राजनैतिक व्यंग्य-समागम

Update: 2026-03-31 05:54 GMT

1. देशसेवा का धंधा : विष्णु नागर

अब विश्वगुरु जी की एक पुरानी भक्तन जी ने भारतीय एपस्टीन फाइल खोल दी है। एक अमेरिकी फाइल अभी आधी खुली और आधी बंद पड़ी है। किसी दिन वाशिंगटन प्रभु ने चाहा तो वह पूरी की पूरी फाइल, पन्ने दर पन्ने, विडियो दर विडियो खुल जाएगी। एक फाइल जब वे जब गुजरात में हुआ करते थे, तब से अब तक चौपट खुली पड़ी है। उसका एक-एक पन्ना खुला हुआ है।उसे देख-देखकर लोग ऊब चुके हैं!

और भी फाइलें होंगी उनकी, जो समय-समय पर खुलती रहेंगी। कुछ फाइलों की चर्चा कानों-कान होती रहती है!हर मुंह में उनकी एक रंग-बिरंगी फाइल रखी हुई है, जो किसी न किसी के कान में खुलती रहती हैं! सारी फाइलें धमाकेदार हैं!

भाइयो-बहनो, इनकी किसिम-किसिम की फाइलें हैं और ढूंढने चलोगे, तो उनकी ऐसी फाइलों का इतना बड़ा अंबार लग जाएगा कि देखते-देखते आंखें थक जाएंगी। न जाने कितनी फाइलें कहां-कहां धूल खा रही होंगी। कुछ फाइलें ऐसी भी होंगी, जो आग में स्वाहा की जा चुकी होंगी। फिर भी बहुत सी फाइलें‌ अभी होंगी। मूल नहीं, तो उनकी फोटोकापी होगी। विडियो में नहीं, तो वे फ़ाइलें फोटो में होंगी। बहुत से चतुर सुजान आए और गए, मगर उनकी फ़ाइलें आज भी अटल-अविचल हैं।

फाइल-फाइल का खेल‌ अगर विश्वगुरु जी खेलना जानते हैं, तो दूसरे भी कम होशियार नहीं हैं। ऐसा भी नहीं कि सब कुछ इन्हें ही आता है। ठीक है, कुछ ने फाइल-फाइल खेलना इनसे भी सीखा होगा। हवा में ही इनके कंप्रोमाइज्ड होने की कहानी नहीं चल रही है। यूं ही ट्रंप नहीं कहता कि मैं चाहूं, तो इनका करियर बर्बाद कर सकता हूं और ये प्रतिवाद में एक शब्द तक नहीं बोलते! कंप्रोमाइज्ड नेता एक ऐसी शै होती है, जिसका फायदा वाशिंगटन से लेकर पेरिस तक और दिल्ली से लेकर मुंबई-अहमदाबाद तक सब बड़े-बड़े खिलाड़ी मजे से उठा सकते हैं। ऐसा विश्वगुरु भी हो, तो इनके लिए बहुत फायदेमंद है। जिसके पास भी आज इन गुरुजी की चाबी है, वे सुखी और निश्चिंत हैं। जब चाहे, जैसी चाहे, उसे घुमा दें, यहां तक कि उल्टी भी घुमा दें, तो ताला खुल जाएगा!

भाइयो-बहनो, सब जानते हैं कि यह भारत है और यहां फाइलें खुलने से अब कोई क्रांति नहीं होती, सत्ता परिवर्तन नहीं होता, वरना पिछले बारह साल में अनेक क्रांतियां हो चुकी होतीं! एक कोने में इनका विश्व होता और दूसरे में गुरुजी कहीं अंधेरे में पड़े मिलते!

विडियो जारी होने से भी अब कोई खास अंतर नहीं पड़ता। यहां रोज ही विडियो जारी होते रहते हैं। लोग आनंद लेते हैं। थोड़ी सी सुगबुगाहट होती है और सब पहले की तरह सामान्य हो जाता है! न कहीं आंधी आती है, न तूफान! कोई पेड़ तक नहीं गिरता। पत्ते तक नीचे नहीं गिरते! बलात्कारियों और हत्यारों का यहां कुछ नहीं होता, इतनी सावधानी जरूरी है कि वे सही समय पर सही साइड में हों और वे होते हैं! विश्वगुरु की तरफ़ होते हैं, तो यह उनकी योग्यता में शामिल हो जाता है। विधायक-सांसद से लेकर मंत्री बनने तक के अवसर बढ़ जाते हैं।

जब से ये चाल, चरित्र और चेहरे वाले आए हैं, तब से तो इतना पक्का प्रबंध है कि कोई इनकी चाल देखता रह जाता है। इनका चरित्र और चेहरा नहीं देख पाता!

