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अखिलेश के लिए चुनौती बने स्वयं वादी क्षत्रप

अखिलेश के लिए चुनौती बने स्वयं वादी क्षत्रप


उत्तर प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव 2017 में पुनर्वापसी और 351 विधानसभा सीटें जीतने की बातें कर रहे हैं। उसके लिए रणनीति भी बना रहे हैं और उसे क्रियान्वित करने के लिए अपने सलाहकारों से विचार विमर्श भी कर रहे हैं । समयानुकूल कदम भी उठा रहे हैं । लेकिन उनकी राह इतनी आसान नही है । क्योंकि 2022 के चुनाव जीतने के लिए जितनी बाहरी चुनौतियां है, उससे कम अंदरूनी चुनौतियां नही हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को अगर सत्ता में वापसी करना है, तो अपनी पार्टी की अंदरुनी चुनौतियों का निराकरण करना होगा।

अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती है - एक मजबूत संगठन का पुनर्गठन। जब जब पार्टी का हस्तांतरण किसी युवा नेता के हाथों में होता है, उसका पहला कदम यही होता है कि वह संगठन के उच्च पदों पर अपने विश्वस्त लोगों को बिठाए। जो पार्टी और उसमें निष्ठा के साथ साथ इस स्थिति में हों कि अगर कोई अनुशासन हीनता करे, तो उसे पहले समझा बुझा कर और न माने तो उसे पार्टी से बाहर करके एक संदेश दे सके। इसके लिए पार्टी प्रमुख को भी उसके हर निर्णय में उसके साथ खड़ा होना पड़ता है। वह निरंकुश न हो जाये, इसलिए उस पर भी नजर रखना पड़ता है । ऐसे में जब चुनाव नजदीक हो, तो संगठन के प्रमुख पदों पर ऐसे लोगों को पदस्थ करने की जरूरत है । जो सही प्रत्यशियों के चयन में अपने राष्ट्रीय नेता की मदद भी करे और चुनावी रणनीति का महारथी हो, और उसके पास एक ऐसी टीम हो, जो चुनाव में अहम भूमिका निभा सके । समाजवादी पार्टी में चुनाव में यह देखने मे आया है कि जिला अध्यक्ष विधानसभा चुनाव के समय प्रत्याशियों की कठपुतली होता है । प्रत्याशी जैसा चाहता है, वैसा उसका इस्तेमाल करता है। पिछले चुनावों के अनुभवों की बात करें, तो अधिकतर जिला अध्यक्ष चुनाव की पूरी प्रक्रिया के ही बाहर हो जाते हैं । या किसी बात को लेकर नाराज हो जाते हैं, अपनी इच्छानुसार जहां इच्छा होती है, घूमते हैं, और नही तो कार्यालय में बैठ कर समय काटते हैं । प्रायः यह देखा गया है कि जिला अध्यक्ष और प्रत्याशी का अहम टकरा जाता है, जिससे चुनाव के समय दोनों के बीच आपसी तालमेल नहीं हो पाता है । जिस कारण कभी कभी विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ता है । अगर 2017 के विधानसभा चुनाव की बात करें, तो अगर एक दर्जन सीटें छोड़ दें, तो मुझे कहीं भी तालमेल दिखाई नही पड़ा । और आपसी तालमेल और मुकम्मल रणनीति के अभाव में चुनावी बयार का भी लाभ उठाने में सपा और उसके प्रत्याशी चूक गए ।

हालांकि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इस समय जिला संगठन के पुनर्गठन में लगे हुए हैं । अपने विश्वास पात्रों को मनोनीत भी कर रहे हैं । जितने जिले में नए सपा जिला अध्यक्ष मनोनीत हुए हैं, अभी तक उन्होंने ऐसा कोई कदम नही उठाया है, जिससे उनकी कार्यशैली और उनकी काबिलियत का पता चल सके। अभी सभी जिला अध्यक्ष कोरेना संक्रमण से भयभीत हैं। जनता के बीच मे जाने की बात छोड़िए, अभी कार्यालय पर भी समय नही दे रहे है। जिसकी वजह से समाजवादी पार्टी के जिला कार्यालय वीरान पड़े हुए हैं। ऐसे समय मे जब किसानों मजदूरों के सामने तमाम समस्याएं खड़ी हैं, सपा का नेता और संगठन, दोनों ही उसके साथ खड़े नही हो पा रहे है। हार थक कर वह फिर सत्ता पक्ष के नेताओं के शरणागत हो रहा है । जिसकी वजह से जब एक माहौल जनता के बीच मे सपा के पक्ष में बन सकता है, वह नही बन पा रहा है। सिर्फ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के अकेले प्रयास से क्या हो सकता है ? जब उनका संगठन निष्क्रिय पड़ा रहेगा।

