बहराइच में उर्दू अकादमी के सौजन्य से सजी अदबी महफ़िल, शायरों ने बांधा समां
आनन्द गुप्ता /अनवार खाँ मोनू
बहराइच। मोहल्ला अकबरपुरा स्थित एक विद्यालय का प्रांगण बुधवार की शाम साहित्यिक रंग में सराबोर हो उठा, जब उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के तत्वावधान में गंगा-जमुनी तहजीब और राष्ट्रीय एकता को समर्पित भव्य मुशायरे का आयोजन किया गया। मुशायरे की अध्यक्षता प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा कार्यालय के प्रभारी मोहम्मद असरार ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष (अल्पसंख्यक मोर्चा) अमील शम्सी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम को गौरवान्वित किया। संचालन नाज़िम राशिद राही ने किया।
मुख्य अतिथि अमील शम्सी ने अपने उद्बोधन में कहा कि “भारत की धरती मोहब्बत, शांति और भाईचारे की अनूठी मिसाल है। यहां के लोगों के दिलों में कौमी यकजहती गहराई तक रची-बसी है। जब दुनिया जंग, अफरा-तफरी और तनाव से जूझ रही है, तब भारत अमन और इंसानियत का पैगाम दे रहा है। विश्व को भारत के इस संदेश से सीख लेनी चाहिए।”
कार्यक्रम अध्यक्ष असरार ने कहा कि बहराइच की पहचान ऋषियों, मुनियों और सूफी संतों की नगरी के रूप में रही है। यह जिला आज भी प्रेम, सद्भाव और अदब की खूबसूरत मिसाल पेश करता है। उन्होंने कहा कि उर्दू अदब के इतिहास में भी बहराइच का विशेष स्थान है।
मुशायरे में देश-प्रदेश के प्रतिष्ठित शायरों ने अपने कलाम की प्रस्तुति दी, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा। मंच पर
मजहर सईद, गुलशन पाठक, डॉ. अशोक पांडे ‘गुलशन’, शहबाज़ तालिब, सैयद सगीर आबिद रिज़वी, अंजुम ज़ैदी, अभीश्रेष्ठ तिवारी, मंज़ूर बहराइची, राधा कृष्ण पाठक, फौजिया आफरीन, तमन्ना जाफ़री, नदीम ताबिश, शौकत अली और नाज़िम बहराइची सहित कई नामचीन शायरों ने अपनी रचनाएँ पेश कीं।
साहित्य को बढ़ावा देने और रचनाधर्मिता को प्रोत्साहित करने की दिशा में उत्तर प्रदेश सरकार की पहल के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में पत्रकारों एवं समाजसेवियों को सम्मानित भी किया गया। सम्मानित होने वालों में
सै० शफीउद्दीन ज़ैदी, बच्चे भारती, शादाब हुसैन, अतहर मेहदी, तौहीद अहमद, एहतिशाम जाफ़री, मोहम्मद अब्दुल्ला, अकरम सईद, मंशाद अहमद, हारून मलिक एडवोकेट तथा मिर्ज़ा शकील बेग सहित कई गणमान्य लोग शामिल रहे।
इस शानदार मुशायरे का आयोजन अदबी संस्था ‘बज्मे नूरे अदब’ द्वारा किया गया।
अन्त में संयोजक जावेद जाफ़री ने सभी अतिथियों, शायरों, कवियों और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उर्दू अदब और साझा संस्कृति के संरक्षण के लिए ऐसे आयोजन समय-समय पर होते रहने चाहिए।