(आलेख : डॉ. सिद्धार्थ रामू)
ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद दुनिया का जो देश इसके खिलाफ सबसे पहले मुखर होकर सामने आया और ठोस तरीके से अमेरिका-इजरायल के खिलाफ खड़ा हुआ, वह देश स्पेन है, इसके बावजूद कि स्पेन अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन नाटो का सदस्य है। वह उस यूरोपीय यूनियन का भी सदस्य है, जिसके अधिकांश देश खुले या थोड़ा ढंके तरीके से अमेरिका-इजरायल का समर्थन कर रहे हैं और उनका साथ दे रहे हैं। स्पेन में इस समय वामपंथ की ओर झुकी हुई स्पेनिश सोशिलिस्ट वर्कस पार्टी की सरकार है। वामपंथी पेड्रो सांचेज प्रधानमंत्री हैं।
यूरोप और पश्चिमी दुनिया में स्पेन की सरकार एकमात्र ऐसी सरकार है, जिसने साफ शब्दों में इस हमले को गैर-कानूनी (अवैध) कहा, इसे एक तरफ सैन्य कार्रवाई बताया। स्पेन के प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि हम इस युद्ध के खिलाफ हैं और इसमें नाटो के सदस्य के रूप में शामिल नहीं होंगे। स्पेन की वर्कर्स पार्टी की सरकार ने सिर्फ बयान नहीं जारी किया, इसके साथ उसने ठोस कदम भी उठाए। स्पेन ने अपने सैन्य बेस का इस्तेमाल करने की अमेरिका को इजाजत नहीं दी। इसके बाद ट्रंप ने स्पेन के खिलाफ बहुत कुछ अनाप-शनाप बका और धमकी भी दी। इतना ही नहीं, नाटो का सदस्य होते हुए भी स्पेन ने अपने देश के भीतर अमेरिकी सैन्य गतिविधियों पर रोक लगा दी। इजरायल से अपने राजदूत को वापस बुला लिया।
स्पेन की वामपंथी सरकार के लिए अमेरिका-इजरायल के खिलाफ खड़े होना कोई आसान काम नहीं था। स्पेन एक यूरोपीय देश है, जिसका अमेरिका से घनिष्ठ आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी और सैन्य संबंध है। स्पेन की सरकार एक बड़ा रिस्क लेकर अमेरिका और इजरायल के खिलाफ खड़ी हुई। इसमें उसके स्पेन के मजदूर वर्ग और आमजन के बीच वर्कर्स पार्टी के जनाधार की भूमिका के साथ उनकी उस वामपंथी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता भी है, जो देशों की संप्रभुता, राष्ट्रों की स्वतंत्रता और न्यायपूर्ण दुनिया में विश्वास करती है।
यूरोपीय स्पेन की ही तरह हमें श्रीलंका की वामपंथी सरकार के उन दो बड़े कदमों की भी दाद देनी चाहिए, जो उन्होंने अमेरिका-इजरायल को चुनौती देते हुए उठाए। श्रीलंका की सरकार से अमेरिका ने अनुरोध किया कि उनकी जमीन (सैन्य अड्डे) का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ युद्ध में करने दे। श्रीलंका की सरकार ने अमेरिका की इस मांग को साफ शब्दों में खारिज कर दिया। यह सूचना श्रीलंका के वामपंथी राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने श्रीलंका की संसद को दी।
श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने संसद को बताया कि सरकार ने मार्च की शुरुआत में अमेरिका के दो लड़ाकू विमानों को देश के दक्षिण-पूर्व स्थित मत्ताला अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। दिसानायके ने कहा कि जिबूती स्थित अमेरिकी अड्डे से दो युद्धक विमानों ने चार और आठ मार्च को श्रीलंका आने की अनुमति मांगी थी, लेकिन दोनों अनुरोध अस्वीकार कर दिए गए।
