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चुनावी रेड कार्ड, युवा सपा नेता और उनका गिरा हुआ मनोबल

चुनावी रेड कार्ड, युवा सपा नेता और उनका गिरा हुआ मनोबल


इस समय मैं कोरोना - पर्यावरण जागरूकता अभियान शहीद सम्मान सायकिल यात्रा पर हूँ । गांव गांव जाकर लोगों को कोरोना से बचने के लिए कहीं बाहर से आने बाद 20 सेकंड तक साबुन से हाथ धोने, बाहर जाने पर अनिवार्य रूप से मास्क या गमछे का उपयोग करने, अगर सेनिटाइजर है,वट इससे हाथों को सेनिटाइज्ड करने की प्रक्रिया को बार बार दोहराते रहना चाहिए। वैसे भी गांवों में भी कोरोना के प्रति काफी जागरूकता आई है। लेकिन इसके बावजूद भी कई गांव ऐसे भी मिलते हैं, जहां पर सुबह शाम गांव के युवा एकत्र हो जाते हैं । एक भीड़ का दृश्य उपस्थित हो जाता है। ऐसे समय मे कोई युवा भी मास्क या गमछे का उपयोग नहीं करता है । ऐसी भीड़ को भी रुक कर प्रशिक्षित और सावधानी बरतने का अनुरोध करता हूँ। समाजवादी चिंतक होने की वजह से कहीं कहीं समाजवादी युवाओं से भी चर्चा परिचर्चा कर लेता हूँ । इस यात्रा के दौरान अभी तक कानपुर नगर, कानपुर देहात, औरैया, इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, फर्रुखाबाद जिलों का भ्रमण हो पाया है। इन सभी जिलों के ग्रामीण और कस्बों में रहने वाले युवाओं से समाजवादी पार्टी, उसके नेताओं के क्रिया कलाप, उनकी कार्यशैली और वर्तमान में समाजवादी पार्टी की दिशा और दशा के बारे में भी परिचर्चा कर लेता हूँ ।

परिचर्चा के दौरान बुजुर्ग सपा नेताओं की अपनी पीड़ा है, युवा नेताओं की अपनी पीड़ा है। संगठन पदाधिकारियों की अपनी पीड़ा है, उदीयमान नेताओं की अपनी पीड़ा है । अपनी अपनी पीड़ा, सभी को अत्यंत कष्टकारी प्रतीत होती है, बाकी शेष उसे मजे में दिखाई पड़ते हैं । यही हाल हर एक वर्ग का है । लेकिन इस दौरान कुछ ऐसे भी युवा मिले, जो पार्टी के प्रति भले ही न निष्ठावान रहे हों, लेकिन अखिलेश के प्रति बेहद निष्ठावान रहे । उनके लिए सब कुछ अखिलेश ही रहे। अखिलेश यादव की जय जयकार करने वाले ये सभी युवा नेता उनके लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहे। 2012 से 2017 तक अखिलेश यादव मुख्यमंत्री रहे, और समाजवादी पार्टी की सरकार रही । इस दौरान इन नेताओं को अखिलेश यादव ने खूब प्यार दिया, आदर और सम्मान दिया। सत्ता से जो भी लाभ उन्हें मिल सकता था, उन्हें मिला। इस अतिरिक्त प्रेम, सम्मान और सहूलियत के कारण ऐसे लोग शासन और प्रशासन की नजरों। में आ गए। इस प्रकार के कुछ लड़कों ने असीमित धन भी कमाया। सरकार बनने के पूर्व जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, उन्होंने ठीक ठाक धनार्जन कर लिया। लेकिन सच्चाई सिर्फ इतनी है कि इन लोगों ने धन भले न कमाया हो, लेकिन बड़ी बड़ी गाड़ियां फाइनेंस करा कर उससे चलने लगे। अखिलेश यादव की नकल कर उनके जैसे कपड़े और जूते भी पहनने लगे। कई तो उनकी ही तरह बोलने और भाषण देने लगे। जिसकी वजह से अपने मुहल्ले वालों के साथ समाजवादी पार्टी के अन्य नेताओं के आंख की किरकिरी बन गए। पार्टी के नेताओं और समाज के सहयोग से उनकी छवि प्रशासन की नजर में दबंग की बन गई। या यह भी कह सकते हैं कि बना दी गई । जिसकी वजह से पुलिस और प्रशासन को लगा कि अखिलेश यादव से जुड़े लड़के चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं ।