आप-हम अच्छी तरह जानते हैं कि जिन्हें हम अपना विधायक-सांसद आदि चुन रहे हैं, वे आगे कई-कई तरह के गुल खिलाएंगे। हमें कोई भ्रम नहीं होता कि हम इन्हें जनसेवा करने के लिए चुन रहे हैं। ये इस बीच इतना कमाएंगे कि कोई तस्कर भी इतना कमा नहीं सकता! हम जानते हैं कि ये पहले भी काफी गुल खिला चुके थे, इसीलिए आज चुनाव मैदान में हैं और आगे ये गुलों का पूरा बगीचा खड़ा कर देंगे। कुछ तो इतने होशियार निकलेंगे कि गुलों का पूरा वन खड़ा कर देंगे और उसकी सुगंध में इतने गुम हो जाएंगे कि अगले चुनाव से पहले नजर नहीं आएंगे और फिर भी हम इन्हें चुनेंगे, क्योंकि हमारा उद्देश्य या तो मुल्लों को सेट करना है या हमें हमारी जाति का झंडा बुलंद रखना है और इनका एकमात्र उद्देश्य कमाई करना है। एक मंत्री जी पूरी तरह देशसेवा में लगे रहते हैं,सांस लेने तक की उन्हें फुरसत नहीं, मगर उनकी संपत्ति 2012 में लगभग 12 करोड़ थी, जो देशसेवा करते-करते बारह साल बाद 65 करोड़ से ज्यादा हो गई, मतलब पांच गुना से भी अधिक हो गई और उनके बेटे की संपत्ति आज 100 से 150 करोड़ के बीच बताई जाती है! अर्थ यह कि देशसेवा भी बेहद मुनाफे का धंधा है!

एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि हमारे लगभग आधे सांसद हत्या, बलात्कार, अपहरण जैसे मामलों में फंसे हैं। और वे ऐसे मामलों में फंसे थे, इसीलिए उन्हें टिकट मिला है और हमने उन्हें चुना है। इसलिए कोई भ्रम में न रहे कि फाइलें खोलकर विश्वगुरु जी का कोई कुछ बिगड़ सकता है। जितनी फाइलें खोलना हो, खोल लो। जितनी तरह की फाइलें खोलना हो, खोल दो। एपस्टीन फाइल खोल‌ लो या कोई और धांसू टाइप फाइल खोल‌ लो!उनकी चाल, चरित्र और चेहरा साबुत रहेगा! तुम्हारे पास फाइल है, उनके पास पूरा तंत्र और मंत्र है।

हां, जब भी उनका बिगड़ेगा तो फिर इतना बिगड़ेगा, इतना बिगड़ेगा कि जय श्रीराम भी सुधार नहीं पाएंगे। पर अभी उन पर बड़ी पूंजी का साया है। इतना सस्ता, इतना भीरू, इतना एपस्टीन उन्हें आज कोई और उपलब्ध नहीं है। जिस दिन वह मिल गया, इनकी छुट्टी करने में वे देरी नहीं करेंगे! इनके नान बायोलॉजिकल और अवतारी पुरुष होने की हवा निकल जाएगी!

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

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2. विश्व गुरु न सही, विश्व मित्र तो मान लो यारो! : राजेंद्र शर्मा

भाई ये तो सरासर चीटिंग है। मोदी जी के साथ, बल्कि उनके वाले भारत के साथ ही चीटिंग है। बताइए, ये लोग अब मोदी जी को विश्व मित्र मानने से भी इंकार कर रहे हैं। पहले कहते थे कि विश्व गुरु मानने में दिक्कत है। किसी के कहने भर से किसी को विश्व गुरु थोड़े ही मान लिया जाएगा? फिर खुद हमारे कहने से तो होगा भी क्या? खुद ही अपने मुंह से अपने को विश्व गुरु कहते फिरेंगे, तो क्या दुनिया मान लेगी? उल्टे अपने मुंह मियां मिट्ठू कहकर मजाक ही उड़ाएगी।