इस समय मैं कोरेना पर्यावरण जागरूकता अभियान शहीद सम्मान के तहत सायकिल से एक एक गांव में घूम रहा हूँ । लोगों को कोरेना और पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का काम कर रहा हूँ । समाजवादी चिंतक होने के नाते समाजवाद और उसके नेताओं के संबंध में भी जनता से चर्चा कर रहा हूँ । ढेर सारे तथ्य पता चल रहे हैं । लेकिन इस लेख में उनका उल्लेख ठीक नही है । सिर्फ विषयगत संदर्भों की ही चर्चा करना है। एक बात जरूर दिखाई दे रही है । समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ साथ समाजवादी पार्टी के ऐसे नेताओं में उत्साह है । सभी लोगों को लग रहा है कि योगी सरकार की विफलताओं के बाद उनकी सरकार आनी सुनिश्चित है। इस कारण हर विधानसभा में एक दर्जन से अधिक उम्मीदवार अपने अपने को स्वयं प्रत्याशी घोषित कर जनता के बीच मे नही, अपनों के बीच मे स्वयम का प्रचार कर रहे हैं। एक दर्जन से अधिक प्रत्याशी होना गलत बात नही है । लेकिन वे एक दूसरे की बुराई करने आए एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोई कोर कसर नही छोड़ रहे हैं । जिसकी वजह से अभी से समाजवादी पार्टी गुटों में परिवर्तित हो गई है । इससे समाजवादी पार्टी की छवि खराब हो रही है । कई विधानसभा में एक दूसरे को अभी से निपटाने का भी खेल चल रहा है। जिस पर किसी का अंकुश नही है। ऐसे नेताओं को क्षेत्रीय जनता स्वयं वादी कहती है ।

अगर इस आधार पर विश्लेषण करें, तो समाजवादी इस समय कई भागों में बंटी हुई है। लेकिन इसमें से स्वयं वादी पार्टी के लिए, और अखिलेश यादव के लिए चुनौती बन सकते हैं । स्वयं वादी का मतलब जब मैंने क्षेत्र की जनता से पूछा, तो उन्होंने कहा कि ऐसे नेता जो खुद को पार्टी से ऊपर समझते हैं। सपा संस्थापक नेताजी मुलायम सिंह के प्रति जिनमे श्रद्धा नही है । जो अखिलेश से टिकट तो चाहते हैं, लेकिन वे ऐसा मानते हैं कि अखिलेश यादव की वजह से उनका वजूद नही है, बल्कि उनकी वजह से अखिलेश यादव का वजूद है। ऐसा नही है कि ऐसे लोग अखिलेश यादव की नजरों से ओझल हों, उन्हें भी बखूबी ऐसे लोगों की जानकारी है । ऐसे स्वयं वादी क्षत्रपों की पार्टी और अखिलेश यादव में जरा सी भी निष्ठा नही है । जनता ने बताया कि ऐसे लोग विरोधी राजनीतिक दलों के संपर्क में हैं । अंदरखाने उनकी टिकट की भी बात चल रही है। समाजवादी पार्टी के ऐसे स्वयं वादी नेताओ के बारे में जनता का कहना है कि वे इतने अहंकार में हैं कि वे चुनाव जरूर लड़ेंगे और जीतेंगे। लेकिन मैंने ऐसे स्वयं वादी नेताओं का हश्र देखा है। जिस दिन पार्टी से निकाल दिए जाते हैं । तमाम पैसा खर्च करने और प्रचार प्रसार करने के बाद कुछ हजार वोटों में सिमट जाते हैं।

लेकिन एक बात तो है कि ऐसे स्वयं वादी जो समाजवादी पार्टी की, अखिलेश यादव की जयकारा न लगवा कर अपनी जय जय कार करवाते हैं । ऐसे नेताओं के इर्द गिर्द रहने वाले नेता भी उसी स्वयं वादी नेता की जय जयकार करते हैं ।

समाजवादी पार्टी के लिये यह एक अशुभ संकेत है और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए यह एक चुनौती है । लेकिन अपने अनुभवों के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की राजनीतिक परिपक्वता बेहतर हुई है। विपक्ष में आने के बाद साढ़े तीन सालों में उन्होंने इसी पर काम किया है । समाजवादी पार्टी के एक एक नेता की राजनीतिक कुंडली उनके पास है। लेकिन सहृदय और नेकदिल इंसान होने के नाते अभी तक उन्होंने ऐसे नेताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नही की है, लेकिन भविष्य में भी नही करेंगे, इसकी कोई गारंटी नही दे सकता है। क्योंकि यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि नेकदिल इंसान या राजनेता एक स्थिति तक ही ऐसी उच्छृंखलता बर्दाश्त करते हैं । जब सर से ऊपर पानी हो जाता है, तो उसका राजनीतिक जीवन समाप्त भी कर देते हैं।

प्रोफेसर डॉ. योगेन्द्र यादव

पर्यावरणविद, शिक्षाविद, भाषाविद,विश्लेषक, गांधीवादी /समाजवादी चिंतक, पत्रकार, नेचरोपैथ व ऐक्टविस्ट

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