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हाथरस की बिटिया के परिजनों के साथ बदसलूकी व अघोषित इमरजेंसी क्यों ?

हाथरस की बिटिया के परिजनों के साथ बदसलूकी व अघोषित इमरजेंसी क्यों ?
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उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में जो कुछ हो रहा है। उसे किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता है । वहाँ की एक अनुसूचित जाति की लड़की के साथ गैंगरेप और उसकी मौत के बाद से स्थानीय प्रशासन पर भी तमाम सवाल उठने लगे। पहली उंगली पुलिस प्रशासन पर उठी। जिस तरह से पुलिस द्वारा पहले एफआईआर दर्ज करने के लिए आनाकानी की गई। और इसके बाद किश्तों में उसकी धाराएँ बढ़ाई गई। इसकी वजह से पुलिस प्रशासन भी शक के घेरे में है । हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने लापरवाही बरतने के आरोप में वहाँ के पुलिस अधीक्षक सहित पाँच पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया है । वहाँ के स्थानीय प्रशासन पर दूसरा आरोप यह है कि गैंग रेप की शिकार युवती की मौत हो जाने के बाद पुलिस ने जबरन पीड़िता के शव का दाह संस्कार कर दिया । पीड़िता के घर वालों ने अपनी लड़की के अंतिम दर्शन की गुहार की। इसके बावजूद भी पुलिस नहीं मानी । हिन्दू धर्म में रात के समय दाह संस्कार वर्जित है। इसके बावजूद स्थानीय पुलिस ने हिन्दू धर्म की अवहेलना करते हुए रात को ही पीड़िता का दाह संस्कार कर दिया। इसके अलावा पुलिस वालों ने दाह संस्कार के बाद रख से उसकी आस्तियां भी नहीं चुनने दिया।

हालांकि इन्हीं सब विषयों को लेकर उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश की सियासत भी गरमा गई । कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों के प्रमुख नेता हाथरस जाकर पीड़ित परिवार से मिलना चाहते थे। लेकिन न जाने सरकार को इस पर क्यों आपत्ति है कि उन्होने किसी को भी वहाँ जाने की इजाजत नहीं दी। जिस नेता ने भी वहाँ जाने की जुर्रत की। उसे वहीं गिरफ्तार कर लिया गया । गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस के चार सांसदों का एक प्रतिनिधि मंडल पीड़ित के परिवार से मिलने जा रहा था। तो पुलिस ने उन्हें गाँव की सीमा के बाहर ही रोक लिया । एक सांसद जो जबर्दस्ती जाने की कोशिश करने लगे, उन्हें भी धक्का मार कर पीछे धकेल दिया गया । इस पर सभी सांसदों ने यह आरोप लगाया कि पुलिस प्रशासन तानशाह की तरह काम कर रहा है ।

उधर हाथरस गैंगरेप की पीड़िता के परिवार ने भी प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए कि उन्हें किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा है। उनके घर के अंदर, गली और छत पर पुलिस तैनात हैं। उनके घर की ओर आने वाले हर रास्ते पर पुलिस ने नाकाबंदी कर रखी है। सभी के मोबाइल फोन छीन लिए गए हैं। मीडिया से बात करने की सख्ती से मनाही की गई है। किसी तरह से गैंगरेप पीड़िता का सबसे छोटा भाई घास काटने का बहाना बनाकर घर से बाहर आया। तभी मीडिया वालों की निगाह उस पर पड़ गई। फिर मीडिया वाले उस तक पहुँच गए। जैसे ही उन्हें पता चला कि वह पीड़िता का भाई है। मीडिया वालों ने उससे सवाल किए ।

उसने बताया कि परिवार के हर सदस्य जे मोबाइल पुलिस ने बंद करवा दिये हैं और पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया है । उसने यह भी बताया कि पुलिस वालों ने उसके ताऊ को लात-घूसों से पीटा। पुलिस वाले परिवार के किसी सदस्य को न तो बाहर जाने दे रहे हैं और न किसी को अंदर आने दे रहे हैं।

गुरुवार को तो पुलिस प्रशासन ने पीड़िता के गाँव को छावनी में तब्दील कर दिया। आधार कार्ड देख कर ही लोगों को गाँव के अंदर और बाहर जाने दिया जा रहा था। मीडिया वालों को भी पूरी तरह पाबंद कर दिया गया था । लाख प्रयास के बावजूद भी पुलिस ने मीडिया को अंदर नहीं जाने दिया । जब कुछ मीडिया वालों ने खेतों से होकर पीड़िता के घर वालों से मिलने की कोशिश की, तो उन्हें पीडिया के घर तक पहुँचने के पहले ही रोक दिया गया । गाँव के सीमा पर जो पुलिस या पुलिस अधिकारी खड़े थे । मीडिया को रोके जाने पर जब वे सवाल करते तो या तो सभी चुप हो जाते या अगर बोलते तो सिर्फ इतना कहते कि हम लोगों को आदेश है कि किसी को भी गाँव के अंदर न जाने दिया जाए । बहुत बात में जब लगभग शाम होने को थी, तब वहाँ के एडिशनल एसपी ने कहा कि एसआईटी इस समय जांच कर रही है । जब तक वह जांच पूरी नहीं कर लेती, तब तक किसी को भी गाँव के अंदर प्रवेश करने की अनुमति नहीं है ।