इसके साथ ही श्रीलंका के तट के पास ईरान की नौसेना की जहाज पर अमेरिकी पनडुब्बी ने हमला किया। जिसमें 87 लोग मारे गए। कई लोग बुरी तरह घायल हुए। श्रीलंका ने इस पर सवार सैनिकों को बचाने, घायलों का इलाज कराने और शवों को निकालने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी। 32 लोगों को बचाने में श्रीलंका की नौ सेना सफल रही। हालांकि यह कार्रवाई श्रीलंका ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का अनुपालन करते हुए एक मानवीय सहायता के रूप में की, लेकिन अमेरिका ने इसे भी अपने खिलाफ और ईरान के पक्ष में की गई कार्रवाई की तरह देखा।
श्रीलंका के ये कदम देखने में छोटे कदम लग सकते हैं, लेकिन इन कदमों का कितना बड़ा महत्व है और यह करके श्रीलंका ने कितना बड़ा जोखिम लिया, इसको दो बातों से समझा जा सकता है। पहला यह कि श्रीलंका एक गंभीर आर्थिक संकट से जूझ कर निकला है, अभी उसके आर्थिक संकट का पूरी तरह समाधान नहीं हुआ है। इस संकट के समाधान में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक और अमेरिका-यूरोप की बड़ी भूमिका है। इसके बावजूद भी श्रीलंका ने अमेरिका को मना करने और उसकी इच्छा के खिलाफ खड़ा होने का साहस किया। दूसरी बात यह कि जब दुनिया के अधिकांश देश और श्रीलंका के पड़ोसी भारत-पाकिस्तान अमेरिका-इजरायल के साथ खड़े दिख रहे हैं, उस हालात में श्रीलंका की वामपंथी सरकार और राष्ट्रपति का निर्णय बहुत मायने रखता है।
स्पेन का निर्णय पश्चिमी दुनिया, यूरोपियन यूनियन और नाटों का सदस्य होने के चलते बहुत मायने रखता है, तो श्रीलंका निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह युद्ध क्षेत्र के दायरे का एक देश है। वह ईरान का कई मायने में पड़ोसी भी है। लैटिन अमेरिका की इस युद्ध में सीधे कोई भूमिका नहीं हैं, लेकिन वामपंथ की ओर झुके हुए ब्राजील के राष्ट्रपति और उनकी सरकार ने खुलकर अमेरिका और इजरायल की निंदा की है। ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले को दादागिरी और ईरान का संप्रभुता का खुला उल्लंघन कहा है। रूस-चीन की चर्चा की इसलिए विशेष जरूरत यहां नहीं है, क्योंकि उनका अमेरिका से पहले से ही सीधी टकराहट है और भविष्य में गंभीर टकराहटों की संभावना भी है। ये दो देश हैं, जिन्होंने इस हमले की सबसे पहले निंदा की थी।
स्पेन और श्रीलंका जैसी वामपंथी सरकारों या श्रमिकों आधारों वाली ब्राजील की सरकार का अमेरिका-इजरायल के खिलाफ खड़ा होना यह बताता है कि वामपंथी वैचारिकी आज भी पार्टियों, नेताओं और व्यक्तियों को हर तरफ के अन्याय के खिलाफ खड़ा होने की दर्शन, विचार और कूबत देती है। बात सिर्फ पार्टियों की नहीं है, बल्कि दुनिया भर की वामपंथी पार्टियां और उनके नेता-कार्यकर्ता और समर्थक बुद्धिजीवी किसी भी अन्य वैचारिकी की पार्टियों की तुलना में इस युद्ध की मुखालफत में खुलकर खड़े हैं।
ये पार्टियां-ग्रुप, नेता और वामपंथी बुद्धिजीवी और उनकी पत्र-पत्रिकाएं (मीडिया) बिना किसी किंतु-परंतु के इस अमेरिका-इजरायल को बर्बर हमलावर और नरसंहार कर के रूप में देख रहे हैं। अपने-अपने देशों और विभिन्न मंचों पर इसका विरोध कर रहे हैं। यहां तक कि सड़कों पर अमेरिका-इजरायली हमले के खिलाफ उतरे हैं।
एक तरफ दुनिया में वामपंथी सरकारें, वामपंथी पार्टियां और वामपंथी कार्यकर्ता खुलकर अमेरिका-इजरायल के खिलाफ खड़े हैं, वहीं दूसरी ओर खुद को इस्लामिक राष्ट्र दर्जा देने वाले या मुसलमानों का देश कहने वाले दुनिया के देश, विशेषकर पश्चिम के ईरान के पड़ोसी पूरी तरह इस हमले में अमेरिका-इजरायल के साथ खड़े हैं। ईरान और ईरानी जनता के खिलाफ बर्बर हमले में ये देश पूरे के पूरे अमेरिका-इजरायल के सहयोगी हैं।
सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत, बेरूत आदि खाड़ी देशों के साथ और सहयोग के बिना न तो इजरायल और न ही अमेरिका ईरान का कुछ बिगाड़ सकते थे। खाड़ी देशों के इन इस्लामिक राष्ट्रों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे के बिना अमेरिका और इजरायल ईरान का कुछ खास बिगाड़ नहीं सकते थे और हैं। पाकिस्तान तो अमेरिका और ट्रंप की चापलूसी करने की सारी हदें पार कर चुका है। सच यह है कि खुद को इस्लामिक देश-राष्ट्र कहने वाले बहुलांश देश, विशेषकर ईरान के पड़ोसी देश पूरी तरह अमेरिका-इजरायल के सामने लेट गए हैं।
हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व हृदय सम्राट कहे जाने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में स्वतंत्र विदेश नीति और संप्रभुता को किनारे लगाकर इस युद्ध में इजरायल-अमेरिका के साथ खड़ा हुए। ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के 36 घंटे पहले उन्होंने इजरायल की यात्रा की, उसे फादर लैंड कहा। हर स्थिति में उसके साथ खड़ा होने का वादा किया। ईरान जैसे लंबे समय के साथी के साथ पूरी तरह विश्वासघात किया। ईरान के राष्ट्र प्रमुख खुमैनी की इजरायल-अमेरिका द्वारा गुंडे की तरह हत्या पर भारत सरकार लगातार चुप्पी साधे रही, आज तक भारत के प्रधानमंत्री या किसी मंत्री ने इसकी निंदा नहीं की।
सभी अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करके ईरान पर हमला और वहां के सर्वोच्च नेता और नेताओं और अन्य लोगों की हत्या पर भारत चुप रहा। यहां तक ईरान कि सैकड़ों मासूम बच्चियों की हत्या पर भारत ने मुंह नहीं खोला। भारत के अधिकांश पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने एक स्वर से भारत की पोजिशन की आलोचना की है। इसे न केवल राष्ट्र की संप्रभुता, गरिमा और ऐतिहासिक विरासत के खिलाफ कहा है, बल्कि इसे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ भी माना है।
खुद को इस्लामिक राष्ट्र कहने वाले ईरान के पड़ोसी पश्चिम एशिया के देशों या हिंदू राष्ट्र और विश्व गुरु का दंभ भरने वाली भारत सरकार का ईरान के खिलाफ बर्बर अमेरिका-इजरायल हमले में सहभागी होना या चुप्पी साधे रखना तो बातें साफ कर देता है- पहली तो यह कि इनके लिए धर्म सिर्फ अपनी सत्ता को कायम रखने और बनाए रखने का एक सिर्फ जनता को धोखा देने का आवरण है। इन सरकारों-शासकों का धर्म से कोई खास लेना-देना नहीं है।
दूसरी बात यह है कि जिस धर्म की ये कसमें खाते हैं और जिसके संरक्षक और चैंपियन होने का दावा करते हैं, उसके न्याय-न्याय के किसी तत्व से इनका कोई लेना-देना नहीं हैं। असल में ये देश अपने-अपने देशों के मुट्ठी भर उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग के एक हिस्से हितों के प्रतिनिधि हैं, उनके चाकर हैं। उनके सुख-सुविधा और विलासिता के रक्षक हैं। अपने देशों के व्यापारियों-कारोबारियों- मुनाफाखोरों के कारोबार के प्रबंधक हैं, कई तो खुद के कारोबारी-व्यापारी हैं या बड़े कारोबारियों-व्यापारियों के मित्र हैं। इन सब का हित अमेरिकी कार्पोरेट-कार्पोरेशन, शेयर बाजारों, बैंकों और इनके प्रबंधकों से जुड़ा हुआ है, जिनके हितों के मैनेजर आजकल ट्रंप हैं। हां इन शासकों के पास न्याय, गरिमा, संप्रभुता और व्यापक मानवता को केंद्र में रखने वाला कोई दर्शन, विचार, एजेंडा, स्वप्न और कार्यक्रम भी नहीं हैं।