इस कारण 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान इन पर कड़ी नजर रखी गई और मतदान वाले दिन अचानक इनके घरों पर पुलिस आ धमकी और इन्हें नजरबंद कर दिया गया। हालांकि प्रशासन इस प्रकार की कार्रवाई पहले भी करता रहा है। लेकिन अखिलेश यादव के प्रभाव के कारण राजनीति में आये युवाओं के लिए यह सब अप्रत्याशित था। उन्हें न तो इसकी जानकारी थी, और न ही इस प्रकार की विषम स्थिति के लिए वे तैयार ही थे। जिन लड़कों को रेड कार्ड घोषित किया गया। उन्हें सिर्फ नजरबंद ही नही किया गया, बल्कि कइयों ने स्वीकार किया कि जब उन्होंने जबरदस्ती बाहर निकलने की कोशिश की, तो उनके साथ मारपीट की गई। उनके परिवार वालों को गालियां तक दी गई। जब मैंने पूछा कि आप लोगों ने ऐसा क्यों किया। तब उन लोगों के कहा कि उनका कोई आपराधिक इतिहास तो रहा नही है। और दूसरे जिस बूथ की उन्हें जवाबदेही दी गई,थी, उस पर वोट डलवाने की उन्होंने रणनीति बनाई थी। जब उन्हें रेड कार्ड घोषित कर घरों में बंद कर दिया गया, तो विवश हो गए । पिछले पांच साल उनकी सरकार रही, और आगे भी आने की संभावना थी। इस कारण उनका मनोबल ऊंचा था, उन्हें ऐसा लग रहा था कि अखिलेश यादव सरकार में जनहित के इतने कार्य हुए हैं, इसलिये सरकार फिर अखिलेश यादव की ही बनेगी। इस कारण कई अखिलेश यादव समर्थक उनसे टकरा गए । जिसकी परिणीति यह हुई कि उन्हें पुलिस की यातनाओं का शिकार होना पड़ा। वह भी अपने घर वालों के सामने । इससे उन्हें आत्मग्लानि हुई। कुछ अखिलेश यादव समर्थक युवा नेताओं ने बताया कि तमाम पुलिस पहरे या रेड कार्ड घोषित होने के बावजूद वे किसी तरह से भाग निकले। जैसे ही घर के बाहर बैठे पुलिस वालों को पता चला, उन्होंने उनके घर वालों को भद्दी भद्दी गालियां दी और उन्हें फिर से पकड़ कर उनकी जम कर पिटाई लगाई। कइयों तो जहां पाया, वहीं दौड़ा दौड़ा कर पीटा। जिसकी वजह से ऐसे युवा नेताओं ने खुद को अपमानित महसूस किया। जैसा परिणाम आया, वह तो सभी को पता है । समाजवादी पार्टी की बुरी हुई, जिसकी किसी ने कल्पना नही की थी। अखिलेश यादव सहित पूरी पार्टी अवाक रह गई। किसी को अपनी हार का विश्वास ही नही हो रहा था। सभी सदमें में थे। अब तो उस चुनाव और परिणाम को साढ़े तीन साल से अधिक बीत चुके हैं । धीरे धीरे सभी सामान्य हो गए हैं । अब तो समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं। उन्होंने सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को 351 विधानसभा सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है। आजकल आह्वान पत्र भी कई विधानसभा में बांटते सपा नेता दिखाई पड़े।

लेकिन रेड कार्ड इश्यू हुए अखिलेश यादव के समर्थक युवा नेताओं का कहना है कि साढ़े तीन साल बीत जाने के बाद भी किसी बड़े नेता ने उन्हें सांत्वना देना उचित नही समझा । कई युवा नेताओं ने बताया कि इसकी वजह से कई युवा सपा नेता आज भी सदमें में हैं। इस संबंध में जब मैंने कई वरिष्ठ सपा नेताओं, संगठन के पदाधिकारियों से बात की, उन्होंने कहा कि यह तो एक सामान्य प्रक्रिया है । हर चुनाव में सपा नेताओं को रेड कार्ड इश्यू किये जाते हैं । फिर उसमें नया क्या है ? इन नेताओं ने यह भी कहा कि राजनीति में मान अपमान को लेकर जो अत्यंत संवेदनशील हो जाएगा। वह राजनीति कर भी नही पायेगा। क्योंकि राजनीति में तो पग पग पर अपमान होते हैं ।

लेकिन फिर भी मैं कहना चाहता हूं कि राजनीति में आये इन नए अखिलेश यादव समर्थक कार्यकर्ताओं को, जिन्हें रेड कार्ड दिया गया था। जिन्हें नजरबंद कर दिया गया था, अखिलेश यादव से लेकर संगठन के पदाधिकारियों और विधानसभा चुनाव के भावी प्रत्याशियों की इन युवाओं से मिल कर उनका मनोबल बढ़ाना चाहिए, जिससे वे निराशा के गर्त से निकल सके और एक बार फिर से पूरी ऊर्जा के साथ 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए पूरी तरह से जुट जाएं ।

प्रोफेसर डॉ. योगेन्द्र यादव

पर्यावरणविद, शिक्षाविद, भाषाविद,विश्लेषक, गांधीवादी /समाजवादी चिंतक, पत्रकार, नेचरोपैथ व ऐक्टविस्ट

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