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उपेक्षित और बदहाली के आंसू बहाती ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी कम्पिल ।

उपेक्षित और बदहाली के आंसू बहाती ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी कम्पिल ।


कोरोना - पर्यावरण जागरूकता अभियान शहीद सम्मान सायकिल यात्रा के तहत मैं दो दिन पूर्व भारत की ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी कम्पिल पहुंचा। नवाबगंज से सुबह साढ़े पांच बजे गांव के रास्ते से वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सलमान खुर्सीद के गांव होते हुए कायमगंज पहुँचा। वहां से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कम्पिल पहुचने में मुझे करीब पांच घंटे लगे । इसके दो कारण थे - पहला की रात के एक बजे से ही बारिश हो रही थी। दूसरा सड़कें जगह जगह टूटी हुई थी। इस कारण धीरे धीरे और संभल संभल कर चलना मजबूरी रही। अभी तक मैंने जितने जिलों में यात्रा की, सबसे खराब सड़कें फर्रूखाबाद में ही मिली। इस जिले में जब मैं घुसा, तो ताजपुर रोड, जिस पर मैंने दस किलोमीटर सायकिल चलाई। सड़क में इतने गड्ढे हैं कि गड्ढे में सड़क हैं कि सड़क में गड्ढे है, ऐसे विचार भी आते रहे। खैर कायमगंज से कम्पिल तक सड़क अच्छी है। लेकिन बारिश की वजह से इस दस किलोमीटर की यात्रा में करीब छह गावों में रुका, और वहां कोरोना और पर्यावरण के सम्बंध में संदेश दिया। इसके बाद 10 बजे कम्पिल पहुँचा। वहां पहुचते ही पता चला कि कल शाम से ही यहां बिजली नही आ रही है। खैर किसी तरह शाम को बिजली आई। लेकिन पांच पांच मिनट पर वह जाती और आती रहीं। बड़ी देर तक बिजली की आंख मिचौली देखता रहा। सायकिल और पदयात्रा से हारा थका, कब मुझे नींद आ गई पता ही नही चला।

लेकिन सोने से पहले अपने मेजबान व मित्र प्रधानाध्यापक आर्येन्द्र जी के साथ पदयात्रा करते हुए इस धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी का भ्रमण करने निकले । इस नगरी में पतली पतली गालियां हैं। गलियों में सीमेंट की ईंट बिछी हुई है। लोगों ने बताया कि इस नगरी का अधिकांश हिस्सा पांडवों की पत्नी पांचाली के पिता राजा द्रुपद के किले पर बसी हुई है। मैं जहां रुकाहुआ था, वह कम्पिल का सबसे ऊंचा हिस्सा है । गलियों में दोनों किनारों पर नालियां बनी हुई है। यहां पर नगर पंचायत है। जिसके वर्तमान चेयरमैन अवधपाल सिंह यादव हैं । उनसे मिला तो नही, लेकिन उनके घर के सामने से निकला, तो देखा तो पता चला कि उनका घर समाजवादी कलर से पुता हुआ है। अखिलेश सरकार के दौरान वे वे शिवपाल यादव गुट के बड़े ताकतवर नेता माने जाते थे। लेकिन इस समय उनकी जो नेम प्लेट लगी हुयहॉ, वह भाजपाई कलर से रंगी हुई है, जिससे ऐसा लगता है कि सपा से उनका मोह भंग हो गया है और वे भाजपाई हो गए हैं ।

सबसे पहले हम पदयात्रा करते हुए उस जगह पर पहुँचे, जो कभी गंगा का किनारा था। अखिलेश सरकार में इस ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी के विकास और सौंदर्यीकरण के लिए सौ करोड़ रुपये दिए गए थे। लेकिन इस धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी को देख कर ऐसा नही लगता कि अखिलेश यादव द्वारा अपने मुख्यमंत्रित्व काल मे जो धनराशि निर्गत की गई थी, उसका सदुपयोग किया गया हो। खैर इस बारे मे जब पता किया गया, तो पता चला कि उस धन के दुरुपयोग पर योगी सरकार जांच करा रही है। और उसे से संबंधित दो याचिकाएं भो हाई कोर्ट में पड़ी हैं, जिस पर अभी सुनवाई चल रही है। यानी है कोर्ट द्वारा सरकार से जांच कराई जा रही ।

