2080 तक नहीं बदलेगी मकर संक्रांति की तारीख, 55 साल तक 15 जनवरी को ही होगा सूर्य का मकर प्रवेश

Update: 2026-01-13 08:26 GMT

रिपोर्ट : विजय तिवारी

मकर संक्रांति को लेकर की गई ज्योतिषीय गणनाओं, खगोलीय अध्ययनों और विभिन्न पंचांगों के गहन एवं तुलनात्मक विश्लेषण से एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। इन गणनाओं के अनुसार आगामी लगभग 55 वर्षों तक मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाती रहेगी। खगोल विज्ञान के सिद्धांतों के अनुरूप सूर्य प्रत्येक वर्ष अपनी निर्धारित वार्षिक गति के क्रम में इसी तिथि को धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेगा। सूर्य का यही राशि परिवर्तन मकर संक्रांति का मूल आधार माना जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति किसी आकस्मिक संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिक्रमा, सूर्य की दीर्घवृत्तीय चाल और खगोलीय संतुलन का स्वाभाविक निष्कर्ष है। इसी स्थिर खगोलीय व्यवस्था के कारण मकर संक्रांति की तिथि लंबे समय तक अपरिवर्तित बनी रहती है। वर्तमान गणनाओं के अनुसार यह क्रम वर्ष 2080 तक पूर्णतः स्थिर रहेगा।

हालांकि खगोलीय गणनाओं में सूक्ष्म परिवर्तन निरंतर होते रहते हैं। इन्हीं सूक्ष्म बदलावों के प्रभावस्वरूप वर्ष 2080 के बाद सूर्य के राशि परिवर्तन की तिथि में परिवर्तन दिखाई देगा। इसके परिणामस्वरूप मकर संक्रांति एक दिन आगे खिसकते हुए 16 जनवरी को मनाई जाने लगेगी।

खगोलीय आधार, संक्रांति का निर्धारण और सूर्य की गति

मकर संक्रांति का पर्व पूरी तरह खगोलीय गणना और सूर्य की वार्षिक गति पर आधारित होता है। यह पर्व चंद्र तिथि से निर्धारित नहीं होता, बल्कि सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने पर मनाया जाता है। पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिक्रमा, उसकी दीर्घवृत्तीय कक्षा और सूर्य की गणितीय चाल के कारण संक्रांति की तिथि लंबे समय तक स्थिर रहती है। यही कारण है कि आने वाले दशकों तक मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी। यह तथ्य भारतीय कालगणना की वैज्ञानिक सटीकता और खगोलीय समझ को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

खरमास का समापन और शुभ व मांगलिक कार्यों का पुनः आरंभ

सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही खरमास की अवधि समाप्त मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार खरमास वह समय होता है, जिसमें विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और यज्ञोपवीत जैसे मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। मकर संक्रांति के साथ ही शुभ काल का पुनः आरंभ होता है, जिससे सामाजिक और पारिवारिक जीवन में नई शुरुआत, उत्साह और आयोजनों का वातावरण बनता है।

पंचांग गणना, योग-नक्षत्र और धार्मिक अनुकूलता

पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति का महत्व उस दिन बनने वाले तिथि, नक्षत्र और योग से और अधिक बढ़ जाता है। शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि, ज्येष्ठा नक्षत्र और वृद्धि योग का संयोग उन्नति, विस्तार और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इस दिन किए गए जप, तप, व्रत और दान को विशेष फलदायी बताया गया है। शुभ वार का संयोग पर्व की धार्मिक गरिमा को और अधिक सुदृढ़ करता है।

उत्तरायण : आध्यात्मिक चेतना और आत्मिक उन्नति का काल

मकर संक्रांति से सूर्य का उत्तरायण होना भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है। शास्त्रों में उत्तरायण को प्रकाश, ज्ञान और चेतना का काल माना गया है, जबकि दक्षिणायन को विश्राम और अंतर्मुखी अवस्था से जोड़ा गया है। उत्तरायण काल में साधना, ध्यान, योग और सेवा को विशेष फल देने वाला माना गया है। यह समय आत्मिक जागरण, अनुशासन और सकारात्मक जीवन दृष्टि का संदेश देता है।

स्नान, दान और पुण्य परंपरा का व्यापक अर्थ

मकर संक्रांति के दिन स्नान और दान को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन साधारण नदी या जलाशय में किया गया स्नान भी विशेष पुण्य प्रदान करता है। तिल और गुड़ का सेवन एवं दान न केवल स्वास्थ्य संतुलन से जुड़ा है, बल्कि यह मधुरता, सौहार्द और सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। अन्न, वस्त्र और द्रव्य दान समाज में करुणा, सहयोग और समानता की भावना को मजबूत करता है।

लोक परंपराएं, सांस्कृतिक स्वरूप और सामाजिक एकता

मकर संक्रांति भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विविध नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। कहीं यह फसल कटाई और कृषक उत्सव का प्रतीक है, तो कहीं सूर्य आराधना और लोक आस्था का पर्व। पतंग उड़ाना, मेलों का आयोजन, सामूहिक स्नान और भंडारे इस पर्व को जनजीवन से गहराई से जोड़ते हैं। ये परंपराएं सांस्कृतिक निरंतरता, सामाजिक एकता और सामूहिक उल्लास का प्रतीक हैं।

आस्था और विज्ञान का संतुलित संदेश

मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसमें खगोलीय विज्ञान और आध्यात्मिक आस्था का संतुलित और सुंदर समन्वय दिखाई देता है। सूर्य की वैज्ञानिक गति जीवन में अनुशासन, ऊर्जा और निरंतरता का संदेश देती है, जबकि आध्यात्मिक पक्ष आत्मिक उन्नति और सामाजिक सद्भाव को प्रोत्साहित करता है। इस दृष्टि से मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि नए शुभ काल, जीवन संतुलन और सकारात्मक चेतना का प्रतीक मानी जाती है।

Similar News