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प्रेमचन्द!!

प्रेमचन्द!!


लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास, तीन सौ कहानियां और तीन नाटकों के वही रचनाकार, जो फटे जूते पहनते थे। वही प्रेमचन्द जो युगों तक हिन्दी साहित्य का पेट भरते रहे पर कभी उनका पेट न भर सका।

प्रेमचन्द उस समय के लेखक थे जब लेखक न वामपंथी होता था न दक्षिणपन्थी। लेखक तब केवल लेखक हुआ करता था। सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते समय उनकी कलम जातिवादी नहीं हुई, बल्कि वह निर्मला के लिए भी उतना ही रोयी जितना धनिया के लिए... उनकी कलम ने आदर्शवादी नायक के रूप में भिखमंगे सूरदास को स्थापित किया तो राजकुमार विनय को भी... उनकी कलम ने किसी जाति विशेष के विरुद्ध जहर नहीं उगला, बल्कि वे अपने युग की हर पीड़ा पर मुखर हो कर बोले।

प्रेमचन्द ने कभी स्वयं को नारीवादी लेखक नहीं कहा, पर स्त्रियों के लिए जितना उन्होंने लिखा उतना कोई घोषित नारीवादी नहीं लिख सका।

प्रेमचंद ने कभी स्वयं को दलित लेखक नहीं कहा, पर वंचितों के लिए जितनी आवाज उन्होंने उठाई, उतना कोई घोषित-पोषित दलित लेखक नहीं उठा सका।

लेखन में प्रगतिशीलता के तमाम दावों के बीच सत्य यही है कि प्रेमचन्द जैसा प्रगतिशील लेखक कोई और नहीं दिखता। 2020 के भारत को वे उन्नीस सौ तीस के दशक में लिख रहे थे।

प्रेमचन्द उन लेखकों में से थे जिन्होंने न आलोचकों को ध्यान में रख कर लिखा न पुरस्कारों को... उन्होंने केवल और केवल पाठकों के लिए लिखा। और तभी वे सौ साल से हिन्दी के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले लेखक हैं।

कुछ लोगों को लगता है कि जबतक क्लिष्ट शब्दों की जलेबी न बनाई जाय तबतक लेखन सुन्दर नहीं होता। प्रेमचन्द ने इस भरम को तोड़ा... उन्होंने सिद्ध किया कि जनता का साहित्य जनता के शब्दों में ही लिखा जाना चाहिए।

प्रेमचन्द का अंतिम पूर्ण उपन्यास था गोदान! मुझे गोदान के होरी में कोई और नहीं बल्कि स्वयं प्रेमचन्द दिखते हैं। विपन्नता में जी कर भी कभी अपने आदर्शों, अपने धर्म से समझौता नहीं करने वाला होरी... प्रेमचन्द वही तो थे। कभी न रुकने वाले... कभी न थकने वाले... लेखन को उन्होंने धर्म माना था तो मृत्यु के दिन तक अपना धर्म निभाते आये... गरीबी में जीवन काट लिया पर अपने आदर्शों से कभी समझौता नहीं किया। बनारस वालों की यही जीवटता रही, वो मुंसीजी हों या साहू जी, कभी डिगे नहीं।

हिन्दी साहित्यकारों की पिछली दो पीढ़ियों ने पाठकों का भयानक अकाल झेला है। इस अकाल से मुक्त होने का तरीका प्रेमचन्द से ही सीखा जा सकता है। नई पीढ़ी के लेखकों के लिए उनसे अच्छा गुरु कोई नहीं हो सकता।

कल प्रेमचन्द की 140वीं जयंती है। कलम के सिपाही को शत शत नमन...

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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