वैसे भी विश्व गुरु वह, जिसे दुनिया गुरु माने। घूम-घूमकर दुनिया भर में राजनेताओं के गले पड़ने से और मुलाकातों के सारे वीडियो में ऑडियो वाला हिस्सा या तो म्यूट रखने या खी-खी, खी-खी या हो-हो, हो-हो से भरने से, दुनिया किसी को गुरु थोड़े ही मान लेगी। सिर्फ विरोधियों को ठोक-पीट कर गद्दी पर जमे रहने से भी नहीं। टीवी से लेकर हर सड़क, हर चौराहे, हर खंभे पर, एक देश-एक फोटो का विधान चलाने से भी नहीं। कुछ तो हो, जिसमें दुनिया आपको सबसे आगे माने और कहे कि हम आपसे सीख रहे हैं, आपके दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं!

और तो और, जब से ट्रंप की अमेरिका की गद्दी पर वापसी हुई है, लंबी फेंकने तक में कोई अब हमें नंबर वन मानने के लिए तैयार नहीं है। उल्टे ट्रंप ने जब से बात-बात पर और बहुत बार तो बेबात भी, जमीन पर नाक रगड़वाना शुरू किया है, उसके बाद से तो विश्व गुरु वाले सारे डंके फट-फटा ही गए।

सच पूछिए, तो इसी सब को देखकर मोदी जी ने खुद ही विश्व गुरु की गद्दी की तरफ देखना ही छोड़ दिया और विश्व मित्र पर आ गए। इसमें वैसे भी किसी चीज में सबसे आगे होने टाइप कोई टेंशन ही नहीं है। बस दिल बड़ा होना चाहिए, जिसमें सारी दुनिया समा सके। और दुनिया भर में घूमने का बजट भी होना चाहिए। और बंदे के पास फुर्सत होनी चाहिए, बस। बाकी इकतरफा प्यार की तरह, इकतरफा विश्व मित्र तो कोई भी हो सकता है।

पर अब भाई लोगों को विश्व मित्र मानने में भी प्राब्लम है। कह रहे हैं कि काहे के विश्व मित्र, पड़ोसी ईरान से मित्रता तो निभाई नहीं गयी। उससे पहले वेनेजुएला से। उससे जरा सा हट के क्यूबा से। दो साल से फिलिस्तीन से। जरूरत पर किसी के काम आने का गूदा नहीं और दावा विश्व मित्र होने का!

लेकिन, यही तो चीटिंग है। कहां तो मोदी जी अपने भारत को विश्व मित्र बनाने में जुटे हुए हैं और कहां विरोधी उनसे इस या उस देश का मित्र बनकर दिखाने की, बल्कि मित्रता निभाने की मांग कर रहे हैं! क्या ये विरोधियों की छोटी सोच को ही नहीं दिखाता है। ये छोटे-मोटे देशों से दोस्ती करने, दोस्ती निभाने से बड़ी बात, इससे आगे की बात, सोच ही नहीं सकते हैं। पूरा जोर लगाने पर भी इनकी कल्पना तीसरी दुनिया के मित्र होने की बात से आगे जा ही नहीं सकती है। ये क्या जानेंगे विश्व मित्रता की कठिन साधना?

यह सच है कि अमेरीका-इस्राइल ने ईरान पर हमला किया। बातचीत के बीच में हमला किया। बातचीत के बीच में, साल भर में दूसरी बार हमला किया। लेकिन, यह भी तो सच है कि ईरान ने भी इस्राइल पर और खाड़ी देशों में अमेरिकी अड्डों पर जवाबी हमले किए। हिंसा दोनों तरफ से हुई, तो हम किसी को सही और किसी को गलत कैसे कह सकते थे? अब क्या सिर्फ इसलिए कि पहले ईरान पर हमला किया गया था, मोदी जी का भारत, अमेरिका और इस्राइल को हमलावर बताकर, ईरान के साथ खड़ा हो जाता? या सिर्फ इसलिए ईरान के साथ खड़ा हो जाता कि अमेरिका, हजारों किलोमीटर दूर से आकर यहां क्यों फौजी दखल दे रहा है, एशिया के अंगने में अमेरिका का क्या काम है? भारत अगर एक पाले में खड़ा हो जाता, तो फिर विश्व मित्रता का क्या होता? भारत अगर ईरान से दोस्ती निभाने जाता, तो अमेरिका और इस्राइल से मित्रता का क्या होता?

