन्हें महोना विधानसभा से टिकट मिला। अपनी सेवा भावना और लोकप्रियता की वजह से उन्हें कामयाबी मिली। उनकी लोकप्रियता, श्रद्धा और समर्पण की वजह से उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार में भी जगह मिली और वे आवास विकास मंत्री बने। इसके बाद वे 1985 में फिर विधायक के रूप में निर्वाचित हुए। 1990 में विधान परिषद के लिए निर्वाचित होने के बाद प्रदेश सरकार में उन्हें खेलकूद युवा कल्याण मंत्री बनाया गया। 1993 में उन्हें वन मंत्रालय की ज़िम्मेदारी मिली। जिसे उन्होने बखूबी निभाई। 1998 में पुन: विधान परिषद मनोनीत किया गया। 2003 की समाजवादी सरकार में में बाह्य सहायतित परियोजना मंत्री, तथा नेता सदन बनाया गया। 2004 में मुलायम सिंह के कहने पर वे राज्यसभा सदस्य बनाये गए।

लेकिन मेरी समाजवादी चिंतक भगवती सिंह के बारे में जानने की जिज्ञासा तब बढ़ी । जब मैं अपने कुछ मित्रों के साथ लखनऊ के दर्शनीय स्थल चंद्रिका देवी दर्शन करने गया। तब लोगों ने बताया कि इसकी समिति के अध्यक्ष भगवती सिंह हैं और यहाँ का पूरा रख रखाव उन्हीं के दिशा निर्देश पर किया जाता है। वहाँ की सारी व्यवस्था देख कर मैं भी चकित था। इसके बाद से ही मैंने भगवती सिंह के राजनीतिक और सामाजिक जीवन के बारे मे गहराई से जानने की कोशिश की । कई बार मैं अपनी पर्यावरण जागरूकता अभियान शहीद सम्मान यात्रा के दौरान इस क्षेत्र में जाने को मिला। मेरे एक मित्र राज किशोर शुक्ला का घर भी इसी क्षेत्र में है। जब कभी उनके घर जाता, तो भी वे भगवती सिंह के बारे में अपने संस्मरण सुनाते। यहाँ के स्थानीय लोगों से ही मालूम चला कि

पौराणिक तीर्थ स्थल चंद्रिका देवी मंदिर से लेकर परिसर में जितने विकास कार्य हुए हैं, सब इन्हीं का कराया हुआ है। अपने क्षेत्र के किसानों के लिए उन्होने ही बख्शी का तालाब तहसील की स्थापना कराई। किसानों के बच्चों को कृषि की उच्च शिक्षा मिले, इसके लिए ही उन्होंने चंद्र भानु गुप्ता कृषि महाविद्यालय की स्थापना कराई । इसी कृषि महाविद्यालय में ही उनका प्राणान्त हुआ।

कोरोना का में पूर्व मंत्री भगवती सिंह प्रवासी मजदूरों को देख कर अत्यंत आहत थे। इसीलिए उन्होने खुद भी और अपने सहयोगियों के माध्यम से प्रवासी मजदूरों के खाने, पीने और अन्य सुविधाएं प्रदान करने के इंतजाम किए। इस संबंध में उन्होने केंद्र और राज्य में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी को भी सुझाव देते हुए लिखा कि सरकार यात्रियों को सुरक्षित घर पहुँचाए, समाजवादी पेंशन, मनरेगा, किसान सम्मान राशि के पंजीकृत खातों में पैसे जमा करवाए, फिर बैंकों के प्रतिनिधियों को चतुर्दिक सुरक्षा देकर घर-घर तक ये पैसा पहुँचाए और राशन की मोबाइल दुकानों से वितरण करवाए।

एक बार आपात काल का जिक्र करते हुए उन्होने कहा था कि आपातकाल के बाद समाजवादी आंदोलन बिखर गया था। समाजवादी पार्टी की स्थापना लोहिया, जेपी, राजनारायण की धारा के लोगों को एक साथ खड़ा करने के लिए की गई थी। इसकी पहल मुलायम सिंह ने की। चौबीस सालों तक लगातार संघर्ष करने के बाद जाकर यह प्रयोग सफल रहा है।

कभी कभी वे हम जैसे युवा चिंतको के साथ बैठते और जब अपनी पूरी रौ में होते, तब कहते थे कि नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी की सोच में अंतर है। नई पीढ़ी पढ़ना- लिखना नहीं चाहती है। यह बात सपा के लिए नहीं, वर्तमान राजनीति की सभी धाराओं पर लागू होता है। इसकी मूल वजह यह है कि राजनीति अब सेवा के बजाय भोग का क्षेत्र बन गई है। रजत जयंती वर्ष में सपा के विवाद पर वह बोलने से बचते हैं। बुनियादी सोच बदल रही है। परिवार टूट रहे हैं, बुजुर्गों का सम्मान कम हो रहा है। समाज में जो होता है, राजनीति में उसका प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है। यह किसी एक दल में नहीं है।

जो भी सच्चा समाजवादी होता है, वह पर्यावरण के प्रति जरूर समर्पित होता है। जब जब उसे समय मिलता है। वह पर्यावरण संरक्षण के लिए अभियान चलाता है। भगवती सिंह भी अपने जीवन मे पर्यावरण के प्रति काफी संजीदा रहे। उनकी यह संजीदगी माँ चंद्रिका देवी मंदिर परिसर और कृषि महाविद्यालय परिसर को देख कर आँकी जा सकती है। रेठ नदी के जीर्णोद्धार के लिए उन्होने जल बचाओ-वृक्ष लगाओ अभियान चलाया। 6 जून, 2016 को प्रातः 8.00 बजे ग्राम कुम्हरावां के पास विलुप्त हो रही रेठ नदी के जीर्णोद्धार अभियान का शुभारंभ किया। इसके लिए प्रशासन और सरकार को कई पत्र लिखे। यह आंदोलन लंबे समय तक चला।

29 मई, 2016 को कुम्हरावां में भगवती सिंह की अध्यक्षता में क्षेत्रीय नागरिकों की एक बैठक भी हुई थी। इस बैठक में रेठ नदी को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया गया था। इसके साथ ही भगवती सिंह ने उसरना स्थित 280 बीघे वाली सौतल झील और 200 बीघे वाली सेवरही झील के जीर्णोद्धार का भी बीड़ा उठाया था । उनके अनथक प्रयास के कारण ही यह दोनों झीले बच सकी। रेठ नदी में बरसात का पानी रोकने के लिये नदी के कुछ हिस्से खुदाई कराई। नदी में पानी रोकने के लिए एक बाँध बनवाया। लेकिन उनके जाने के बाद भी तमाम ऐसे सवाल हैं इस समय भी मन में कुलबुला रहे हैं। कि जिस लखनऊ में उन्होने समाजवादी पार्टी का परचम लहराया था, क्या 2022 में वह समाजवादी पार्टी फिर सत्ता में आ पाएगी ?

प्रोफेसर डॉ. योगेन्द्र यादव

पर्यावरणविद, शिक्षाविद, भाषाविद,विश्लेषक, गांधीवादी/समाजवादी चिंतक, पत्रकार, नेचरोपैथ व ऐक्टविस्ट

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