जहां तक पश्चिमी उदारवाद या नवउदारवादी कहे जाने वाले देशों ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली आदि का प्रश्न है। इनके देशों की जनता का एक बड़ा हिस्सा फिलिस्तीन की जनता के साथ खड़ा है और इजरायल और उसके सबसे बड़े सहयोगी अमेरिका के खिलाफ भी है। जनमत के इस दबाव में इन देशों की सरकारें खुलकर अमेरिका-इजरायल का साथ नहीं दे पा रही हैं। लेकिन ब्रिटेन ईरान के खिलाफ इस हमले में तमाम शाब्दिक आडंबरों के बाद भी अमेरिका-इजरायल को युद्ध में सैन्य मदद कर रहा है। फ्रांस की स्थिति भी कमोबेश यही है। जर्मनी थोड़ी ज्यादा दूरी बनाए हुए है।
इटली भी पूरी तरह अमेरिका-इजरायल के साथ खड़ा नहीं हो पा रहा है। पर इन सब बातों के बावजूद भी यह खुला तथ्य है कि ये देश इस अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन करके ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले की निंदा तक अभी नहीं किए हैं। ईरान की संप्रभुता और आजादी के मनमाने तरीके से रौंदने की कोशिशों का इन देशों ने खुला विरोध नहीं किया है। भले ही अपने देशों के जनमत, विश्व जनमत और दुनिया को बिला वजह संकट में डाल देने वाले इस युद्ध में वे अमेरिका के हर आह्वान का साथ नहीं दे रहे हैं और यह भी कह रहे हैं कि यह युद्ध नाटों का युद्ध नहीं हैं।
इन तमाम सहमतियों-असहमतियों के बीच भी सच यह है कि पश्चिमी दुनिया के अधिकांश उदारवादी लोकतांत्रिक देश की सरकारें ट्रंप-इजरायल के सामने इस्लामिक देशों और हिंदू राष्ट्र के मसीहा की तरह भले ही लेटे हुए न हों, पर वे उनके सामने झुके हुए हैं, कोई कम झुका है और कोई ज्यादा। यही स्थिति दुनिया भर के उदारवादी-लोकतांत्रिक कहे जाने वाली पार्टियों, नेताओं और बुद्धिजीवियों के भी बड़े हिस्से की है।
भारत में यदि वामपंथी पार्टियों-नेताओं -कार्यकर्ताओं को छोड़ दिया जाए तो कोई पार्टी-नेता भारतीय जनमत को इस मुद्दे पर अमेरिका-इजरायल के खिलाफ खड़ा करने के कोई पहलकदमी करता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। उनकी भारत सरकार की आलोचना शब्दों तक सीमित है। हालांकि भारत में ऐसे मुद्दों पर वामपंथी पहलकदमी भी कमजोर पड़ी है।
व्यापक जन को केंद्र में रखने वाला कोई दर्शन, विचार, स्वप्न, एजेंडा, कार्यक्रम और उस पर आधारित संगठन-पार्टी-नेता ही अंत में राष्ट्रों की संप्रभुता, देशों की आजादी और जनता शोषण-उत्पीड़न से जनता की मुक्ति का पक्ष ले सकता है। एक दुनिया की रचना कर सकता है, जहां हर व्यक्ति, हर राष्ट्र और देश का समान मूल्य हो। किसी पर किसी का कोई वर्चस्व न हो।
कोई किसी के अधीन और मातहत न हो। वामपंथ के पराजय के इस दौर में बची-खुची पार्टियों, उनकी कुछ सरकारों, नेताओं और कार्यकर्ताओं का अमेरिकी-इजरायली के हमले के खिलाफ खड़ा होना यह साफ संकेत देता है कि व्यापक मेहनतकश जन को केंद्र में रखनी वाली वामपंथी वैचारिकी ही दुनिया का भविष्य है। हां यह सच है कि वह कोई सिर्फ अतीत का दुहराव नहीं होगा, बल्कि 21 वीं सदी की मानव जाति की जरूरतों को केंद्र में रखकर सामने आएगी।
(साभार : जन चौक। डॉ. सिद्धार्थ रामू लेखक और पत्रकार हैं।)