इतना ही नहीं, जब यह मसला थमने का नाम नहीं ले रहा था, इसी बीच इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने इस मामले का खुद ही संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और हाथरस के अधिकारियों को नोटिस जारी करके पूछा है कि प्रशासन और सरकार के सामने ऐसी क्या मजबूरी थी, जो रातों रात पीड़िता का अंतिम संस्कार करना पड़ा । इस संबंध में सरकार और हाथरस के स्थानीय प्रशासन को 12 अक्टूबर अपना पक्ष रखना है। इस घटना पर टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के न्यायाधीश राजन रॉय और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह ने कहा कि पीड़िता की 29 सितम्बर को मौत के बाद हाथरस के जिला एवं पुलिस प्रशासन द्वारा जो कथित बर्ताव किया गायम वह बहुत दर्दनाक है। पीड़िता और उसके परिवार के साथ किया गया बर्ताव संविधान के अनुच्छेद 25 का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन है । इसके साथ ही कोर्ट के आदेश पर ही एसआईटी गठित की गई । और जांच कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है । साथ में कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर एसआईटीई की जांच से वे संतुष्ट नहीं होंगे, तो अन्य किसी एजेंसी से भी इसकी जांच कराई जा सकती है । कोर्ट ने पीड़िता के परिजनों को भी 12 अक्तूबर को बुलाया है । साथ ही हाथरस प्रशासन को पीड़िता के परिजनों की हर प्रकार से मदद करने को कहा है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पीड़िता के परिजनों को किसी प्रकार की धमकी न दी जाए। कोर्ट यही नहीं रुकी। उसने देश के विभिन्न समाचार पत्रों व न्यूज चैनलों से भी इस घटना के संबंध में उनके पास जो पुख्ता जानकारी है, उसे पेन ड्राइव या सीडी में उपलब्ध कराने के निर्देश दिया है । अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि गरीबों व दबे कुचले लोगो के मूलभूत संविधानिक अधिकारों की रक्षा करना उसका कार्य है और प्रशासनिक या राजनीतिक कारणों से उसका उल्लंघन नहीं होने दे सकता है। वह देखेगा कि पीड़िता की गरीबी या सामाजिक स्तर के कारण तो उसके साथ सरकारी मशीनरी ने कोई अत्याचार तो नहीं किया है ।

वहीं दूसरी ओर एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार ने यह आरोप लगाया कि किसी षडयंत्र के तहत शासन और पुलिस को बदनाम किया जा रहा है। ऐसे लोगों के बयानों की हम जांच कर रहे हैं। अपने बयान में उन्होने दो वीडियो का जिक्र किया । उसका हवाला देते हुए उन्होने कहा कि

पीड़िता और उसकी मां ने दुष्कर्म की बात नहीं कही थी। एक वीडियो से इस बात की पुष्टि होती है कि पीड़िता की जीभ कटी नहीं थी। 22 सितंबर को पहली बार पीड़िता ने दुष्कर्म का आरोप लगाया था। जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण गले की चोट और शॉक को बताया गया है ।

लेकिन सवाल एक बार फिर आकर वहीं अटक जाता है कि हाथरस की पीड़िता के गाँव के अंदर जाने से अगर रोकना था, तो राजनेताओं को रोका जाता । जिनके जाने से माहौल खराब हो सकता था । लेकिन मीडिया को क्यों रोका गया ? इसकी वजह से ऐसा प्रतीत हुआ कि प्रशासन की वजह से वहाँ अघोषित इमरजेंसी लगा दी गई है । मीडिया अगर वहाँ पहुँचती और पीड़िता के परिजनों से मिलती तो जो सच है, वही दिखाती । सरकार और प्रशासन इस संबंध में चाहे जितनी सफाई दे लें, लेकिन समाचार न्यूज चैनलों और समाचार पत्रों में जो कुछ लोगों ने पढ़ा, उससे पुलिस द्वारा दिये गए जवाबों से वे संतुष्ट नहीं है । सख्ती की जा सकती है। लेकिन निषेध उचित नहीं है। इतनी गलती तो प्रशासन और सरकार से हुई है । इसकी वजह से सरकार और प्रशासन दोनों की छवि धूमिल हुई है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता । इसकी वजह से उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और केंद्र की मोदी सरकार दोनों की किरकिरी हुई है ।

प्रोफेसर डॉ. योगेन्द्र यादव

पर्यावरणविद, शिक्षाविद, भाषाविद,विश्लेषक, गांधीवादी /समाजवादी चिंतक, पत्रकार, नेचरोपैथ व ऐक्टविस्ट

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