सच्ची बात यह है कि इस बात से हमारा विश्व मित्र होने का दावा और भी पुख्ता हो जाता है कि हम अब सही-गलत, न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित, किसी चक्कर में नहीं पड़ते हैं। हम न किसी का समर्थन करते हैं, न किसी का विरोध। न किसी की निंदा करते हैं, न किसी की प्रशंसा। हम बस चुप रहते हैं। कोई किसी के राष्ट्राध्यक्ष की हत्या कर दे, हम चुप रहते हैं। कोई बच्चियों के स्कूल पर बम मारकर एक साथ पौने दो सौ बच्चियों और उनके शिक्षकों की हत्या कर दे, तब भी हम चुप रहते हैं। वैसे चुप तो हम तब भी रहते हैं, जब हमारा कोई मित्र ग़ज़ा की दस लाख की आबादी में से, 74 हजार लोगों की हत्या कर दे, जिसमें ज्यादा तादाद महिलाओं और बच्चों की ही हो। बेशक, कभी-कभी फोन-वोन कर के बोलते भी हैं, पर सभी को अपनी मित्रता का भरोसा दिलाने के लिए। और सारी दुनिया को यह बताने के लिए कि हम युद्ध के नहीं, बुद्ध के देश से हैं!

वैसे इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम मित्र भी सिर्फ फेसबुक फ्रेंड टाइप के हैं, दोस्ती निभाना नहीं जानते हैं। चाहे कोई यह इल्जाम तो लगा भी दे कि मोदी के भारत को पहले वालों की तरह दुश्मनियां पालना नहीं आता है और खासतौर पर पड़ौसियों को छोड़कर, समंदर पार वालों से दुश्मनियां पालना नहीं आता है -- मोदी जी को अजात-शत्रु कहा जाए, तो भी बेशक बुरा नहीं मानेंगे -- पर दोस्ती निभाना नहीं जानने का इल्जाम कोई कैसे लगा सकता है? मोदी जी और ट्रंप जी तथा नेतन्याहू जी की मोहब्बत की तो मिसालें आज सारी दुनिया देती है। ट्रंप जी और नेतन्याहू जी बार-बार उनकी मोहब्बत का इम्तिहान लेते हैं और मोदी जी हर बार साबित करते हैं कि उनकी दोस्ती नहीं टूटेगी। दोस्ती टूटने की छोड़ो, दोस्ती में ना कोई सॉरी और ना कोई थैंक यू! और हां, कोई शिकायत भी नहीं। इस तक की शिकायत नहीं कि ट्रंप जी दो शासनाध्यक्षों की फोन वार्ता में, खरबपति दोस्त एलन मस्क को क्यों घुसा लेते हैं। दोस्ती निभायी भी जाएगी, बस जरा दिल मिलने चाहिए। नफरत के लिए मिलें, तब भी चलेगा, पर दिल मिलें तो सही!

रही पाकिस्तान के ईरान और अमेरिका-इस्राइल की जंग रुकवाने के लिए हाथ-पैर मारने की बात, तो इसका मतलब न तो यह है कि अमेरिका-इस्राइल को मोदी जी की दोस्ती पर भरोसा नहीं है और न इसका मतलब यह है कि मोदी जी का भारत नहीं, पाकिस्तान विश्व मित्र है! ऐसा कुछ भी नहीं है। बात असल में सिर्फ इतनी है कि बातचीत से बात बन भी गयी, तो क्या होगा – लेन-देन ही तो होगा । और जयशंकर जी ने तो पहले ही बता दिया है कि लेन-देन करना/कराना तो दलालों का काम है। वॉर रुकवाने का हो तो क्या, दलाली का काम आखिर दलाली का काम है। ऐसा काम पाकिस्तान को ही मुबारक, मोदी जी का भारत दलाली का काम नहीं करेगा। अमेरिका-इस्राइल के पाले में गिने जाने के डर से भी नहीं। वॉर चाहे कोई भी रुकवाए, पर विश्व मित्र तो भारत ही कहलाएगा। नहीं क्या?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोक लहर' के संपादक हैं।)

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