सुनहरे गेहूँ का संघर्षगीत

Update: 2026-04-13 05:53 GMT

सांझ का समय था। आकाश में ढलता हुआ सूरज जैसे अपनी थकी हुई लालिमा को धरती पर बिखेर रहा था। गेहूँ के खेत सुनहरी रोशनी में डूबे हुए थे, पर उस चमक के भीतर एक अनकहा इतिहास भी था मेहनत का, असमानता का और उस श्रम का जिसे अक्सर नाम नहीं मिलता। वह किसान खेत के बीच खड़ा था। उसकी देह पर दिन भर की मेहनत की रेखाएँ थीं, लेकिन उसकी आँखों में सिर्फ़ थकान नहीं, एक पुरानी पीड़ा भी थी, पीढ़ियों से चली आ रही। वह उन हाथों का वारिस था जिन्होंने सदियों तक धरती को सींचा, पर अधिकार कभी पूरी तरह नहीं पाया। उसने धीरे से गेहूँ की बालियों को छुआ। बालियाँ झुकीं, जैसे उसकी भाषा समझती हों। उसके मन में शब्द उठे कविता की तरह, जो उसकी अपनी थी, उसके जीवन से निकली हुई,

“मेरी हथेली की रेखाओं में

हल की धार बसी है,

मैं खेत नहीं, इतिहास जोतता हूँ,

फिर भी मेरी पहचान फँसी है।”

उसने दूर देखा, जहाँ सूरज आधा डूब चुका था। उसे लगा जैसे यह डूबना सिर्फ़ दिन का अंत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का प्रतीक है जो हर बार उसकी रोशनी को आधा ही रहने देती है। वह जानता था, यह खेत सिर्फ़ अन्न नहीं देता, यह उसकी अस्मिता का हिस्सा है। लेकिन यही खेत उसे बार-बार उसकी सीमाएँ भी याद दिलाता है कर्ज, बिचौलियों का खेल और समाज की वह दीवार जो उसे बराबरी से दूर रखती है। हवा में अचानक बेचैनी घुलने लगी। उसने देखा, खेत के एक कोने से धुआँ उठ रहा है। वह दौड़ा। उसके कदमों में डर नहीं, बल्कि एक आदत थी, हर संकट से जूझने की आदत। लेकिन आग तेज थी। लपटें फैलती गईं, जैसे किसी ने उसके पूरे जीवन को एक साथ चुनौती दे दी हो।

वह मिट्टी फेंकता रहा, हाथों से आग दबाता रहा, पर आग सिर्फ़ फसल नहीं जला रही थी, वह उसकी उम्मीदों, उसके सपनों, उसके आने वाले कल को भी निगल रही थी। लपटों के बीच खड़ा वह अचानक ठहर गया। उसके भीतर से फिर एक स्वर उठा, टूटा हुआ, मगर सच्चा,

“जलते हैं खेत तो जलती है मेरी जात,

राख में बदलती है मेरी हर बात।

तुम कहते हो, यह बस एक हादसा है,

मैं जानता हूँ, यह सदियों का प्रसाद है।”

आग शांत होने लगी, पर जो बचा वह सन्नाटा था भारी, दबा हुआ और भीतर तक चुभने वाला। वह घुटनों के बल बैठ गया। उसकी उँगलियों में राख भर आई। उसने उसे देखा, जैसे अपनी ही मेहनत का अंतिम रूप हो। उसके मन में सवाल थे, क्यों हर बार उसका ही खेत सबसे पहले जलता है? क्यों उसकी मेहनत का मूल्य सबसे कम होता है? क्यों उसके हिस्से में संघर्ष ज़्यादा और सम्मान कम आता है? रात गहराने लगी। आसमान में तारे उभरे, पर उसकी आँखों में कोई चमक नहीं थी। फिर भी, उस अंधेरे में एक हल्की-सी जिद बाकी थी, जीने की, फिर से बोने की। वह धीरे-धीरे उठा। उसकी चाल में थकान थी, पर हार नहीं। उसने एक बार फिर राख को हाथ में लिया और धीरे से कहा,

“मैं राख से भी उगाऊँगा फसल,

मेरी जड़ें मिटती नहीं हैं,

तुम जितना दबाओगे मुझको,

उतना मैं उगता जाऊँगा।”

वह खेत से बाहर चला गया, लेकिन उसके भीतर एक नई चेतना जन्म ले चुकी थी, सिर्फ़ किसान की नहीं, बल्कि उस मनुष्य की जो अब अपने श्रम के साथ अपने अधिकार को भी पहचानने लगा था।

★★★

कहानीकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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