बिना वैकल्पिक व्यवस्था ट्रेनिंग पर भेजा गया डॉक्टर, मरीज लौटे खाली हाथ

Update: 2026-02-09 11:10 GMT

बहराइच।

विकास खण्ड नवाबगंज अंतर्गत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बाबागंज में डॉक्टरों की अनुपस्थिति ने एक बार फिर स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था की पोल खोल दी है। यह मामला अब किसी एक चिकित्सक की गैरहाजिरी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सीधे तौर पर सीएमओ बहराइच और प्रभारी अधीक्षक की प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है।

लगातार मिल रही शिकायतों के बाद जब स्थानीय मीडियाकर्मियों की टीम पीएचसी बाबागंज पहुंची, तो वहां डॉक्टर की कुर्सी खाली मिली। न कोई चिकित्सक मौजूद था, न सूचना पट पर कोई जानकारी और न ही मरीजों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था। इससे साफ जाहिर होता है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को पूरी तरह नियंत्रण और निरीक्षण के बिना छोड़ दिया गया था।

फोन पर संपर्क करने पर आयुष चिकित्सक डॉ. सुरेश गुप्ता ने बताया कि वह बहराइच में ट्रेनिंग पर हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि

क्या सीएमओ और प्रभारी अधीक्षक की अनुमति के बिना कोई डॉक्टर ट्रेनिंग पर जा सकता है?

और यदि अनुमति दी गई थी, तो पीएचसी बाबागंज में वैकल्पिक डॉक्टर की तैनाती क्यों नहीं की गई?

डॉक्टर की खाली कुर्सी की तस्वीर जब सीएमओ बहराइच और प्रभारी अधीक्षक को व्हाट्सएप के माध्यम से भेजी गई, तब जाकर विभाग में हलचल मची। लेकिन तब तक हालात नहीं बदले। मरीज देवेंद्र मिश्र, ए.के. पाठक, बंधना और रामनवमी समेत कई ग्रामीण घंटों इंतजार के बाद बिना इलाज के लौटने को मजबूर हो गए।

सूचना मिलने के लगभग आधे घंटे बाद डॉक्टर विवेक कुमार स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे, लेकिन तब तक सभी मरीज जा चुके थे। इससे यह सवाल और गहरा हो गया कि

यदि मीडिया मौके पर न पहुंचता, तो क्या डॉक्टर कभी आते?

क्या ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं केवल अधिकारियों के फोन कॉल पर ही चलती हैं?

स्थानीय पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस पूरे प्रकरण में केवल अधीनस्थ डॉक्टर को जिम्मेदार ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा। पीएचसी की दैनिक मॉनिटरिंग, डॉक्टरों की उपस्थिति और वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करना सीएमओ और प्रभारी अधीक्षक की सीधी जिम्मेदारी है।

मांग की गई है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि बाबागंज पीएचसी को किसके आदेश पर और किसकी लापरवाही से डॉक्टरविहीन छोड़ा गया। जब तक शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं केवल कागजों और दावों तक ही सीमित रह जाएंगी।

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