हम जब गंगा घाट पर पहुंचे, तो देखा कि राजस्थान के लाल पत्थरों से एक भव्य भवन बना हुआ है, जिसमें एक चारपाई बिछी हुई है। उस पर विस्तर लगा हुआ है,और दूसरे कोने पर दो लड़के बैठ कर देशी दारू पी रहे हैं। वहां से 250 मीटर की दूरी पर थाना है, और ऐसे तत्वों को नियंत्रित करने के लिए कोई इंतजाम नही है। जब वहां के आसपास के लोगों से चर्चा की, तो पता चला कि शाम के समय ऐसे ही अराजक तत्वों की बैठक गाह बन जाती है। बस्ती से बाहर होने की वजह से वहां लोगों का आना - जाना भी कम ही होता है। लेकिन एक ऐसे पवित्र घाट पर इस तरह का माहौल शोभा नही देता, न उचित ही कहा जा सकता है । इस कुंड में बहुत थोड़ा पानी था। जब मैंने कम्पिल के बुजुर्गों और अपने मेजबान से इस पर चर्चा की तो उन्होंने बताया कि पहले गंगा यहीं से प्रवाहित होती रही। और हमारे होश में यहां से चार पांच किलोमीटर की दूरी पर प्रवाहित होती, किंतु धीरे धीरे खिसकती गई । इस संबंध में जब मैंने कुछ और बुजुर्गों से चर्चा की तो उन्होंने कहा कि हमारे होश में यहां से दो किलोमीटर की दूरी पर बहती रही, लेकिन खिसकते खिसकते अब दस किलोमीटर दूर चली गई। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उनके पिता जी के बचपन मे वह यहां से काफी करीब रही।

इसके बाद वहां से निकल कर उस मंदिर में पहुचे। जिस ज्योतिर्लिंग की स्थापना भगवान श्रीकृष्ण ने की थी। और इसी ज्योतिर्लिंग की द्रौपदी पूजा अर्चना करती रही । मैंने उस ज्योतिर्लिंग को बड़े गौर से देखा, तो ऐसा लगा कि वह अत्यंत प्राचीन है । खैर मैंने भी भगवान श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित उस ज्योतिर्लिंग को नमन किया। और मंदिर की पुरातन होने की जांच करते हुए आगे बढ़ा। इस मंदिर का भी काफी भाग आज भी पुरातन काल का है, जो उसके ऐतिहासिक होने का प्रथम दृष्टि में आभास दिलाता है ।

वहां से निकल कर हम लोग एक प्राचीन और दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर में गए। बंदरों के प्रकोप और कोरोना की वजह से वहां एक भी दर्शनार्थी नही था। हम लोगों ने सुरक्षित स्थान पर अपने अपने चप्पल उतारे, जिससे उसे बंदर लेकर न भाग जाए। फिर जाकर उस दक्षिणमुखी हनुमान की मूर्ति को नमन किया। यह कितनी पुरानी है, और इसकी स्थापना किसने की, इसकी जानकारी तो नही हो सकी। लेकिन लोगों ने बताया कि यह भी मूर्ति काफी प्राचीन है। और इस मन्दिर का भी अपना माहात्म्य है। जिसका दर्शन करने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं । वहां से निकलने के बाद हम उस हवनकुंड की तरफ़ गए। जहां यज्ञ करने के बाद राजा द्रुपद को एक पुत्र और पुत्री प्राप्त हुई थी। अखिलेश सरकार में इस स्थान का भी सौंदर्यीकरण हो चुका है। जब इसकी ऐतिहासिकता के संबंध में लोगों से चर्चा की, तो पता चला कि पहले यह हवन कुंड काफी गहरा था। इस कारण इसमें खूब पानी भी भरा रहता था, जो श्रद्धालु यहां आते, उसमें युवा किस्म के लड़के स्नान करने लग जाते। जिसकी वजह से हर वर्ष दो चार लड़के डूब कर मरने लगे। इसी कारण अब इसे काफी उथला कर दिया गया है। साथ ही यह भी कोशिश रहती है, इसमें इतना पानी न इकट्ठा हो जाये, जिससे कोई इसमें डूब कर मरे। लोगों ने बताया कि तबसे यहां डूब कर मरने की घटनाओं पर अंकुश लग गया है। कुंड के प्रति आज लोगों की श्रद्धा है, इस कारण आज भी लोग इसके जल से आचमन करते हैं ।

वहां से निकल कर हम लोग उस ऐतिहासिक मंदिर में गए, जहां पर उस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की गई है, जिस ज्योतिर्लिंग की पूजा - आराधना माता सीता लंका नगरी की अशोक वाटिका में किया करती थीं । इसके बारे में ऐसी मान्यता है कि जब भगवान श्रीराम के अनुज मथुरा के आततायी राजा को सबक सिखाने के लिए चले, तब माता सीता ने उस शिवलिंग को किसी पवित्र स्थान पर स्थापित करने को कहा था। वही शिवलिंग अपनी अन्तः प्रेरणा से शत्रुघ्न ने यहां कम्पिल में स्थापित किया। यह रामेश्वरम धाम के रूप में माना जाता है । यहां के लोगों ने बताया कि इसका माहात्म्य उस रामेश्वरम शिवलिंग की तरह से है, जिसकी स्थापना शिवभक्त व लंकापति रावण ने रामेश्वरम में की है। मैंने उस ज्योतिर्लिंग के दर्शन किये और साथ ही उसके पुरातन होने का परीक्षण किया।

इसके पहले हम उस मंदिर में गए, जिसकी स्थापना भगवान विष्णु के पांचवें अवतार माने जाने वाले कपिल मुनि ने की थी। जिसके नाम पर इसका नाम काम्पिल्य पड़ा, जो भाषा विज्ञान के अनुसार बाद में कम्पिल हो गया। ऐसा बताया गया कि इसी स्थान पर भगवान कपिल मुनि ने अपनी माता को सांख्य दर्शन का उपदेश दिया था। वहां स्थित ज्योतिर्लिंग के साथ कपिल मुनि की एक प्राचीन प्रस्तर की मूर्ति भी प्रस्थापित है। इस स्थान पर जो भी पूजा करने जाता है, वह वहां स्थित ज्योतिर्लिंग के साथ साथ उनकी माता के भी दर्शन करता है ।

इस प्रक्रिया में मुझे करीब दो घंटे लगे। दर्शन, चिंतन मनन के कारण मन मे कई सवाल घुमड़ रहे थे। उनके समाधान के लिए संयोगवश हमें वहां के मुख्य पुजारी और प्रकांड विद्वान मनीषी से संवाद करने का अवसर मिला। उन्होंने साक्ष्य के साथ साथ समस्त मंदिरों की ऐतिहासिकता बताई। साथ ही शास्त्रों में वर्णित आस पास के नाम और आज प्रचलित शब्दों से उनका रूपांतरण कैसे हुआ। यह भी जानकारी दी।

आज हमने सुबह करीब चार घंटे आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों का भी भ्रमण किया। लेकिन एक बात का अफसोस है कि एक संत के रूप में इस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ जी विराजमान हैं । आस पास के सभी जिला मुख्यालयों से सामान दूरी पर स्थित सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलयुग का दर्शन कराने वाले कम्पिल जैसी धार्मिक नगरी की ओर आने वाली सड़कें बेहद खस्ता हालत में है। कायम गंज से कम्पिल आने वाली सड़क को छोड़ दिया जाए, तो शेष सड़कों पर गड्ढे और पानी जमा हैं। विद्युत व्यवस्था की हालत तो बेहद खराब है। यहां सुबह से गई बिजली दोपहर के एक बजने वाले हैं, लेकिन अभी तक नही आई है। मंदिरों के आसपास पुलिस की भी व्यवस्था न के बराबर है। जिससे यहां आने वाले दर्शनार्थियों के साथ अगर कोई दुर्घटना हो जाये, तो आंसू बहाने के अलावा उसके पास कोई चारा नही है । ऐसे में इस लेख के माध्यम से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अनुरोध है कि वे अन्य तीर्थ स्थलों की तरह यहां भी सड़क, पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएं ।

प्रोफेसर डॉ. योगेन्द्र यादव

पर्यावरणविद, शिक्षाविद, भाषाविद,विश्लेषक, गांधीवादी /समाजवादी चिंतक, पत्रकार, नेचरोपैथ व ऐक्टविस्ट

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